Friday, July 3, 2015

स्वदेशी जागरण मंच liविकास यात्रा

2.. भूमिका
विकास यात्रा से तात्पर्य है कि स्वदेशी जागरण मंच के आज के विराट स्वरूप धारण की गाथा। स्वदेशी जागरण मंच क्या है, यह जानकारी सबको होनी चाहिये, हम किस वंश से जुडें है, किस कुल से उत्पन्न हुए हैं, कौन सी हमारी परम्परा है, हमारा इतिहास क्या है, किस मुहुर्त में, किस नक्षत्र में हमारा जन्म हुआ है, हमारा लालन पालन कैसा रहा है, यानि कुल मिलाकर स्वदेशी जागरण मंच, जब एक मंच के नाते जब इस धरती पर आया, तब से लेकर आज तक, हमारी यात्रा का क्रम कैसा रहा है? यह एक लम्बा इतिहास है। परन्तु समय सीमा के मर्यादा में उतना लम्बा इतिहास विस्तारपूर्वक बताना सम्भव नहीं होगा। कुछ महत्वपूर्ण, लेकिन मील स्तम्भ कहे जा सके ऐसे तथ्य यहाँ रखने का प्रयत्न होगा ।

३.दूसरा स्वातन्त्र्य युद्ध: आर्थिक स्वतंत्रता हेतु
यह जो विकास यात्रा है, यह स्वदेशी की नहीं, बल्कि इस मंच की विकास यात्रा है। यह देश जब राजनीतिक स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ रहा था, जब हम अंग्रेजों के गुलाम हुए थे, दासता का युग उससे पूर्व भी था। विशेषकर अंग्रेजों के गुलामी के दौर में जिन परिस्थितियों का निर्माण इस देश के अन्दर हुआ, उसमें स्वदेशी का भाव, स्वदेशी के कार्यक्रम इनका प्रस्फुटन हुआ था। स्वदेशी का सबसे पहला आंदोलन बंग-भंग आंदोलन, श्री लाल-बाल-पाल के नेतृत्व में लड़ा गया। आजादी मिलने के बाद ही और जिस प्रकार से विदेशी ताकतों का हमारे नीति निर्धारण में जो प्रभाव दिखाई देने लगा, उसके कारण समय-समय पर स्वदेशी की माँग उठती रही है। विशेषकर जब विश्व बैंक के दबाव में 1965 ई. में सिन्धु जल बटवारे का समझौता भारत और पाकिस्तान के मध्य हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक परम् पूज्य गुरू जी ने देश की सरकार और जनता को उस समय सावधान किया था कि नीतियों के निर्धारण के मामले में, किसी दूसरे देश से समझौता करने के मामले में, सरकार विदेशी प्रभाव में न आएं। वास्तव में सिन्धु जल समझौता विश्व बैंक के दबाव में किया गया। राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्त कर लेने के बाद यह एक प्रकार से आर्थिक परतन्त्रता है। इस आर्थिक गुलामी के लक्षण राजनीतिक आजादी के बाद ही नजर आने लगे थे.
कुल मिलाकर मंच के नाते हम स्वदेशी आन्दोलन चला रहे हैं। जिसको हमने कहा है कि यह स्वदेशी आन्दोलन आर्थिक स्वाधीनता के लिए एक युद्ध है। यह द्वितीय स्वतन्त्रता युद्ध है। इस शब्द का प्रयोग हमने किया। आज कल ’आर्थिक स्वतन्त्रता का दूसरा संग्राम’ शब्द का प्रयोग बहुत लोग कर रहे हैं। लेकिन इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने 1982 में किया था। उस समय उन्होंने कहा था कि देश एक आर्थिक परतन्त्रता के युग में जा रहा है और आर्थिक परतन्त्रता से मुक्ति के लिए हमें दूसरा स्वाधीनता संग्राम लड़ना पड़ेगा। 1984 ईसवीं मे इन्दौर में भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्तों का एक पाँच दिनों का अभ्यास वर्ग लगा था, जो बहुत ऐतिहासिक था, उस वर्ग में मैं भी उपस्थित था। उसी समय देश की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या हो गयी थी। तीन दिनों में ही वर्ग का समापन करना पड़ा। पूरा देश एक संकट के दौर से गुजर रहा था। इन्दौर भी उसी के प्रभाव में था।
चाहे यह थोड़ा अलग प्रसंग है परन्तु हम दूसरी बात बताना चाह रहे हे. एक दृष्टि से भी इन्दौर का अभ्यास वर्ग एक ऐतिहासिक था। क्योंकि उसी समय पहली बार सभी कार्यकर्ताओं के सामने आर्थिक पराधीनता और दूसरा स्वातन्त्र आन्दोलन के बारे में राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने अपने विचार रखे थे। तब भारतीय मजदूर संघ ने यह काम आरम्भ किया था और उसके बाद 1984 ई. के ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपने मुम्बई अधिवेशन में पहली बार स्वदेशी व आर्थिक स्वातन्त्रय संग्राम जैसी बातें दोहरायी। मंच के नाते स्वदेशी जागरण मंच का 22 नवम्बर 1991 को गठन हुआ। अतः 1982 ई. से भारतीय मजदूर संघ ने ’आजादी की दूसरी लड़ाई’ शब्द का प्रयोग आरम्भ किया, यह अपना कार्य उसी का विस्तार था।
4.नई आर्थिक नीतियां: विनाश को निमंत्रण
याद करें कि 1991 में जब लोकसभा के चुनाव हुए और इस चुनाव में किसी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। काँग्रेस सबसे बड़े दल के रुप में उभरी थी। श्री नरसिहं राव जी के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ और डाॅ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने। तब डाॅ. मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के सदस्य नहीं थे और उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा था। वित्तमंत्री रहने के नाते 24 जुलाई 1991 को भारतीय संसद में एक प्रस्ताव लाएं जिसमें देश की गिरती आर्थिक स्थिति, और पूर्व की सारी सरकारों की आलोचना की (यद्यपि ज्यादा दिनों तक सरकारें कांग्रेस की ही रही थी और बहुत लम्बे समय तक उन सरकारों के सलाहकार स्वयं डाॅ. मनमोहन सिंह थे। प्रमुख आर्थिक सलाहकार रहे, रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, यानि कि इन्हीं के सलाह पर और इन्ही के निर्देशन में सरकार आर्थिक नीतियाँ तय करती रही थी।) 24 जुलाई को डाॅ. मनमोहन सिंह ने पूर्व की सारी नीतियों की आलोचना करते हुए, नयी आर्थिक नीतियों की घोषणा की, जो कि 1 अगस्त 1991 से लागू हुई।
ये नई आर्थिक नीतियाँ क्या थीं? प्रस्ताव में तो ये उल्लेखित किया गया कि देश गहरे आर्थिक संकट में फँस गया है, भुगतान संतुलन का संकट है। अर्थात् देश को बाहर से वस्तुएं मंगाने के लिए विदेशी मुद्रा नहीं है, आय की विषमता हो गयी है, बेकारी फैल रही है, गरीबी फैल रही है, ये सब कुल मिलाकर देश एक भंयकर आर्थिक संकट में फँस गया है और इसमें से निकलने का एक मात्र उपाय - नयी आर्थिक नीति को लागू करना है। (जिसका परिणाम यह हुआ कि हमें 2600 टन सोना गिरवी रखना पड़ा।) इस देश में विदेशी पूँजी को आमंत्रित किया जाए। यानि कि देश अपने पैरों पर विकास नहीं कर सकता, अपने सामथ्र्य के बल पर ये देश खड़ा नहीं हो सकता, इसलिए विदेशी पूँजी की बैसाखी देश के लिए आवश्यक है। नियमों में ढील दी गयी। कस्टम्स ड्युटी घटायी गयी। जो क्षेत्र प्रतिबन्धित थे, उनको खोला गया यानि कि विदेशी पूँजी को यहाँ खुलकर खेलने का मौका, नयी आर्थिक नीतियों के माध्यम से दिया गया। परिणाम क्या हुए ? यह एक लम्बा और दूसरा विषय है।
6. स्वदेशी जागरण मंच - गलत आर्थिक नीतियों का राष्ट्रवादी उत्तर
जब ये नीतियाँ आयी तो ऐसे में जो राष्ट्रवादी लोग थे जिन्हें संघ परिवार कहा जाता था, की बैठक नागपुर में हुई। उस बैठक में एक निर्णय-प्रस्ताव पारित किया गया कि नयी आर्थिक नीतियों के कारण जो संकट खड़ा हो गया है, वह देश को फिर से गुलामी के नये दौर की ओर प्रवेश कराने वाला है।
यानि हजार, बारह सौ वर्षों तक हमने गुलामी के खिलाफ संघर्ष किया, कभी हारे, कभी विजयी रहे, लेकिन अंततः हम 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों के खिलाफ विजयी हुए और विश्व क्षितिज पर भारतवर्ष का एक नये देश के नाते उदय हुआ। अब फिर से ये खतरा उत्पन्न हो गया है कि भारत वर्ष एक नये गुलामी के दौर में प्रवेश करने वाला है। अगर एक बार हम आर्थिक गुलामी में प्रवेश कर गये तो शायद हम राजनीतिक स्वतन्त्रता भी अक्षुण्ण नहीं रख पायेगें। ऐसा एक नया खतरा इस देश के सामने उत्पन्न हो गया है। इस खतरे से निकलने का एक ही मार्ग है कि स्वदेशी जागरण मंच को औजार के रुप में उपयोग करके, आर्थिक स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी जाए, ऐसा संघ की उस नागपुर बैठक में कहा गया।
चूँकि आक्रमण का प्रकार नया था, इस देश ने अभी तक आक्रमण बहुत झेले थे, कुछ शारीरिक, कुछ मानसिक आक्रमण झेले थे। किन्तु यह एक शक्ति के द्वारा एक प्रकार का आक्रमण हुआ करता था जिसका हमने सामना किया था। परन्तु यह जो नया आक्रमण का दौर आरम्भ हुआ इसका प्रकार थोड़ा भिन्न हो गया था। देश ने इसके पूर्व इस प्रकार का आक्रमण नहीं देखा था। इसमें समाज जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं था, जिस पर आक्रमण ना हुआ हो। यह केवल विदेशी पूँजी भारत नहीं आ रही थी, केवल अमेरिका का डाँलर नही आ रहा था, यह विदेशी पूँजी और अमेरिकी डाॅलर के साथ-साथ एक विदेशी विचार-संस्कृति का आक्रमण भी हो रहा था। जिसको अप-संस्कृति कहते हैं। सांस्कृतिक आक्रमण हमारे देश पर शुरू हुआ। क्यांेकि डाॅलर अकेला नहीं आ रहा था, डाॅलर एक विशेष प्रकार की विकृति अपने साथ लेकर के आ रहा था। यह विदेशी संस्कृति का आक्रमण था। क्यांेकि उनकी भी एक संस्कृति है। तो एक नया दौर जीवन के सभी क्षेत्रों में आरम्भ हुआ। यह जो नये प्रकार के आक्रमण शुरु हुए, इन्हें पारम्परिक हथियारों से नहीं लड़ा जा सकता। किसी एक संगठन के बूते की बात नहीं रही। हमारे यहाँ संगठन तो कई थे। कहीं मजदूर संघ लड़ रहा था, तो कहीं विद्यार्थी परिषद्। कहीं धर्म के क्षेत्र में विश्व हिन्दु परिषद, तो कहीं शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती, कहीं किसानों की समस्याओं को लेकर भारतीय किसान संघ। ये सब लड रहे थे।
नये हथियार के नाते, स्वदेशी जागरण मंच का गठन किया गया और स्वदेशी जागरण मंच की संचालन समिति बनायी गई। जिसमें सात प्रमुख संगठन थे। राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाली भारतीय जनता पार्टी, मजदूर क्षेत्र में काम करने वाला भारतीय मजदूर संघ, किसान क्षेत्र मंे काम करने वाला भारतीय किसान संघ, विद्यार्थियों के बीच काम करने वाला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा के लिए विद्या भारती, महिलाओं और भगिनियों के लिए काम करने वाली राष्ट्रसेविका समिति, ऐसे राष्ट्रवादी संगठनो को मिलाकर स्वदेशी जागरण मंच का गठन हुआ। अर्थात् स्वदेशी का गठन एक संस्था के रुप में नहीं हुआ। मंच को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण विषय है कि स्वदेशी जागरण मंच एक संस्था नहीं है बल्कि आंदोलन है। देश में अनेक प्रकार की संस्थाएं चल रही हैं। एक-एक विषय को लेकर काम करने वाली। स्वदेशी जागरण मंच एक मंच है जो स्वदेशी के लिए काम करता है। स्वदेशी को लेकर काम करने वाले चाहे किसी भी विचारधारा के हो, लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता का विषय उनको प्रिय है तो वे स्वदेशी जागरण मंच के साथ काम कर सकते है। इसलिए जैसे ही स्वदेशी जागरण मंच बना, वैसे ही फरवरी 1992 में पहली बार 15 दिनों का पूरे देश भर में हमने एक जन सम्पर्क अभियान लिया। लगभग तीन लाख गांवों में हमारे कार्यकर्ता गए। एक सूची दी, हमने कि स्वदेशी वस्तु क्या है, विदेशी वस्तु क्या है? साथ ही जनता से आग्रह किया कि अगर हमें इस आर्थिक संग्राम में विजयी होना है तो स्वदेशी वस्तु का अंगीकार करें और विदेशी वस्तु का बहिष्कार करें। इस आन्दोलन ने पूज्यनीय महात्मा गाँधी के नेतृत्व में जो एक आन्दोलन चला था, बहिष्कार का आन्दोलन, विदेशी वस्तुओं के होली जलाने का आन्दोलन, उसकी स्मृति को ताजा कर दिया।

7.और कारवां बढ़ता गया:
एक नये प्रकार का स्वदेशी-अंगीकार और विदेशी-बहिष्कार का आन्दोलन हुआ जिसकी गूँज भारतवर्ष के गाँव-गाँव तक पहंुची। सेकुलर कहे जाने वाले लोग, कम्युनिस्ट कहे जाने वाले लोग भी स्वदेशी जागरण मंच में आ गये। इसका पहला अखिल भारतीय सम्मेलन 3,4,5 सितम्बर 1993 को दिल्ली में हुआ और आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि उस सम्मेलन का उद्घाटन इस देश के बहुत बडे मार्क्सवादी विचारक और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने किया और उद्घाटन भाषण में उन्होंने कहा कि उन्हें उनके कई मित्रों ने इसमें आने के लिए मना किया था, क्यांेकि स्वदेशी जागरण मंच आर.एस.एस. का है। मित्रों की बातों को दरकिनार करते हुए मैं यहाँ आया हूं और मंच के माध्यम से, जस्टिस अय्यर ने कहा था कि देश का भला सोचने वाले सारे लोगों को अपने मतभेदों को दरकिनार करते हुए स्वदेशी के मंच पर आना चाहिये और देश में एक नया स्वदेशी आन्दोलन खड़ा करना चाहिए।
8. विरोधी बने समर्थक
जस्टिस अय्यर ने इस देश के नकली बुद्धिजीवियों को लताड़ा। कठित बुद्धिजीवियों के लिए कठोर शब्दों का प्रयोग किया। अंग्रेजी में उन्होने कहा कि आज के भारतीय बुद्धिजीवी अमेरिका के कालगर्लस् बन गये है। जस्टिस अय्यर ने राजनेताओं का आह्वान किया कि सारे मतभेदों को भुलाकर स्वदेशी जागरण मंच पर आइये। यह देश की आवश्यकता है। स्वदेशी जागरण मंच के प्रथम अखिल भारतीय संयोजक डाॅ. एम.जी. बोकरे बने। स्वयं डाॅ. बोकरे इस देश के गिने चुने माक्र्सवादी बुद्धिजीवियों में थे। डाॅ. बोकरे ने एक बडे़ ग्रन्थ ‘हिन्दु-इकोनोमिक्स’ की रचना की। डाॅ. बोकरे नागपुर विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर और अर्थशास्त्र के अध्यापक थे। उन्होंने अपने पहले उद्बोधन मे कहा कि माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी को जितनी गालियाँ नागपुर में पड़ी, उसमें देने वालों में पहला नाम डाॅ. बोकरे का था। वही बोकरे दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा स्थापित, स्वदेशी जागरण मंच के पहले संयोजक बने। उन्होंने कहा कि मैंने रिटायरमेन्ट के बाद हिन्दू धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया। जैसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र, शुक्रनीति, वेदों एवं उपनिषदों का। इनके अध्ययन के बाद मुझे लगा कि भारत में अर्थशास्त्र के अध्ययन की सुदीर्घ परम्परा रही है। इसके बाद मैंने हिन्दू इकोनोमिक्स लिखा। इस प्रकार स्वदेशी जागरण मंच का शुभारम्भ हुआ।
इसी तरह 1994 में हमने दूसरा अखिल भारतीय अभियान लिया। 1992 के अभियान में केवल सूची दी थी कि स्वदेशी अपनाओ और विदेशी हटाओ। 1994 के अभियान में हमने कुछ बातें जोड़ीं। सूची के साथ इस देश के संसाधन क्या है जल, जमीन, जंगल, जानवर, जन्तु इसका एक बड़ा व्यापक सर्वेक्षण किया। लगभग 3 लाख गावों में कार्यकर्ता इस अभियान में गये। और कई नये कार्यकर्ता हमसे जुड़ गये। जिनका अन्य बातों से विरोध था, वो भी साथ आये। चन्द्रशेखर जैसे समाजवादी ने भी हमारे अभियान का श्रीगणेश किया और देश के पाँच स्थानों पर हमारे अभियान में भाषण दिया। दिल्ली में स्वदेशी जागरण मंच के प्रेस कार्यक्रम में उनके आने से पूर्व वही पत्रक बाँटा गया जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक बालासाहब देवरस के नागपुर में स्वदेशी के कार्यक्रम में बाँटा गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो बात बालासाहब बोलना चाहते थे, इस आर्थिक संकट के बारे में, मेरा भी वही मत है, अतः मैंने उन्हीं का प्रेस ब्रीफ जानबूझकर पहले बंटवाया है।
चन्द्रशेखर जी समाजवादी थे, आरएसएस के आलोचक थे, लेकिन स्वदेशी के मंच पर आये। जार्ज फर्नाडीज़ बहुत बड़े समाजवादी नेता थे, एस.आर. कुलकर्णी पोस्ट एण्ड टेलिग्राफ वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष थे, वे भी स्वदेशी के मंच पर आये।
यहाँ तक तो बात रही, लेकिन देश के एक बडे़ वामपन्थी पत्रकार, सम्पादक शिरोमणि व विश्वप्रसिद्ध माक्र्सवादी निखिल चक्रवर्ती सम्पर्क में आये। वे स्वदेशी के कार्यकर्ताओं को (उनके पोशाक) देखकर भड़क गये, और कहे कि सब आरएसएस वाले हैं। जब एक कार्यकर्ता ने स्वदेशी का पत्रक दिखाया तो उसे वो बड़े ध्यान से देखते रहे और कहा कि लगता है आरएसएस ने नया शिगूफा छोड़ा है। अरे जनसंघ और आरएसएस, पूँजीपतियों और बनियों के पहले से दलाल हैं। और नयी आर्थिक नीतियों के कारण देशी पूँजीपति समाप्त होने वाले हैं, जिन्हे बचाने के लिए ये शिगूफा छोड़ा गया है। ये बातंे पत्रक पढ़ने के दौरान निखिल जी कह रहे थे। पत्रक पढ़ते-पढ़ते उनकी नज़र एक जगह अटक गयी और पूछा कि ‘‘क्या प्रचार कर रहे हो, आप लोग? टार्च में, जीप टार्च लेनी चाहिये, एवरेडी नहीं लेनी चाहिये?’’ अब निखिल चक्रवर्ती को पता था कि जो जीप वाली टार्च है उसे एक मुसलमान सज्जन बनाते हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं से पूछा - कि तुम्हें पता है कि जीप टार्च कौन बनाता है? तो एक कार्यकर्ता ने कहा कि हैदराबाद के अमन भाई बनाते हैं। ‘‘वो तो मुसलमान हैं, और तुम लोग आरएसएस वाले हो, उसका प्रचार क्यों कर रहे हो?’’ तो कार्यकर्ता ने कहा - ‘‘कुछ भी हो, जीप स्वदेशी है, इसलिए हम इसका प्रचार कर रहे हैं।’’ इतना सुनकर निखिल चक्रवर्ती का दिमाग फिर गया और जब वे देहरादून से दिल्ली आये तो एक लम्बा कालम लिखा, जिसमें देश के सभी विचारधारा वाले लोगों से आपसी मतभेद भुलाकर, स्वदेशी से जुड़ने का आग्रह किया। बाद में ३ मई १९९२ को मद्रास के एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा की हमें अपने नेतायो को चेतना होगा की ‘ अगर आप हमें गरीबी से नहीं बचा सकते तो कम से कम हमें बंधुआ मजदूर तो न बनाये.’ उन्होंने आगे कहा की ‘ हो सकता है कि’ लोग इस स्वदेशी आन्दोलन को पुरातनपंथी कहें, नहीं, यह पुरातन पंथी नहीं हे, बल्कि यह इस देश के पुनर्जागरण की भावना को जागृत करने का प्रयास है.”
इन सब बातो का जिक्र करने का उद्देश्य ये हे की शुरू में भी हमारे अभियान में बहुत लोग जुड़े, बहुत बड़े बड़े लोग जुड़े. समर्थक ताल थोक कर साथ खड़े हुए तो साथ-साथ पुराने वैचारिक विरोधी भी दिल खोल कर साथ चले. आज भी उसी बात की जरूरत है की मुद्दों को लेकर सबके साथ चलना चाहिए.

9.चला अभियान: पहला बड़ा संघर्ष – एनरोंन
एक बड़ा आवश्यक मुद्दा ध्यान में आया ’एनराॅन और एनराॅन (पावर क्षेत्र में मल्टीनेशनल कंपनी)। इस मुद्दे को स्वदेशी जागरण मंच ने 1995 में चलाया। इसने दावा किया की २४ घंटे सात दिन बिजली प्रदान करेगी, लेकिन ये मृग जाल था. वास्तव में ऐसा नहीं हुआ, परन्तु पैसा हमारी ही सरकार से लेकर लगाया था. बहुराष्ट्रीय कमपानियों के मकडजाल का जो हम वर्णन करते थे, ये उसका प्रगत रूप था. लोगो को समझाने के लिए प्रत्यक्ष उदहारण था सामने. हमने बड़े बौद्धिक दृष्टि से इसका अध्ययन किया एक डाॅक्यूमेन्ट बनाया ’एनराॅन देश के हित में नहीं है’ हमने ऐसी कोरी नारे-बाजी नहीं की। बड़ा अध्ययन करते हुए, काम करते हुए, हमने डाॅक्यूमेन्ट बनाया, लाया और उस आन्दोलन को हमने जमीन पर नेतृत्व देना शुरू किया। रत्नागिरि जिले में, जहां लड़ाई जमीनी स्तर पर हो रही थी और महाराष्ट्र में सरकार के विरोध में शरद पंवार की सरकार के विरोध में, एनराॅन को केन्द्र बिन्दु बनाकर, एक जबरदस्त जन-आन्दोलन हमने प्रदेश भर में चलाया, जिसका नेतृत्व स्वदेशी जागरण मंच ने किया, बहुत सारे लोग सहयोगी थे, समाजवादी और सर्वोदयीवादी। सारे लोग जुड़े लेकिन आन्दोलन को एक-एक कदम आगे बढ़ाने का काम स्वदेशी जागरण मंच ने ही किया। यानि नेतृत्व करने का कार्य मंच ने किया। उस समय ’फास्ट ट्रैक प्रोजेक्टस’ जो इलेक्ट्रीसिटी के लिए, कोई सात-आठ की संख्या में प्रोजेक्ट्स चल रहे थे, जिसमें एनराॅन एक था। उधर ’काॅजेस्ट्रिक्स’ कर्नाटक में आ रही थी। इस प्रकार की कई कम्पनियों को लाने का एग्रीमेन्ट आंध्र प्रदेश में भी हुआ था, तो एनराॅन को हम लोगों ने जैसे ही लड़ाई का मुद्दा बनाया, तो अन्य विदेशी कंपनियों के विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी हो गयी, कि जरा सावधानी से देखा जाए। देश और समाज, इस पर क्या संकेत देता है, इसको समझा जाए। उसके बाद निवेश करना या नहीं करना, देखेंगे, ऐसा निवेशकों को लगा।
धीरे-धीरे रफ्तार बिलकुल बन्द हो गयी। तो पूरे देश के वैश्वीकरण के विरोध में, स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाने वाला समाज का यह आन्दोलन हुआ। जिसका नेतृत्व हमने किया, लेकिन लड़ाई समाज ने लड़ी। समाज ने जो लड़ाई लड़ी वह कोई साधारण लड़ाई नहीं थी। बाद में नन्दीग्राम (बंगाल) की लड़ाई आम आदमी ने लड़ी। मामूली बात नहीं है कि जमीन की कीमत पांच लाख, दस लाख प्रति एकड़ तय कर दे, फिर भी किसानों का यह कहना कि हमें नहीं चाहिए। रत्नागिरी के किसानों ने ’हमें नहीं चाहिए’ कह कर यह लड़ाई लड़ी और हमने नेतृत्व किया। और कुल मिलाकर इस लड़ाई को वैश्वीकरण के विरोध में लड़ा गया। एनराॅन आन्दोलन, एक सफल शुरूआत था।
आन्दोलन को चलाने में, उठाने में, नेतृत्व देने में, लोगों को उस पर चर्चा में खींचने में, हम सफल हुए। इसकी घोषणा हमने कलकत्ता अधिवेशन में किया कि हम इसको पकड़ेंगे और इस पर हम लड़ेगे, फिर इस पर हम निर्णायात्मक लड़ाई लड़ेगे, हम इस पर आगे बढ़ेंगे। इस लड़ाई की एक और भी कहानी है, पहलु है. अब इस कहानी का प्रत्यक्ष रूप सामने आया कि इस लड़ाई के ’ग्रे’ एरिया भी है, कि जिन राजनेताओं के सहयोग से हम इस लड़ाई में आगे बढ़े, उनकी सरकार आने के बाद, उन्होंने एनराॅन के साथ समझौता किया।
13 दिन की राजग सरकार, और उसमें एक केबिनेट मीटिंग हुई। उसमें एक निर्णय हुआ। अल्पमत की सरकार, जो संसद में विश्वासमत का प्रस्ताव हार गई, लेकिन एनराॅन के समझौते पर केन्द्र सरकार ने अनुमति दे दी। तो इससे जन आन्दोलन को जबरदस्त धक्का लगा, लेकिन भगवान सच्चाई के पक्ष में रहते हैं। सच्चाई की जीत हमेशा होती है। सच्चाई की जीत को कोई रोक भी नहीं सकता। इसलिए, एनराॅन के जितने पहलू थे, उसकी कीमतों की दृष्टि से, उसके आधारिक संरचना की दृष्टि से, कम्पनी के प्रोफाइल की दृष्टि से, उस कम्पनी के अभी तक के कार्यों संबंधित जितने भी मुद्दे थे वह सबकी दृष्टि से, वह सब जिसने भी उठाने की कोशिश की, उसको उठाने के लिए, अपने पाले से पाला-बदल कर के कोशिश किया। लेकिन अन्त में हुआ यह कि, ‘एनराॅन, हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे’, के अन्दाज में यानि जिन लोगों ने एनराॅन को समर्थन दिया, उनके मुंह पर तमाचा लगाते हुए, डूब गया। साथ ही हमारे आन्दोलन में उतार-चढ़ाव आते रहे, हमारे लिए दिक्कतें भी रही। हमारे लिए चुनौतियाँ भी रही, लेकिन हमारा ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ बेदाग़ रहा, अडिग रहा. लड़ाई के प्रति हमारी प्रतिबद्धता, जनहित और राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों के प्रति निष्ठों, स्वदेशी नेतृत्व में लोगों में विश्वास भी पैदा हुआ।
हमारी कमजोरियाँ भी सामने आई होगी। लेकिन ’ये लोग अपने-पराये के लिए नहीं, राष्ट्रहित के लिए लड़ेंगे’ यह भी इसी संघर्ष ने स्थापित कर दिया। तो हमने इसे कलकत्ता अधिवेशन (1995) से प्रारम्भ किया। मूर्तिमान मुद्दो पर आन्दोलनों की घोषणा कलकत्ता सम्मेलन में की गई। आखिर दूर रहने वाले मुद्दों के बारे में केवल जागरण से नहीं चलेगा, कुछ मुद्दों को पकड़ कर, वैश्वीकरण के विरूद्ध लड़ाई को लड़ना है, इस घोषणा के बाद इस संघर्ष को आगे बढ़ाया।

10.पशुधन संरक्षण आंदोलन
कलकत्ता में हमने घोषणा की, -’पशुधन संरक्षण’। विकास और खेती के संकट को हमने उसी समय भांपते हुए कहा कि मानव पशुधन का जो अनुपात है, वह बहुत घटता जा रहा है, और अधिक यांत्रिक कत्लखानों को खोलनें के प्रयास सरकारों की ओर से हो रहे है। (आंकड़े) इतने कीमती पशुधन को, चाहे वह गाय है, या बैल है, या सांड है, जो केवल घास अथवा कृषि-अवशेष खाकर पूरे देश को दूध, दही, मक्खन और कृषि के लिए अनन्त मात्रा में खाद तथा बैल जुटाने वाले कीमती पशुधन को आप बड़े सस्ते दामों में बेचते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में, पशु को काट के कारखानों में, उसको पैक करके मध्य एशिया (मिडिल ईस्ट) में निर्यात करना, क्यों? निर्यात केंद्रित अर्थव्यवस्था, निर्यात केंद्रित विकास, किसी भी कीमत पर निर्यात को बढाना, यह जो चल रहा है, अगर ऐसा ही चलता रहा तो भारत के किसान और भारत की कृषि पर संकट खड़ा होगा।
यह कोई साधारण पशु बचाने वाली बात नहीं है। इसलिए ’अल-कबीर’ जो आन्ध्र में यांत्रिक कत्लखाना खोला गया था, उसके विरोध में स्वदेशी जागरण मंच की ओर से, तत्कालीन
राष्ट्रीय संगठक मुरलीधर राव के नेत्रित्व में सेवाग्राम (वर्धा) से अल-कबीर (आंध्र प्रदेश) तक की पदयात्रा की। 750 किमी. की पदयात्रा में अपार जन समर्थन मिला। एक माह की पदयात्रा का समापन एक जनसथा में किया गया। जिसमें विभिन्न पार्टियों के नेताओं के साथ-साथ लगभग 12 हजार लोग रूद्रारम या मेड़क जिले के एक कार्यक्रम में एकत्रित हुए । स्वदेशी केवल जागरण, चर्चा और संगोष्ठी के लिए नहीं, ’सड़क पर लड़ेंगे’, इस प्रकार के आयाम देने का काम हमने ’पशुधन संरक्षण यात्रा’ से किया।

11. सागर में संघर्ष
कलकत्ता सम्मेलन में जब चर्चा हो रही थी तो सच में देखा जाए तो, रैली निकालने में नारे देने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या भी हमारे पास पर्याप्त नहीं थी। अनुभव नहीं था, मंच पर भाषण देने वाले लोगों की संख्या भी पर्याप्त नहीं थी, लेकिन समाज में ताकत है। जब समाज के मुद्दों पर लड़ेंगे तो समाज आपके साथ आयेगा और जो-जो आप में कमियां है, उसे दूर कर देगा। महत्वपूर्ण निर्णय जो स्वदेशी जागरण मंच ने वहां लिया वह है ’सागर यात्रा’। वह बड़ी ऐतिहासिक यात्रा है। मुझे लगता है कि देश में कभी गत सैकड़ों वर्षों के इतिहास में ऐसा नहीं हुआ होगा कि सम्पूर्ण सागर की यात्रा की गई हो। इस यात्रा में नाव में बैठकर हर तट पर, हर गांव में सभा करते हुए नाव को आगे बढ़ाते जाना, और यात्रा करना क्या हुआ कि मछुआरे विवश हो रहे थे ? वैश्वीकरण के संकट से उत्पन्न बेरोजगारी के कारण परेशान हो रहे थे। क्योंकि सरकार, समुद्र की गहराई में मछली पकड़ने का काम, विदेशी कम्पनियों को, जो यांत्रिक पद्धति से मछली पकड़ने वाली एवं ’मेकेनाइज्ड फिशिंग’ करने वाली कम्पनियों को लाईसेन्स दे चुकी थी। अन्धाधुन्ध रूप से, हर तरफ, अनाप-शनाप, भारी मात्रा में मछली पकड़ना और इस प्रक्रिया में जो मछलियाँ और समुद्री जीव मर जाते उनको समुद्र तटों पर फेंकना, इस तरह प्रदुषण, बेरोजगारी और अस्तित्व का संकट था। तो हमारे पास मछुआरों में कार्यकर्ताओं की बड़ी टोली या नेटवर्क नही था। कोई संगठन भी साथ नहीं था। कोई इकाईयाँ भी नहीं था। स्वदेशी जागरण मंच ने तय किया कि यह देश का मुद्दा है, इसके लिए लड़ना है। तो कल्पना कीजिए कि एक तरफ दो हजार, एक तरफ तीन हजार किलो मीटर की समुद्र यात्रा करते हुए, त्रिवेन्द्रम में हमने अन्तिम कार्यक्रम किया। फादर थामस कोचरी के नेतृत्व में पहले से चल रहे आंदोलन को श्री सरोज मित्रा एवं लालजी भाई ने नई दिशा प्रदान की और हम देश की लड़ाई के नाते, इसे उभारने में सफल हुए।

बड़ा विचित्र, कई बार आपको लगता है। अल-कबीर का आन्दोलन करते समय जो जैन-समाज के लोग हमारा समर्थन कर रहे थे वहीं मछुवारों की लड़ाई में हमारा विरोध कर रहे थे। वो कहते थे, आप मछुआरों की लड़ाई क्यों लड़ रहे हो, वे मांसाहारी हैं। लेकिन हमने उन्हें समझाया कि यह शाकाहारी या मांसाहारी का विषय नहीं है। ’राष्ट्रहित के नाते हमने इस लड़ाई को लिया’ और अन्त में उसमें हमने सफलता प्राप्त की।

मुरारी कमेटी की रिपोर्ट पर सरकार को विवश होकर बड़े विदेशी ट्राले के अनुबंध को रद्द करना पड़ा। क्योंकि पूरे समुद्र तट पर मछुआरों का जो समाज है वह संगठित हो गया। उसमें इसाई, मुसलमान, हिन्दू - सब साथ आ गये। स्वदेशी जागरण मंच इन सबको साथ ले चलने में सफल हुआ। हमने अलग से अपना नेतृत्व चलाने का कभी प्रयत्न नहीं किया तो भी हम इसमें सफल हुए। इस प्रकार से, जिसको मुद्दों के माध्यम से वैश्वीकरण के विरोध में लड़ाई को खडा करना कहते है। हमने इन विषयों को आगे बढाना शुरू किया।
12. मिनी सिगरेट विरुद्ध बीडी आन्दोलन
:फिर बाद में अभियान पर अभियान हम लेते गये। फिर बीड़ी वालों के लिए भी हमने अभियान लिया। हम सब जानते है कि बीड़ी बनाने वाले लोग मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, आदि प्रांतों में हैं। इन प्रान्तों में तेंदुपत्ता से बीड़ी बनाते हुए अनेकों महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है। आई.टी.सी. जैसी बड़ी कम्पनियों को ’मिनी सिगरेट’ के लिए परमिशन मिल गया, तो उनके साथ कम्पीटिशन होता। तो ऐसे में, हमने कहा कि यह नहीं चलेगा। इतने सारे रोजगार समाप्त करके कैसे चल सकता है? इसके लिए हमने ’बीड़ी रोजगार रक्षा आन्दोलन’ चलाना शुरू किया और इसके लिए समन्वित प्रयास हमने प्रारम्भ किये और ये प्रयास भी सफल हुए। सारे आन्दोलनों में हम सफल हुए। बीड़ी रोजगार बचाने में हम सफल हुए। इस प्रकार से, मुद्दों को उठाते हुए, आन्दोलन चलाने का काम किया, और हम आगे बढ़ते गये।
13. जनसंचार (मीडिया) को विदेशियों के हाथों में पड़ने से बचाया
इसी क्रम में मीडिया में विदेशी निवेश की बात चली। आप जानते है 1955 के केबिनेट डिसिजन के बारे में। उपनिवेशवाद के बाद भारत की केबिनेट ने यह तय किया था कि ’अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार (राइट टू इन्र्फोमेशन)’ जो है वह केवल अपने नागरिकों के लिए है। इसलिए अखबार जो है वह जन-जागरूकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार के तहत आता है, इसलिए विदेशी नागरिकों के लिए इस देश में अखबार चलाने का अधिकार नहीं रहेगा। ऐसा उन्होंने तय किया था, अब उसको बदलने के बड़े प्रयास हुए, तो इसके विरोध में लड़ाई को हमने आगे बढ़ाया। लड़ाई चलती रही। कहीं हारे कहीं जीते और अंत में, 26 प्रतिशत प्रिन्ट मीडिया में विदेशी निवेश आया। लेकिन उसका लाभ यह हुआ, कि बाद में मीडिया यानि केवल प्रिन्ट मीडिया नहीं है, तो फिर अन्त में स्टार चैनल भी स्वदेशी हो गया, सारे विदेशी चैनल स्वदेशी हो गये। क्योंकि टोटल ग्रोस मीडिया जो भी है, उसमें 26 प्रतिशत से ज्यादा मीडिया में विदेशी निवेश नहीं हो सकता। इस लड़ाई को लड़ते रहने के कारण, लगातार दबाव बढ़ाने के कारण, हम अपना पूरा मीडिया जो आज है, जो पचासों चैनल आप देखते है, न्यूज का, हर स्टेट का दो-तीन चैनल्स है (उडि़या का भी चैनल्स है, तमिल का भी चैनल्स है, तेलगू का भी चैनल्स है, जितने भी चैनल्स है), पूरी तरह हमारे देश के लोगों के हाथों में है। इसका व्यापार हमारे देश के लोगों के हाथों में है। सूचना तंत्र भी हमारे देश के लोगों के हाथों में है। इसके अनुभव भी हमारे देश के लोगों के हाथों में हैं, तो इसी बलबूते वैश्विक स्तर की क्षमताओं को हमने अपने यहां विकसित किया।
14. दूरसंचार (टेलिकम्यूनिकेशन) भी बची
उसी प्रकार टेलिकम्यूनिकेशन के विषय में हमारी लड़ाई चलती रही। अगर सरकार की मर्जी चलती, अगर सरकार का वश चलता तो 100 प्रतिशत विदेशी कम्पनियों को अनुमति होती। वे तो शुरू ही 100 प्रतिशत से करते। लेकिन हमने कहा कि टेलिकम्यूनिकेशन में जो रिवोल्यूशन आ रहा है, उसका लाभ देशी उद्योगों को, छोटे उद्योगों को चलाने वालों को भी मिलना चाहिए।
कल्पना कीजिए कि अगर वोडाफोन जैसी विदेशी कम्पनियां पहले आ जातीं, तो जैसी स्थिति हम रेनबेक्सी के सम्बन्ध में सुन रहे है, जैसी स्थिति हम पेप्सी और कोका कोला की देख रहे है, वैसी स्थिति हम टेलिकम्यूनिकेशन में भी देखते। तो हमारी लड़ाई के कारण आज आप देखते है कि भारतीय उद्यमी चाहे वह एयरटेल हो, श्याम टेलिलिंक हो, आइडिया हो, रिलायंस हो, टाटा हो (सब इण्डियन कम्पनीज़ हैं), भारतीय पहचान के नाते जम गये और बी.एस.एन.एल. की कहानी तो और है। तो इस प्रकार टेलिकम्यूनिकेशन को देशी हितों के लिए बचाना, बीमा को देशी हितों के लिए बचाना, बीड़ी के विषय में आगे बढ़ाना और जितने मुद्दे हैं, सब हमने लड़े। उन सब पर हम लड़ते गये, लगातार संघर्ष करते गये।

15. क्या क्या बताये तुमको, दर्दे वतन कहानिया:
कहानिया चेतना यात्रा, संघर्ष यात्रा और मुद्दों को लेकर आन्दोलन, महाधरना, यह सब हम करते गये। ये सब, आन्तरिक वैश्वीकरण के जितने प्रयास है, ये उनके विरोध में है। एक और महत्व के मुद्दे अर्थात् भारतीय रूपये की पूर्ण परिवर्तनीयता के बारे में आज भी लगातार हमारी लड़ाई जारी है, जिसको वित्तीय भूमंडलीकरण (फाइनेन्शियल ग्लोब्लाइजेशन) कहते है, के लिए रूपये की पूर्ण परिवर्तनीयता करना आवश्यक है। जिसके विरोध में स्वदेशी जागरण मंच लगातार संघर्ष कर रहा है।
चार्टर्ड एकाउंटेन्ट्स की सेवाओं (सर्विसेज) के भूमंडलीकरण (ग्लोब्लाइजेशन) के विषय में हमने लड़ाई शुरू की। हमने कन्वेंशन्स किये, दिल्ली में, मुम्बई में, बैंगलूर में, चैन्नई में, हजारो-हजारों चार्टर्ड एकाउंटेन्ट्स के हमने कन्वेंशन्स किया, हमारे देश के सी.ए. क्या चाहते है? ’लेवल प्लेइिंग फील्ड’ (बराबरी) चाहते है। तो इस प्रकार से वकीलों के विषय में भूमंडलीकरण नहीं चल सकता। हमारे वकीलों को पहले बराबरी पर लाओ, इसलिए हमने वहां सर्विस सेक्टर की लड़ाई शुरू की, उनके साथ मिलकर लड़ाई चलाई। ऐसे बहुत से मुद्दे हैं। इन मुद्दों को हम एक के बाद एक लड़ते गए। गिनती करते जायेंगे तो इसमें और दस मुद्दें जुड़ेंगे। तो हम इस लड़ाई में आगे बढे।
16. आंतरिक विनिवेश
इस लड़ाई का एक और पहलू है, वह है सरकारी कंपनियों का ’विनिवेश’ (डिसइन्वेस्टमेन्ट)। चली चलाई मशहूर कंपनियों को औने पौने दामो पर नहीं, बल्कि कोडियो के दाम बेचने की कुत्सित चल चली गयी, तो हमने विरोध किया. डिसइन्वेस्टमेन्ट चाहे नरसिंह राव की सरकार में, मारूति के सन्दर्भ में, कांग्रेस की सरकार के विरोध में, एन.डी.ए. सरकार के विरोध में, और सारी सरकारों के विरोध में डिसइन्वेस्टमेन्ट का मुद्दा, सैद्धान्तिक पक्ष की बात नहीं है, . पब्लिक सेक्टर में मोर्डन ब्रेड को हमें चलाना चाहिए या नहीं चलाना चाहिए, अभी इस मुद्दे को जरा बगल में रखदे. , लेकिन, हमारे देश की इतनी बड़ी संपत्ति है, जमीन है, इतना बड़ा ब्राण्ड है, उसको आप औने-पौने दाम पर बेचकर, पूंजीपतियों को दान कर रहे है। कई जगह एकाधिकार स्थापित करने के लिए, मोनोपोली लाने के लिए, जैसे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का जो ट्रेड है, उसमें रिलायंस का एकाधिकार स्थापित करने का काम, एन.डी.ए. सरकार के जमाने में हुआ। पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के टेªड में जो कम्पनी है, उनका डिसइन्वेस्टमेन्ट कर दिया, और उसके रहते हुए आज पूरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की, पूरे देश में उसका एकाधिकार है। रिलायन्स के एकाधिकार के समर्थन में, बड़े अजूबे ढंग से तर्क दिया गया, उस समय के मंत्रालय चलाने वाले लोगों ने। तो हमने विरोध किया। हम तर्कों को सामने लाएं, हमने पूरे देश में डिबेट, एक बहस को छेड़ दिया। इस बहस का अगर कोई केन्द्र था तो वह स्वदेशी जागरण मंच था।
भारत पेट्रोलियम व हिन्दुस्तान पेट्रोलियम इन दोनो को या इनमें से किसी एक को बेचना चाहते थे और इसको विदेशी ’शैल कम्पनी’ या रिलायंस कम्पनी दोनांे लेना चाहती थी यानि एक दम धंधा बेचने के जैसा। जिसमें फायदा किसी और को कितना हो, परन्तु हमारे देश को घाटा ही घाटा था । जहां आप बेच भी सकते है ऐसे क्षेत्रों में, जहां सिद्धान्त रूप में विरोध नहीं है वहां भी, जैसे 31 करोड़ में होटल बेचा गया, सिद्धान्ततः होटल के विनिवेश के हम विरोध में नहीं है लेकिन देश की सम्पतियों को जिस प्रकार की पद्धतियों से बेचा गया, उसके कारण विनिवेश लगातार हमारी लड़ाई का एक मुद्दा रहा।
बी.एस.एन.एल. को कमजोर करना चाहते थे, डिसइन्वेस्टमेन्ट करना चाहते थे, तो हमने कहा कि इसको कमजोर करोगे, तो टेलिकोम मार्केट का अभी जो प्रतिस्पद्र्धा चल रहा है, उसमें ग्राहक के हित में भी सोचना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिस्पद्र्धा को बनाए रखना सम्भव नहीं है। इसलिए प्रतिस्पद्र्धा में बनाए रखने के लिए भी एक कम्पनी रहनी चाहिए। इस दृष्टि से हमने तर्कों को आगे बढ़ाते हुए, राष्ट्रहित को मजबूत रखने के लिए जो आवश्यक है वह किया। विनिवेश हमारे लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और हम लड़ते रहे हैं।
17. दूसरा नमक आन्दोलन:
नमक के विषय में, आयोडिन नमक!
जहां नमक के विषय को लेकर पूज्य महात्मा गांधी ने लाखों लोगों को साथ लेते हुए आन्दोलन किया। दांडी मार्च किया। उस ’दांडी मार्च’ की शताब्दी समारोह मनाकर सत्ता में आये लोग, सत्ता का सुख भोग रहे लोग, दांडी मार्च इतिहास को भुलाना चाहते है। कहीं किसी व्यक्ति को गण्डमाला (गाॅयटर) हो रहा है, इस नाम पर कम्पनियों को नमक की कीमतों को अनाप-शनाप बढ़ाने का एकाधिकार दे दिया जाता है। आयोडिन नमक के नाम पर कुछ बड़ी कम्पनियों को नमक के क्षेत्र में एकाधिकार हो गया। आयोडिन नमक की अनिवार्यता का विरोध करते हुए हमने कहा कि आयोडिन नमक के नाम पर बड़ी कम्पनियां अनाप-शनाप मुनाफाखोरी करके लोगों का शोषण कर रही है।
जिस तरह से आयोडिन को नमक के साथ, दिया जा रहा है, उस तरह से यह भारत में चल ही नही सकता। जिस तरह से हम सब्जियों में नमक मिलाते है, उससे आयोडिन का मतलब ही नहीं रहता। ऐसे बहुत सारे तर्को को हम सामने लाये। डाॅक्टर्स, विशेषज्ञों (एक्सपर्ट्स) को हमने साथ लिया, लड़ाई आगे बढ़ाई और फिर हमने ’दांडी मार्च’ की घोषणा करते हुए कहा कि या तो आप रहेंगे या हम रहेंगे। कार्यक्रम पर कार्यक्रम चलेंगे और एक बार जनता के कार्यक्रम चलेंगे तो आपके नियन्त्रण में नहीं रहेंगे। जब आन्दोलन शुरू हुआ तो फिर सरकार ने निर्णय लिया कि आयोडिन नमक के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, अनिवार्यता समाप्त करते है।
बाद में फिर सरकार बदली, दूसरी सरकार आयी, तो फिर इस विषय को आगे क्यों बढ़ाया ? क्योंकि काॅर्पोरेट इन्ट्रेस्ट, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित जो है, वे लगातार इसको आगे बढ़ाने में अपनी पूरी ताकत लगाते हैं. हमने भी इस मुद्दे पर सड़क, संसद, से लेकर सर्वोच्य न्यायलय तक ये लडाई लड़ी, और अभी तक चल रही है. तो हम कई मुद्दों पर लड़ते है, आंशिक सफलता प्राप्त करते है, कई मु द्दों पर सफलता प्राप्त करते है, कई मुद्दों पर गति को रोकने में हमें सफलता मिली, तो इस प्रकार से आयोडिन नमक के विषय पर हमने लड़ाई लड़ी। यह लडाई हम कोर्ट में भी लड़ रहे हैं।
18. बौद्धिक लड़ाई
ये सारे एक अध्याय है, एक आयाम है, तो दूसरी तरफ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) की नीतियों के खिलाफ देश में बौद्धिक जागरूकता का कार्य भी करना होता है। इस देश में बौद्धिक सम्पदा (इण्टेलेक्चुअल प्रोपर्टी) अधिकार विषय पर सारे पक्षों को एक मंच देने का कार्य स्वदेशी जागरण मंच ने किया। इस लड़ाई को कभी कोई लिखेंगे तो इसे स्वर्ण अक्षरों से लिखना पड़ेगा, यह एक स्वर्णिम अध्याय है, कि बालकृष्ण केला जी ने एक अकेले, पहल करते हुए, चार-पांच लोगों को साथ लेकर लड़ाई लड़ी। हमेशा हर विषय पर बौद्धिक दृष्टि से, सब सांसदों को, सभी संगठनों को, सभी आन्दोलनों को दिशा देना कोई शुल्क लिए बगैर, बैंगलोर जाना है, मुम्बई में समझाना है, हैदराबाद में कार्यक्रम में जाना है, साहित्य देना है, हजारों की संख्या में पुस्तकों को बांटना, यह काम वो करते रहे, और इन सभी कार्यों को करने में हम साथ रहे। जन-जागरण में हमने अग्रिम भूमिका निभायी। हमसे ज्यादा किसी ने भी देश में विश्व व्यापार संगठन के खिलाफ बड़े कार्यक्रम नहीं कियेे। अनेक लोगों ने किये, कई संगठनों ने किये, हम उनके खिलाफ नहीं है, हम उनके साथ है, हमारा समन्वय है, लेकिन किसी एक आन्दोलन ने, इसे लगातार चलाया और जनता में एक जन-दबाव उत्पन्न करने का प्रयास किया, वह स्वदेशी जागरण मंच ने किया।
इसमें बहुत अध्याय है, बौद्धिक सम्पदा अधिकार हो, सिंगापुर मुद्दे हो, दोहा विकास हो, या सियाटेल और काॅनकुन सम्मेलन के फेल्योर हो, ’नो निगोशियेशन्स, वी वाॅन्ट रिव्यु आॅफ डब्ल्यू.टी.ओ.’ ’नो न्यू निगोशियेशन्स आॅनली आॅल्ड कण्डीशन हेव टू बी फुलफिल्ड’। इस प्रकार से मुद्दों को समय-समय पर आगे बढ़ाते गये। डब्ल्यू.टी.ओ. अन्तर्विरोधों के कारण रूक गया, उसकी गति मन्द पड़ गई, उसमें हमारी भूमिका भारत के सन्दर्भ में कम नहीं है। (नोवार्टिस, नायेर्स, सिप्ला आदि के मुद्दों का भी जिक्र करना चाहिए)
19. खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश: कभी स्वीकार नहीं
डब्ल्यू.टी.ओ. के विषय पर हमने रामलीला मैदान पर अनेकों कार्यक्रम किये। उसी प्रकार एक अन्य मुद्दा आया - खुदरा व्यापार (रिटेल ट्रेड)। रिटेल ट्रेड का मुद्दा आज का नहीं है। यह बहुत पुराना मुद्दा है। मनमोहन सिंह की सरकार के समय ’रिटेल ट्रेड’ मुद्दा था और चिदम्बरम उसको आगे बढ़ाना चाहते थे। इसके विरोध में उसी समय से हमारे कार्यक्रम शुरू हुए। महाराष्ट्र में जो ’फेहमा’ संगठन है, उस संगठन के साथ मिलकर हमने समन्वय किया और उनको आगे बढ़ाया। हम सबसे मिलते गये, और बाद में मनमोहन सिंह भी विपक्ष में आये, तो रिटेल ट्रेड के आन्दोलन को सहयोग मिला। बाद में फिर दुबारा सरकार में आये तो फिर सरकार के रूख को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के खतरे छोटे, फुटकर व्यापारियों पर है। इस विषय पर हमने विभिन्न स्थानों पर अनेकों सम्मेलन किये।
खुदरा व्यापार के आन्दोलन को अखिल भारतीय स्तर पर उठाने वाला और चलाने वाला, गैर-खुदरा व्यापारियों का संगठन अगर कोई है, तो वह स्वदेशी जागरण मंच है। गत 15-16 वर्षों से, आज जो आप देख रहें है, वह सब स्वदेशी जागरण मंच की आन्दोलनों में सक्रियता का फल है। स्वदेशी जागरण मंच के नेतृत्व में 25 जुलाई 2005 को अखिल भारतीय खुदरा व्यापार सम्मेलन दिल्ली के कांस्टीटयूशन क्लब में किया गया। देश के उतरी क्षेत्र के मात्र पांच प्रान्तों में ही दूकानदारो से हस्ताक्षर अभियान में लगभग ४० हज़ार लोगो की भागीदारी का काम हुआ.
20.‘सीमा की रक्षा-बाजार की सुरक्षा’ अभियान –
पिछले कुछ वर्षों से चीन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन कर उभरा है। जहां भारत का रक्षा बजट 37 अरब डाॅलर है तो चीन का 131 अरब डालर। जहां भारत 13 अरब डालर का निर्यात (ज्यादातर कच्चा माल) चीन को करता है वहीं 54 अरब डालर का तैयार माल आयात करता है। साथ ही चीन ने एक लाख साईबर हैकर्स की सेना भी नियुक्त कर रखी है।
मंच ने देश का ध्यान चीन से संकट की ओर खीचने के लिए व्यापक अभियान चलाने का निर्णय किया। इस अभियान में मोटे तौर से तीन प्रकार की चुनौतियों को केन्द्र बिन्दु बनाया गया एवं तथ्यपरक जानकारी जनता तक पहुंचाई गई-

1. सीमा एवं सैन्य चुनौती
2. लघु उद्योग/व्यापार सहित आर्थिक चुनौती
3. दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी सहित साईबर चुनौती
इस अभियान में मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक प्रो. भगवती प्रकाश ने गहन अध्ययन के उपरांत 53 पृष्ठ की एक पुस्तक ‘चीनी घुसपैठ एवं हमारी सुरक्षा व्यवस्था’ का लेखन किया एवं मंच ने उसका प्रकाशन किया। प्रो. भगवती प्रकाश के नेतृत्व में 39 सदस्यों की टोली को इस अभियान के संचालन का दायित्व दिया गया एवं पूरे देश को 4 जोन में बांट कर अभियान चलाया गया।
दिनांक 1 सितंबर 2013 से 2 अक्टूबर 2013 तक चले इस अभियान में 20 प्रांतों में 4088 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए। (इसमें स्कूल, काॅलेज, पंचायत, नगर, पुतला दहन, पत्रकार वार्ता, रेली, मोटरसाईकिल रेली आदि सम्मिलित हैं।) महाराष्ट्र प्रांत में बडात्या उत्सव में 80 फुट ऊंचा चीन का पुतला दहन किया गया। इसमें लगभग 3 लाख लोगों ने भाग लिया। राजस्थान प्रांत ने इस अभियान हेतु विशेष रूप से वक्ता प्रशिक्षण वर्ग आयोजित किया, जिसमें 42 प्रशिक्षुओं ने भाग लिया।
इन कार्यक्रमों में चीन से संबंधित 11 लाख हस्त-पत्रक एवं प्रो. भगवती प्रकाश द्वारा लिखित 1,20,000 पुस्तकें (हिन्दी व अन्य प्रांतीय भाषाओं) वितरित की गई एवं समाज के अनेक संगठनों का सहयोग प्राप्त करने में सफलता प्राप्त हुई। देश के मीडिया/समाचार पत्रों ने प्रमुखता से इन कार्यक्रमों को स्थान दिया। मंच के हजारों कार्यकर्ताओं ने इसमें सक्रिय रूप से योगदान किया।
इस अभियान के फलस्वरूप देश की सरकार, राजनेता, मीडिया, अफसरशाही, सामाजिक संगठन एवं जनता का ध्यान इस संकट की ओर व्यापक स्तर पर आकृष्ट हुआ तथा आज बच्चे-बच्चे की जुबान पर चीन के संबंध में चर्चा की जा रही है।
इसके अतिरिक्त और भी बाते है जो हमने मिल कर की. वैश्विक सम्मेलनों के समय अपनी तेयारी और सरकार की भी तेयारी, दोनों हमने की. इसी प्रकार बी टी बेंगन से लेकर जी एम् फूड्स की लडाई, न्हूमि अदिग्रहण से लेकर कोका कोला पेप्सी की लूट की नीतियों और स्वस्थ्य को धत्ता बताने वाली चालाकियो के खिलाफ हम खड़े और खड़े.
21. स्थानीय मुद्दे, - मारो कहीं, पड़े वहीँ .... राज्यवार आंदोलन - हिमाचल प्रदेश में स्की-विलेज, कुल्लू जिला में, और सेज के खिलफ आन्दोलन, जिला ऊना. आंध्र प्रदेश में बुनकर व हल्दी खाड़ी देशों में गए मजदूरों के हित मे आंदोलन, पुरी (उड़ीसा) में वेदांता यूनिवर्सिटी विरोधी आंदोलन, पोस्को और रेंगाली राईट नदी के लिए आन्दोलन. बंगाल के आलू उत्पादकों की समस्या पर आंदोलन। केरला में भी कोका कोला कंपनी के द्वारा चलाये जा रहे प्लाचीमाडा में आन्दोलन. इन सब में भी बहु राष्ट्रीय कंपनियों द्वारा स्थानीय स्तर पर जो लूट का धंधा चलता था, उसके खिलाफ स्थनीय लोगो को जोड़ कर, जिसका मुद्दा, उसकी लड़ाई, उसकी अगुआई; इस आधार पर आन्दोलन चलते रहे और सफलता पाते गए,

देश मे पहली स्वतन्त्रता का प्रतीक थी-खादी और अब दूसरी स्वतन्त्रता का प्रतीक बनेगा जैविक खाद। देवघर अधिवेशन में हमने नया नारा दिया - ‘‘तब खादी, अब खाद’’। विकास का ढ़ाँचा भारतीय चिन्तन के आधार पर कैसा होना चाहिए? केवल वस्तु तक सीमित ना रहकर, इन विचारों को आन्दोलन रूप देना जरूरी है। विकास की भारतीय अवधारणा को लेकर स्वदेशी जागरण मंच आगे बढ़ रहा है। पूरी दुनिया में स्वदेशी आन्दोलन को मान्यता मिल चुकी है। स्वदेशी का आन्दोलन दुनिया का आधुनिकतम आन्दोलन है। अमेरिका सहित कई देशों में स्वदेशी का आन्दोलन चल रहा है। अमेरिकी संसद में ‘‘बी अमेरिकन, बाॅय अमेरिकन’’ का प्रस्ताव लाया गया है। स्वदेशी का विचार अर्थशास्त्र का आधुनिकतम विचार है। स्वदेशी का आन्दोलन आज अभिनन्दन का विषय बन गया है। इसमें भी हमने कोई संकुचित दायरे में नहीं देखा, हम लड़ाई का नेतृत्व करते गये, लेकिन हमने सबको साथ लिया। अगर कोई और आगे बढ़ रहा है, तो उसका हमने साथ दिया। ’फोरम आॅफ पारलियामेन्ट्रेरियन’ कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। इसको भी बनाने में हमने साथ दिया और ’वर्किंग ग्रुप आॅन पब्लिक सेक्टर युनिट’ के निर्माण में साथ रहे। जो भी लड़ रहे थे वे चाहे कम्यूनिज्म से प्रेरित हो, राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित हो या अन्य किसी विचार से प्रेरित हो, सभी के साथ मिलकर समन्वय करते हुए, इन सारे डब्ल्यू.टी.ओ. मुद्दों को हमने आगे बढ़ाया। विश्व व्यापार संगठन की बैठकों में धीरे-धीरे हमने अपने प्रतिनिधियों को भी भेजना शुरू किया। काॅनकुन, हांगकांग, जेनेवा, बाली मिनिस्ट्रीयल मीटिंग में स्वदेशी जागरण मंच के प्रतिनिधि गये। इस प्रकार स्वदेशी जागरण मंच ने 24 वर्षों के अन्दर अनेकों आंदोलनों की एक श्रृंखला की। अगर आप संगठन की क्षमता और सम्भावना देखेंगे तो अभी भी आपको संदेह हो सकता है, लेकिन हमारी ताकत क्या है? क्यों यह सब कर पाये? मुद्दों में जो ताकत होती है उसके कारण, मुद्दे उठाकर हम आगे बढे, तो समाज ने साथ दिया। मछुआरों का विषय हो, पशुधन का विषय हो, डब्ल्यू.टी.ओ. का विषय हो या और अन्य विषय हो, इन सभी विषयों में सम्पूर्ण समाज स्वदेशी जागरण मंच के साथ खड़ा रहा तथा अन्य वैश्विक संगठनों का भी साथ लिया गया।

Thursday, July 2, 2015

राष्ट्रीय परिषद् विजयवाडा दिनांक 27-28 जून 15

राष्ट्रीय परिषद् विजयवाडा दिनांक 27-28 जून 15

१. कुल संख्या रही १२० परन्तु कह नहीं सकते की कितने लोग उसमे से इस सूची में से आये जो की हम कह रहे है परिषद् की सूची है.

२. आम शिकायत रही कि लोगों को भागीदारी करने का ज्यादा अवसर नहीं मिला. जो कुछ थोडा मिला भी तो वो मेरे आधे घंटे या 45 मिनट्स में से था जो की सत्र था संगठनात्मक बातों का. दूसरी शिकायत रही कि प्रस्तावों का लिखित स्वरूप न तो चर्चा के पहले मिला और नो ठीक से बाद में ही. हर बार लम्बी भूमिका तो बाँधी जाती है लेकिन लोगो के बोलने का समय नहीं दिया जाता.

३. व्यवस्था पक्ष की सबने सराहना की. भोजन, स्थान का चयन, सेवा भावना आदि सभी बातें लोगों को अच्छी लग रही थी. अधिकारी व्यवस्था और आम कार्यकर्ता की व्यवस्था स्थली में थोड़ी दूरी थी, लेकिन अधिकाँश समय तो कार्यक्रम में इकट्ठे ही रहे, इस लिए कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई. सभी को भेंट में वस्त्र मिला और वो भी अच्छे ढंग का सूती वस्त्र, अतः लोगों ने ठीक ही मन.

४. कार्यक्रमों में उपस्थिति भी लगभग ठीक रही. घूमने फिरने का स्थान भी बहुत दूर नहीं था अतः जो लोग गए भी तो समय से लौट आये. महिलायों की संख्या भी 5-6 रही और एक, श्रीमती जगतसिंह को छोड़ कर कोई भी घूमने फिरने नहीं बल्कि भाग लेने ही आई थी.

५. दो प्रस्ताव पारित हुए. पहला था स्वस्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थो पर अंकुश, जो की मग्गी प्रकरण से सम्बंधित था. इसको श्री भगवती जी ने तेयार किया और पढ़ा. दूसरा था श्री अश्वनी जी द्वारा तेयार किया पून्जिखाते में रुपये की परिवर्तनीयता अवांछनीय, जो की थोडा कठिन विषय तो था लेकिन लम्बे समाये से स्वदेशी जागरण मंच इस पर विचार करता रहा है.

६. अन्य विषय : इसके अतिरिक्त कई विषयों पर चर्चा हुई यथा प्रो.कुमारस्वामी जी ने पर्यावरण के विषय को लेकर पिछले दिनों पर्यावरण पर बनी हाई लेवल समिति की रिपोर्ट चर्चा की. शायद इस विषय पर उन्होंने एक छोटा लेख भी तेयार किया है. श्री सुन्दरम जी ने वर्तमान आर्थिक परिद्रश्य पर अंग्रेजी में एक विषय लिखित में तेयार किया और बोला भी. श्री धनपत राम जी ने भी अपना आईपीआर का विषय रखा, सिर्फ १२ मिनट्स में मात्र और अच्छे ढंग से.

७. प्रांत अनुसार संख्या: अभी प्राप्त करनी है और लिखनी है और यदि संभव हुआ तो उनलोगों को एक एस एम् एस भेजना जो आये थे और बाकी को एक पात्र लिखना या sms करना जो नहीं ए थे. साथ ही एक अपेक्षा भी करना की आपने क्या क्या करना है. अपेक्षा है की एक विचार वलय चलाये और साथ साथ ही आगे के आन्दोलनों को चलाने के लिए भी तेयारी करें. पत्रिका, पत्रक, प्रचार, प्रदर्शन, एवं प्रवास/प्रवाह आदि विषयों की और भी ध्यान देना. एक विचार ये भी आया की कुछ विषयों का वृत्त हर बार लिया जाये, यथा कुल कितने जिले, और कार्ययुक्त जिले, कुल कार्ययुक्त स्थान या ग्रामीण और नगरिया इकाईयां. कई बार हम प्रांतीय, विभागीय, और जिले स्तर के कार्यकर्तायों की संख्या और उनकी सक्रियता की बात भी करते हैं. इसी प्रकार विचार वलय आदि का विषय भी बार बार पूछना चाहिए.

८. अन्य अनुवर्ती प्रयास: सूची जो की परिषद् की हे उसको ठीक करना है और साथ साथ ही अगली कार्यकारी मंडल की बैठक को भी व्यवस्थित सूची के आधार पर करना चाहिए और जो बाते हमने इसमें अधूरी पायी हैं उनको उसमे दूर करना चाहिए.



ashmiri Lal

12:35 AM (6 hours ago)
to me
Resolution - 1
स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य पदार्थों पर प्रभावी अंकुश की आवश्यकता

भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण द्वारा नेस्ले जैसी छः लाख करोड़ रूपये की वार्षिक कारोबार वाली विदेशी कंपनी द्वारा मैगी जैसे जहरीले पदार्थों से युक्त खाद्य उत्पादों व बिक्री की लंबे समय तक अनदेखी के बाद अब अंततः उन्हें वापस लेने का आदेश देने को बाध्य होना पड़ा है। ऐसे ही जंक फूड कहलाने वाले उच्च वसा, चीनी व नमक युक्त अस्वास्थ्यकर आहारों के संबंध में उच्च न्यायालय के आदेशों के बाद भी ऐसे अस्वास्थ्यकर आहारों के संबंध में बनाये मार्गदर्शी प्रावधानों में भी इतनी अधिक कमियां छोड़ दी है कि इन अस्वास्थ्यकर आहारों की विद्यालयों में बिक्री पर प्रभावी रोक व नियंत्रण संभव नही होगा।
इनके अतिरिक्त देश में अनेक उत्पादों के संबंध में विहित मानकों का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति भी लगातार बढ़ रही है। आईसक्रीम में क्रीम के स्थान पर ऐसी वानस्पतिक वसाओं, जिनका लोग सामान्य खाद्य में उपयोग करने में हिचकते हैं उनका प्रयोग कर उसे फ्रोजन डेजर्ट नामांकित कर देना या स्नान के साबुन में कुल वसा की मात्रा 75 प्रतिशत के स्थान पर 65 प्रतिशत रखने के लिए उसे सौंदर्य साबुन नामांकित कर देने जैसी विधि के प्रावधानों की धज्जियां उड़ाने वाले अनेक उदाहरण हैं। इसी प्रकार विगत डेढ़ दशक से देश में निरंतर मांग किये जाने पर भी जैव रूपांतरित अर्थात जेनेटिकली मोडिफाइड खाद्य युक्त आहारों के लेबल पर जी.एम. आहार अंकित करने संबंधी कानून का विधेयक लंबित है। जबकि यूरोप सहित कई देशों में कई जी.एम. आहार प्रतिबंधित है।
डिब्बा बंद पोषक आहारों में कुछ ही विदेशी कंपनियों के बढ़ते एकाधिकार को देखते हुए इन उद्योगों में होने वाले अधिग्रहणों आदि के विरूद्ध भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की निष्क्रियता भी चिंताजनक है। ऐसी एकाधिकारयुक्त कंपनियों द्वारा सीसा व मोनोसोडियम ग्लूटामेट जैसे हानिकारण पदार्थों से युक्त या यकृत, गुर्दा एवं मस्तिष्क आदि के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहे तैयार आहारों के भारी भरकम विज्ञापन से उपभोक्ताओं को जिस प्रकार भ्रमित किया जा रहा है, उन्हें व उनके विज्ञापनों में उनके मिथ्या गुणों का बखान करके समाज के साथ धोखाधड़ी कर रहे प्रसिद्ध सितारों पर भी रोक व उनके विरूद्ध कार्यवाही की पहल आवश्यक है।
जंक फूड कहे जाने वाले उच्च वसा, नमक व चीनी युक्त हानिकारक तैयार आहारों के दुष्प्रभावों पर हुए सभी शोध इनसे उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अवसाद, गुर्दे खराब होने आदि के जो दुष्प्रभाव बता रहे हैं, उन्हें देखते हुए जंक आहार के उत्पादन, बिक्री, लेबल पर चेतावनियों की अनिवार्यता, उन पर प्रभावी अंकुश और बच्चों की पहुंच से उन्हें दूर रखना आवश्यक है। इसके साथ ही ऐसे खाद्य आहारों के समय-बद्ध नमूने लेकर जहां उनके संबंध में कठोर मानकों के विधेयन और दंड के प्रावधान भी अनिवार्य हैं।
खाद्य पदार्थों की लेबलिंग की दृष्टि से रोगकारक ए-1 श्रेणी व रोगरहित रखने मंे सक्षम ए-2 श्रेणी के दूध पर भी क्रमशः ए-1 और ए-2 का भी अंकन होना चाहिए। वस्तुतः भारतीय नस्ल की सभी गाय का दूध रोगरहित रखने वाला ए-2 श्रेणी का ही होता है।
विविध अस्वास्थ्यकर आहारों के संबंध में आ रहे शोध परिणामों के आलोक में स्वदेशी जागरण मंच मांग करता है कि ‘सरकार ऐसे सभी तैयार आहारों के मानकों का ठीक से निर्धारण कर उनके उल्लंघन पर कठोर सजा के प्रावधान व लेबल पर वांछित चेतावनियांे के अंकन का प्रावधान करे। ऐसे हानिकारक आहारों के उत्पादन और विपणन में लिप्त सभी कंपनियों को दण्डित करे एवं उन्हें देश में कारोबार से पूरी तरह प्रतिबंधित करे। मंच देशवासियों को भी आगाह करता है कि वे ऐसी कंपनियों के सभी उत्पादों का बहिष्कार करते हुए ऐसे घातक आहारों के विरूद्ध संपूर्ण समाज को जागरूक करे।

Resolution - 2
पूंजी खाते पर रूपये की परिवर्तनीयता अवांछनीय

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर और भारत सरकार के वित्त राज्यमंत्री के इन बयानों, कि रूपये को जल्द पूंजी खाते पर परिवर्तनीय बनाना चाहिए, पर आपत्ति दर्ज करते हुए स्वदेशी जागरण मंच की राष्ट्रीय परिषद सरकार को आगाह करती है कि रूपये को पूंजी खाते पर परिवर्तनीय बनाने की गलती न करे।
गौरतलब है कि रूपये को पूंजी खाते पर परिवर्तनीय बनाने के प्रयास विभिन्न सरकरों द्वारा समय-समय पर किए जाते रहे हैं। भूमंडलीकरण समर्थकों द्वारा पूंजी खाते पर रूपये को परिवर्तनीय बनाना भूमंडलीकरण की अंतिम कड़ी के रूप में देखा जाता है। पूंजी खाते को परिवर्तनीय बनाने के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि लोग विश्व भर में पूंजीगत परिसंपत्तियां खरीदकर अपना लाभ अधिकतम कर सकते हैं और साथ ही साथ सस्ती दर पर ऋण भी लिए जा सकते हैं। इस संबंध में पहला बड़ा प्रयास सन् 1996-97 में किया गया। उस समय की सरकार रूपये को तुरंत परिवर्तनीय बनाने की ओर अग्रसर हो रही थी। ऐसे में स्वदेशी जागरण मंच ने सरकार के प्रयास को पुरजोर विरोध किया था। सरकार ने अपनी जिद्द में रूपये के पूंजी खाते पर परिवर्तनीय करते हुए रोड मैप तैयार करने के लिए तारापोर कमेटी का गठन किया था। उस समय दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भीषण आर्थिक संकट के चलते सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।
तारापोर कमिटी ने 1997 में दक्षिण पूर्व एशियाई संकट से सबक लेते हुए सिफारिश की कि रूपये को पूंजी खाते पर परिवर्तनीय बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कई शर्तों का अनुपालन करना जरूरी होगा-
1. 1999-2000 तक राजकोषीय घाटे को 3.5 प्रतिशत तक लाया जाए।
2. 1997-2000 के बीच मुद्रास्फीति की दर को तीन से पांच प्रतिशत तक लाया जाए।
3. बैंकों के एनपीए को उस समय के 13.7 प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत तक लाया जाए।
4. विदेशी आर्थिक नीतियांे को इस प्रकार बनाया जाए कि चालू प्राप्तियां बढ़े और इससे ऋण परिशोधन का अनुपात घटाकर 25 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक किया जाए।
गौरतलब है कि रूपये के परिवर्तनीयता के लिए जरूरी शर्तों को आज तक पूरा नहीं किया जा सका।
स्वदेशी जागरण मंच का यह सुविचारित मत है कि रूपये की पूंजी खाते पर परिवर्तनीयता देश की बचत को विदेशों में भेजने का काम कर सकती है, जो भारत जैसे देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकता है। यहीं नहीं इस कारण से रूपये के मूल्य में उथल-पुथल को बढ़ावा मिल सकता है। संरचनात्मक सुधारों के मद्देनजर देश में नियमन और नियंत्रण की आवश्यकता है। ऐसे में रूपये की परिवर्तनीयता को अनुमति देना खतरनाक हो सकता है।

Do not make Rupee Convertible on Capital Account

Taking objection to the recent statements of the Governor of Reserve Bank of India and the Minister of State for Finance, Government of India, that rupee should be made convertible on Capital Account, the National Council of the Swadeshi Jagran Manch cautions the Government not to make this mistake.

Various Governments from time to time attempted the Capital Account Convertibility of the Rupee. Globalization apologists look upon this as a final step towards integrating domestic economy with the world.

Those favoring convertibility of rupee on capital account argue that domestic investors can maximize their profits by purchasing Capital Assets abroad. They also argue that this would help raising loans from abroad at lower rates of interest.

First major attempt in this direction was made by Government of India in the year 1996-97. Swadeshi Jagran Manch strongly opposed the move of the then Government. However, taking an adamant stand, the Government constituted a committee, known as Tarapore Committee, to prepare a road-map for making rupee fully convertible on Capital Account. Thanks to the South East Asian financial crisis, the Government had to take its hands off from this move.

Tarapore Committee recommended that in order to move into this direction, following conditions need to be satisfied among others:
a. Fiscal Deficit to be brought down to 3.5 percent by 1999-2000.
b. Rate of inflation to be brought down to 3 to 5 percent
c. Non Performing Assets (NPAs) of the banks be brought down from 13.7% then to 5%
d. External sector policies designed to increase Current Receipts to GDP Ratio and bring down debt service ratio from 25% to 20%

India is yet to achieve the targets as set forth by Tarapore Committee for initiating the Capital Account Convertibility and any attempt to do it now will be in violation of the Report.

Swadeshi Jagran Manch firmly believes that a free Capital Account will lead to export of domestic saving, which for a capital-scare country like India, can seriously affect the economy adversely. Full Capital Account Convertibility will not suit an economy like India, which is undergoing the process of structural reforms which needs controls and regulations for the time being.




Wednesday, June 3, 2015

Dr MG Bokare

Remembering Dr.Bokare by his associates

Last week I was in Nagpur to sit in a get-together of close associates of Dr. MG Bokare, the author of epoch-making book Hindu Economics and also the first All India Convenor of Swadeshi Jagaran Manch. They were sharing their rare insights about their association with that giant economist, grass-root activists of agrarian issues, and red-changed-saffron mass leader, all summed up in one – Dr.MG Bokare. I found that though there were so many books and research papers written by Bokare, but there was whole-sale shortage of material on Bokre’s life and activities from which a common activist can get inspiration. Hence this group meeting was organized with arduous efforts of Dr. Yoganand Kale and Prof. Ajay Patki.

Philosopher Bokare: First to divulge his mind was Prof. N B Vaidya and accepted that he adored him like his spiritual Guru. Dr Vaiya, an octogenarian, discussed his journey from Gandhism to leftism, and ultimately to Swadeshi. According to him Bokre had an unusual knack of going to the roots of a problem and he used to present a clear picture of the issue under discussion without any bias. Though he wrote extensively about the inadequacies and contradictions in the ideology of Marx, but not the integrity of Marx and admired his profound knowledge, tenacity of purpose and hard systematic pursuit of knowledge. He added that he had a profound knowledge of Hindu religious scriptures also and ancient thinkers like Shukracharya and Chanakya were extensively quoted in his writings. Even in his busy days of holding the post of Vice Chancellor of Nagpur University he was busy reading and writing. Moreover few people know that besides Hindu Economics, Prof. Bokre had written Islamic Economics also when he noted injunction against usury in Islam and Christianity.

Guide Bokare: Retd. Principal Ajay Shrivastava, in brief, was stating his role as a guide and leader of masses. Starting from organizing Nagpur University Teachers’ Association (NUTA) to organizing farmers of Vidarbha and particularly establishing Cotton Growers’ Association, he was always busy in practical problems of the masses. He was particularly instrumental in initiating Monopoly Cotton Procurement Scheme of State Government. He pushed forward the movement of making available to the people the cost audit reports of industries despite strong opposition from traders and mill owners. Perhaps we know the Dr. Bokare was twice jailed for leading farmers’ agitations. It is difficult to match these two qualities of erudition and agitation in one man. But Principal Panda had strong belief that had Dr. Bokare living at this time this vicious circle of farmers’ suicides in Vidarbha would never had happened, and this he repeated many times in his exposition.

Friend Bokare: Third quality of Dr. Bokare that he was a friend of all those in need. Prof. Narender Laghve, who is living a retired but untired life, has several stories of emotional and friendly aspect of Dr. Bokare. “Can you imagine”, he was putting a question to me, “that a professor of his stature can go to slums to knock at dilapidated doors of a jhuggi to inform him for an interview of lecturer post, and this happened with me also!” He used to help the poor but intelligent students to any extent, even distributing everything in his pocket and then finding all of sudden that no money is left for retuning home by bus, and then borrowed it from others. The way he encouraged and developed young students was marvelous, he was explaining in emotional tone.

Father Bokare: Last person in this series was the younger son of Dr. Bokare himself that is Nitin Bokare, a leading and promising chartered accountant of Nagpur. His son had very few experiences to share and smilingly added that he was always busy reading, writing and talking with men of Shetkari organization. The only man in the family to whom he talked most, was his uncle Diwakar, but the talk was never about family affairs and always on economic and social issues exclusively, he added. We always held him in respectful awe and learned from his studious and sturdy life style and the whole family imbibed it. So there were good instances collected if a Bokare as a Guide, Friend, Philosopher and also a few instances about a Father.
All the time with me there was two persons Dr। Kale and Ajay Pataki. All these personalities affirmed that Dr. Kale knows better than us that great man as he was closely associated with his, pen and penchant and personality. All the time Dr.Kale remained silent on the topic and promised to write an article on this topic and Ajay Patki ji will look into the task of getting all these experiences jotted down in the form of a book. Let us wait for that inspiring book on Dr. Bokare.
(जानकारी के लिए बताना जरूरी है की यह पुस्तक छप चुकी है, और स्वदेशी जागरण मंच की साईट पर उपलब्ध है.)


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IMPORTANT TOPICS OF SJM ( modified on 21-6-15)

1.Issues list SJM

There are three types of subjects on which we work

1. INDIAN ECONOMIC ORDER OF PAST = 7 topics
 2. Current topics ( 7 issues) 
 3. Issues concerning working of SJM (5 topics), PERMANENT TOPIC OR PROBLEMS, (4), DAYS TO BE CELEBRATED (7) 
5. LOCAL PROBLEMS-
 (6). TOTAL= 36.
let us count the permanent issues. 1. Indian economic model of past. Wherein we take the topics of Ramrajya, shukracharya, kautilya's Arthshastra etc. As wells we can take the economic development in various fields prior to the advent of English company. Sh Ojha ji takes this topic very well in his speeches and I have got a copy of the speech with me. Moreover I have notes prepared from Sh Soni' book and perhaps delivered the lecture on this I n o ur OTCs. I have got new data from the book of Subhash wherein he asks was India a poor country or not and the example of FM,PM speeches in foreign countries. So it should be prepared well. हमारा गौरवशाली अतीत, our GLORIOUS PAST.

2. Hind Swaraj and Ganthian economic philosophy. I have read this book well and delivered lectures on this topic at various levels, and attended the seminar in TN. I delivered a lecture on this topic in the presence of Sh Datta ji in Jalandhar as well.Think every year on 2nd oct this issue should betaken. I should collect all the material in  one place.
six attributes of Indian model: 1. Decentralised, 2. Village oriented, 3. poor-centric, Antyodayi, 4. Nature oriented or Eco-friendly 5. Employment generating ROJGAARONMUKHI, 6. Dharam-adharit or based on spiritual orientation.
3. We can also take the topic Economic p philosophy of Swami Vivekanand in this 150th Birth centenary
4. EKATAM MANAVAD OR INTEGRAL HUMANISM
5. THIRD WAY as propounded by Sh. DP Tengadi ji

6 . OTHER ECONOMIC THINKERS like Dharampal, Dadabhai Noaroji, Rammanohar Lohia, Ch. charan Singh and Ambedkar or some time called the TRIO - GANDHI ,LOHIA ,deendayal. economic thoughts of Swami Vivekanand.
7. Positive aspect of India like Natural Resources, Family system, Big internal Market, Natural entrepreneurship, English knowing big class,and heritage, Youth Power growing, or demographic dividend, Brain Gain in IT, Democracy and goodwill amongst other countries due to our role in their independence movements,as are written in our book

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SJM RELATED TOPICS:

1. General globalisation concept and history of Globalisation
2. Evolutionary Process of SJM. I have prepared short note on this topic.
3. Other successful experiments of concept of Swadeshi iin India and abroad. Not yet prepared.
4. Organisational structure of SJM, and and seven points. ( prepared form)
5. 20 years of globalisation (two typed forms of Sh. Ashwani ji and Bhagwati ji.


CURRENT TOPICS:
1. WATER PRIVATISATION the topic I have prepared is the water policy 2012. It was just introduced in the sangh baithak, but strangely enough it was not an easy job there. A resolution couldn't be passed on the issue and Bhagwati ji  introduced the topic amongst Parliamentarians ND AT TWO THREE places like Indor.

Though I have collected articles of Bhagwati and Two from The Hindu and one two from rediff. But quotations and the main 16 page draft should also be read along with it.
Importance of the subject is that it should be distributed on at least as much places as 250 where water pvt issue has been started. if we can think of a Yates on this count.

2. ENVIRONMENTAL ISSUE:
For the last three years I have been taking this issue in different OTCs, and this the issue sense taken at the birth anniversary program of DP Thengadi Memorial lecture in 2007. I prepared a wide note on this topic in the written and acceptable form also but more efforts are to be done on this topic.

3. THE RIVER ISSUE. We considered it a very important topic also and an all India seminar was done in Jamshedpur on this topic but I think no followup of this had been done.7.GANGA AND related issues


4. Agriculture in India and abroad, organic farming, BT issues, seed Bill, BRAI,

4. INDIAN COWS,

5. Land Acquisition Act,
6. FDI IN RETAIL AND OTHER FDIs


PERMANENT PROBLEMS:
1. Terrorism, fake currency
2. Chinese Threat,
3. poverty and inequality.,
4. Black money and Corruption,

LOCAL ISSUES!
1 Vedanta and POSCO, rengali right,
2. ski village,
3" Una SEZ
4. plachimada
5. Turmeric,
6.yamuna
7.

IMPORTANT DAYS TO BE CELEBRATED:

1. 5th June environment day, 28th august, of Rajasthan, chipko of uttrakhand. 
2. Thengadiji birth and death annuversay ( nov 10-1920 to October 14, 2004) as well as the birth of Dr Bokare
3. 25 sept to 2nd oct, swadeshi saptah.
4. 10 August videshi company Bharat chhodo, on the format of Anqgreji Bharat Chhodo
5. Babu genu Martyrdomday , 12 December
6.Bhopal tragedy day 3rd December
There is a full list of INTERENATIONAL DAYS ini the guise of which we can take the issues I.e.internationals family day, ozone gas day, seed day, and the like.World


Tuesday, June 2, 2015

IMPORTANCE OF SANSKRIT

Fs. Sanskrit importance
1. Congratulating the host and audience for this unique function - honouring a Sanskrit scholar on the occasion of a marriage ceremony. I respect Sh. Ramchandran ji for his novel thought process in every field of life. I have written his nickname Railway in may diary just for remembering. Not that he met me first time in a Railway train, or he has worked in Railway Department. He has a very, very high notions about railways, he equates Railways with Mahakal, working day and night, no rest on Sunday, not waiting for anybody, rich or poor and high and low. One day he exhorted me this idea about idea and whenever I visit s Railway station, all of sudden I a reminded of the greatness of railways and also Sh. ramchandran ji. so when I called me for this function, I could not just synchronised marriage of his daughter and honouring of a Sanskrit scholar, what is common between the two. But I was reminded of his railways and his superb thinking and believed whatever Ramchandrean ji is doing, there might be some logic behind it. And of course there is,
2. These days again Sanskrit has become a talking points, thanks to Smriti Irani and Dina Nath batra for making Sanskrit a third language in stead of German in the Kendriya Vidyalya of whole of India amidst all this hue and cry. Second thing of controversy is demand Declaring a Sanskrit scripture Shrimadbhagwatgeeta a national scripture. So Sanskrit is a talk of town, no talk of the country nowadays, rightly or wrongly.
3. Swadeshi word itself finds it's origin from Sanskrit, so both are interlinked. For Swadeshi going to indigenous roots is essential and it is Sanskrit that it exists in it's Textual form and contains all the indigenous knowledge.
4. On any hospital OPD is essential and similarly with these three words
Importance of Sanskrit Language may be explained. First O stands or Old - it's oldest language not only of India, or Asia but whole of the world. But in spite of being old,it is also still lively, not dead, as the case with several old languages of the world. P stands for Permeative, In all languages, whether of east west, north to south, are permeated with the Sanskrit heritage. ( it's is said that Tamil literature somewhat maintained a separate literary tradition but would like our scholar Sh. To talk on this point definitely. people differ about the percentage but everybody is of the view that more than 50 words of all the languages of the country are full of Sanskrit roots. It may be the case with other languages of the Asia as well as of the world.
DESIRED. The third word D stands for desired, it is still required and desired everywhere. It's not a dead language but it has qualities to revive several aspects of our national life. For understanding Ayurveda, for understanding Vedic arithmetics, for use in computers, for understanding economics of Chankya's arthshastra, it's then only setu, bridge over whole of India, linguistic differences and differences of sects, class and caste and more precisely the difference of south and north.
FOUR STORIES TO BE TOLD REGARDIMG THE IMPORTANCE OF SANSKRIT:
1. Agnee mile purohitam, His Masters Voice company, Thomas Alva Edison, Max Muller, Atharva Vedas, first hymn, Vedas richa, ( first time stored in metallic voice, controversy, as max muller died in 1900, but rerecording done in 1920..
B. Openhymer and Gita, c. Worldsworth ode to immortality, D. Organic khad.. SHIT,
5. History of Sanskrit in the recent past.
When English people came to india and noticed it's beauty they were simply charmed and bewildered. But later on when they made up their mind firmly to establish a long term colony in India they saw Sanskrit as their biggest enemy, and tried to thwart it by every means possible.

The `discovery of Sanskrit' by the West is usually associated with the
memorable utterance of Sir William Jones in his third annual address before the Asiatic Society, Calcutta, on February 2, 1786. He spoke so meticulously about Sanskrit that I am tempted to quote verbatim from his address only one sentence, though this one sentences comprises of not less than 125 words..
``The Sanskrit language, whatever be its antiquity is of a wonderful structure; more perfect than the Greek, more copious than the Latin
and more exquisitely refined than either; yet bearing to both of them a stronger affinity, both in the roots of verbs and in the forms of grammar
than could possibly have been produced by accident; so strong indeed that no philosopher could examine them all three without believing them to have sprung from some common source which, perhaps, no longer exists ; there is a similar reason, though not quite so forceful, for supposing that both the Gothic and the Celtic, though blended with a different idiom, have the same origin with the Sanskrit; and the Old Persian might be added to the same family.''

This statement of Sir William Jones is considered as the starting point of
comparative Linguistics of the Indo-European languages. He was not any ordinary man, He came to India as the Judge of the Supreme Court of India in 1783; he founded the Asiatic Society on February 2, 1782. He translated Kalidasa's Shakuntala into English in 1789 on reading which the great German poet philosopher Goethe went into raptures.
Sir William Jones also made a conjecture that Sandracottos of the ancient Greek writers was Chandragupta Maurya of the Puranas; this has been accepted by almost all scholars, and this has proved to be a pivotal one for ancient Indian history and chronology.

Second turn came with Lord Macaulay.
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With the entry of T. B. Macaulay, who was the 'Secretary to the Board of Control' and looking into the affairs of India, things changed very fast. Macaulay advocated that for taking complete control of the country teaching of Sanskrit has to be stopped and only English should be promoted.

He argued that support for the publication of books in Sanskrit (and Arabic) should be withdrawn, support for traditional education should be reduced to funding for (the Madrassa at Delhi) and the Hindu College at Benares, but students should no longer be paid to study at these establishments. The money released by these steps should instead go to fund education in Western subjects, with English as the language of instruction. One more quotation is essential to be quoted verbatim. He said,

...that we ought to employ them in teaching what is best worth knowing; that English is better worth knowing than Sanskrit or Arabic; that the natives are desirous to be taught English, and are not desirous to be taught Sanskrit or Arabic; that neither as the languages of law, nor as the languages of religion, have the Sanskrit and Arabic any peculiar claim to our engagement; that it is possible to make natives of this country thoroughly good English scholars, and that to this end our efforts ought to be directed.
This policy resulted in the Education Act of 1835. Thereafter, all Sanskrit schools and institutions lost to the British policies and bureaucracy and Sanskrit suffered irreparable damage.

Third turn came after it.
A battery of British scholars started learning Sanskrit and based on whatever they could learn of Sanskrit in a year or two, they started translating the ancient scriptures and documents in English. While in India they started a propaganda claiming that Sanskrit was a dying language; but ironically Sanskrit was being introduced in almost all universities in Europe. The tardy and incorrect translations based on desultory learning of the British scholars became an introduction of Hinduism and Sanskrit to the rest of the English-speaking world. Selected works with twisted translations which presented Hinduism and India in bad light were promoted with full vigour to highlight how bad the system of India was. The language of instruction of Sanskrit for higher education in India was changed to English and almost all top positions of Sanskrit professors were occupied by Europeans. The neo-scholars of English language of Indian origin, who could not be educated in Sanskrit, also started relying on the English translations by the European authors, which also got referred in all subsequent works. Unfortunately, if one picks up any Indian textbook on History, the same propaganda continues. Among the list of books referred to prepare any History textbooks; one can find that 80 per cent of them are by foreign authors and rest are using their work as leading references. Nearly 200 years of this kind of propaganda not only polluted our culture but also almost destroyed the learning of Sanskrit.

Professor Max Muller's ( some eminent Hindu saints used to call him Moksha Mulla मोक्षमूल Mokshamula) contribution to the popularization of Sanskrit has been the most important and also controversial in the nineteenth century. He made a critical edition of the entire Rigveda with Sayana’s Bhashya in about 25 years (1852-75). He also conceived a project of translating into English, with the collaboration
of many scholars, the 'Sacred Books of the East' . he was a German and not pro-Catholic. After the critical edition of the Rigveda and the series of then Sacred Books of the East of which 31 were devoted to the Indian texts alone, he retired in 1875 as Professor of Comparative Philosophy, for completing the preparation of the Sacred Books of the East. He died in 1900.

Max Muller did not visit India. He said he did not want to go to Benaras,
for he was sure to be disillusioned if he saw the city as it was then. ( perhaps Shri Modi has read about this and chosen Benaras for transformation. Vivekananda visited him in England. Max Muller appreciated the work done by Tilak. Tilak was released from prison because of the intervention of Max Muller who wrote a petition to Queen Victoria.
After independence.

Sanskrit Post-Independence

During the framing of India's Constitution, there were long debates on official language of the Country and the role of Sanskrit. The 'Constituent Assembly' and the sub-committee formed on 'Languages' highlighted the need to undo what the Britishers had done and emphasised on the need to make Hindi as the language of the State so that the common man can be empowered and made a part of the Government. Article 343 of the Constitution specifically provided that English as a State language would be phased out in 15 years period and Hindi would be the State language. Sanskrit was also considered to be made the official language, but it was felt that the country should wait for some more time before initiating such an effort. In the same spirit, Article 351 specifically mentioned that for enriching Hindi language, Sanskrit would be used. The Constitution of India directs under Article 351 that wherever necessary or desirable, for development of Hindi vocabulary, it shall be expanded primarily based on Sanskrit and secondarily on other languages.

The then political leadership was fully aware about the importance of Sanskrit and a handful of our leaders did highlight their concerns then and now. While underscoring the importance of Sanskrit, first Prime Minister of India, Pandit Jawahar Lal Nehru said;

If I was asked what is the greatest treasure which India possesses and what is her finest heritage, I would answer unhesitatingly - it is the Sanskrit language and literature, and all that it contains. This is a magnificent inheritance, and so long as this endures and influences the life of our people, so long the basic genius of India will continue.

However, the efforts and dreams of the Constitution framers could not be fully realised even after over 60 years of Independence. The resistance did not come from the people but from the English-speaking bureaucracy and the foreign-trained English speaking politicians of the country, who continued to look down upon Hindi and Sanskrit as lesser languages, and as the languages of uneducated people.

Present state of affairs

Various commissions and committees have highlighted the importance of Sanskrit and the need to restore it to its old glory. All our texts, documents and scriptures are in Sanskrit; losing the language would be losing our roots. Besides, Sanskrit is the most structured and scientific language spoken anywhere in the world. In its syntax, grammar and structure, no other language can match it. 'Sanskrit Commission' which was set up by the Government of India, in its 1957 report specifically pointed out that Sanskrit is one of the greatest languages of the world and it is the classical language par excellence not only of India but of a good part of Asia as well. The report states the Indian people look upon Sanskrit as the binding force for the different people of this great country and described this as the greatest discovery made by the Commission as it travelled from Kerala to Kashmir and from Kamarupa to Saurastra. The commission, while so travelling, found that though the people of this country differed in a number of ways, they all were proud to regard themselves as participants in common heritage and that heritage emphatically is the heritage of Sanskrit.

India's official education policy specifically mentions that facilities for the intensive study of Sanskrit has to be encouraged. Still, the apathy, neglect and propaganda against Sanskrit has been so much that the Supreme Court of India had to intervene in 1994 to declare that Sanskrit has to be a part of education. However, the various States of India are still disadvantaging, discouraging and discriminating education in Sanskrit at School, College and University level. Sanskrit learning has been stopped in many schools in want of teachers and funds. In Colleges and Universities, courses are being closed down and students are being discouraged; indirect discouragement and strategic discouragement is caused by limiting financial resources. Though Sanskrit is a subject for appearing in Civil Services, the State and Universities are providing no facilities to students for preparing for civil services in Sanskrit, whereas other subjects are being patronised.

As a result of this systematic propaganda against this great heritage, offensives of the British rulers, and poor support for Sanskrit post-independence, the language has now been reduced to a poor minority. According to the 2001 census of India, there remain only 14,135 speakers of Sanskrit in Hindustan. According to the Indian Census policy, if the total number of speakers of any language is reduced to less than 10,000, it wouldn't even be reported as a separate language.
If we want to preserve our heritage, the indifference towards Sanskrit has to stop. The importance of the study of Sanskrit goes far beyond the aesthetic
What should be done?
Sanskrit is the key to most of the branches of the
study of Indian civilization and the contribution of this civilization to
the development of human thought and culture are considerable. The study
of Indian classics is the foundation for the study of one of the major and
ancient civilizations of the world.
B. All be taught some initial sentences in Sanskrit, or the usual words of common use.
C. Government support be given to it in whatever form possible.
D. Remembering or memorising some shalokas of bhagwat Gita or some Sanskrit scriptures daily, good that Sangh prarthana is in sanskrit,all the cautions are in Sanskrit,
E. Promotion of spoken, simple Sanskrit as adopted by Sanskrit bharati. Revival, 2.9 million means 29 Lakh students participated in their courses or classes. Trying to remove five types of conflicts in india as well as the world. Class Caste, sect, linguistic, north vs south, and listening and speaking should precede reading and writing, Helping this organisation.

F. One activist Hemant Goswami from Chandigarh also filed a writ petition in Punjab and Haryana high court that Sanskrit be accorded the status of language Minority status, as it is accorded to some communities.
G. Last but not the least, the Sanskrit-German controversy had given rise to a new set of advocates who are software experts of computer science. Paninian or Classical Sanskrit (as contrasted with Vedic Sanskrit) is the most refined and precise human language ever invented. It has an astonishing property known as a "context-free grammar", and so many new experts claim, it is the only human language that has ever had this. Context-free means that the language is utterly unambiguous, and every sentence in it can be derived precisely from a set of rules. In Paninian Sanskrit, as embodied in the Ashtadhyayi, there are 3959 rules.
From several points of view, thus, Sanskrit is not only the one candidate that deserves to be the national language - much as Israelis resurrected the once-moribund Hebrew - but it is by many measures the most perfect language ever invented: truly samskrt or civilized. There should be no reason to fuss even if it is imposed; much less when it is merely being put back into the syllabus where it used

DATA TO REMEMBER LIST 1(34)

1DATA TO REMEMBER.

1.suggested data. 1. Data to be remembered one...Environment, Poems jangal ka dastoor, 2. How many birds declined in last decades. 3. What says UNO 4. Vultures 5. Rivers and JK and UTTRAKHAND.
2. What is the data regarding women living alone in the world? Regarding divorce cases in the world, regarding mom less or dad less children, etc.
3. Regarding philanthropy of ban KI moon data, vis-a-vis consumerism data,
4. Regarding the data of multinational loot, inequality, etc. These too are provided bY BAN KI MOON

5. Regarding small scale industries etc.
6.

These numbers have not gone unquestioned. The work
List.
1. rupees vs. Dollar, inflation also imported.
1917-13, 1947-3.50, 1991-18 ,now62 so barrel 85 £ at 1947 295 now 5270.
2. Our share in the world GDP
1000-34, 1000-1500 32, 1700-24 , 1947 3.8, 1991-3.2, now 2.5, population 16.5 but (ppp basis 5)
3. Manufacturing growth rate. 1950s 5.9, 1991, 4.5,12-13 1.9, 13-14 negative
4. Environent companies.. Colorado , Richard heed, Algore ipcc, 1750-2013 (8) -90.63%, 1450 gigatonnes/ half25 yrs.
5. Unequally upper and lower,
6. Unique model.
7.economy and coal policy

8.
9. Value of human body
10. Govt. Honest coal policy
11education value.
12.
13.. Railways,
14. fdi,
15. Soft drinks,
16. Manjul Bhardwaj
17. WTO SUBSIDIES
19. excellence in technology
20common species bloch
Padua Aran, ham kab jagenge
23. America
24. PHARMA patents
25. Insurance
26. 26. Example of telecom industry. How we lagged behind, motorola, 1st gen technology
27. Disappointing story of electronics..36k and above subcritical plants to china
28. Multiplier effect,
29. Lessons frombrefregerator. Whirlpool, kelvinstor
30. Story of tata soap socialism
31. Cement industry
32. Ice creams
33. Oh, even our bread and butter in their hands: उदाहरण के लिए बाजार में नेचर फ्रेश नाम का आटा कारगिल अमेरिकन प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी है उसका 136 अरब डॉलर का साल का कारोबार है, भारत में 4 अरब डालर (रुपये 24,000 करोड़ रुपये) का कारोबार है।
34.
1. Rupee vs. Dollar..our inflation is also imported...​विगत 23 वर्षों से इसके परिणाम स्वरूप हमारी मुद्रा की कीमत जो 1991 में 18 रुपये प्रति डालर थी, वह गिर कर 62 रुपये प्रति डालर हो गयी। इस प्रकार आज अमेरिका की मुद्रा ‘डालर’ की कीमत हमारी मुद्रा ‘रूपये’ की तुलना में 62 गुनी है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि 1917 में पहला भारतीय रूपये का जो नोट छपा था उस समय 13 डाॅलर के बराबर एक भारतीय रुपया था और 1947 में जब हम स्वाधीन हुए, उस समय भी साढ़े तीन रुपये बराबर एक डाॅलर था, वहीं मनमोहन सिंह जी ने जब आर्थिक सुधार लागू किये तब 18 रुपये बराबर एक डाॅलर था और आज 62 रुपये बराबर एक डाॅलर है। क्रूड पैट्रोलियम का एक बैरल जो 85 डाॅलर प्रति बैरल है। यदि आज आजादी के समय की एक्सचेंज रेट होती तो आज एक बैरल के हमें मात्र 295 रूपये देने पड़ते, जिसके आज हमें 5270 रुपये देने पड़ रहे हैं। देश की सारी महँगाई जो है एक तरह से आज आयातित है, और हम अपने रुपये का जो अवमूल्यन करते रहे हैं उससे महँगाई बढ़ती रही है। two three other examples to be given.

1917-13, 1947-3.50, 1991-18 ,now62 so barrel 85 £ at 1947 295 now 5270.
2. Our share in the world GDP and present status: एंगस मेडिसन एक ब्रिटिश इकोनाॅमिक हिस्टोरियन हुये हंै, उनकी पिछले साल मृत्यु हो गई, उनको ओ.ई.सी.डी. देशों के समूह जिसमें सारे औद्योगिक देश आते है, अर्थात अमेरिका, यूरोप जापान कोरिया आदि देशों के इस संगठन ‘आर्गेनाइजेशन फार इकोनाॅमिक कोआॅपरेशन एण्ड डेवलपमेंट कंट्रीज’ ने कहा कि वे दुनिया का 2000 साल का आर्थिक इतिहास लिखंे। इस पर उन्होंने वल्र्ड इकोनाॅमिक हिस्ट्री: ए मैलेनियम पर्सपेक्टिव लिखा और वह जो मैलेनियम पर्सपेक्टिव उन्होंने लिखा उसमें उन्होंने कहा कि सन् शून्य ए.डी. से लेकर 1700 एडी तक अर्थात ईसा के जन्म से सन् 1700 ईस्वी तक भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। उनके अनुसार इस्वी सन् एक से 1000 ईस्वी तक भारत का दुनिया के जी.डी.पी. में 34 प्रतिशत हिस्सा या कन्ट्रीब्यूशन था। अमेरिका, यूरोप चीन सब पीछे थे। 1000 ईस्वी से 1500 ईस्वी के बीच विश्व के कुल उत्पादन में भारत का अंश 32 प्रतिशत था 1700 एडी में भी यह 24 प्रतिशत था। आज यदि हम देखें तो जब हम स्वाधीन हुए उस समय हमारा एक्सचेंज रेट के आधार पर विश्व के नामिनल जी.डी.पी. में योगदान 3.8 प्रतिशत था। मनमोहन सिंह जी ने जब आर्थिक सुधार लागू किये उस समय 3.2 प्रतिशत था और आज वो मात्र 2.5 प्रतिशत है। वल्र्ड जी.डी.पी. में हमारा अंश क्रय क्षमता साम्य (Purchasing power Parity) के आधार पर चाले 5 प्रतिशत अंष है, पर वह एक अलग अवधारणा है। ये केवल एक व्यक्ति ने कह दिया ऐसा नहीं. औरो ने भी लगभग ऐसा ही कहा है. पॉल बैरोच ने भी गीत की समीक्षा करते हुए कुच्छ ऐसा ही कहा.उन्दोने 1700-1980 तक की समीक्षा की. पाया ki 1700-1800 ईसवी तकभारत का हिस्सा 24.5% यानी पुअर दुनिया का एक चौथाई भारत का. और इस बीच पूरे यूरोप जिनके साम्राज्य में सूरज नहीं छिपता था उसका हिस्सा सिर्फ 23.2% था.
दीपक नय्यर ने भी काफी शोध किया और बताया की हज़ार साल पहले एशिया अफ्रीका एंड लैटिन अमेरिका की आबादी और इनकम 80% थी, और भारत और चीन दुनिया की आबादी और इनकम दोनों हिसाब से 50% से जिहड़ा थे. आगे 500 सालों तक और इंडस्ट्रियल क्रांति के पहले फेज तक, और 1820 तक घी भारत और चीन का हिस्सा 50% तक रहा.
बस सिर्फ 130 साल यानी 1820-1950 तक औद्योगिक उत्पादन दो तिहाई 65% से घाट कर 10% आ गया. प्रति व्यक्ति आय भी 1820 में जो यूरोप से आधी थी वो मात्र 10% रह गयी. इस लिए सिर्फ 2000 साल के लिखित ईसाई कालगणना मैं सिर्फ 200 वर्ष मैं से भी सिर्फ एक चौथाई समय मैं ही भारत का स्तर नीचे आया वर्ना 75 पर सेण्ट टाइम हम यूरोप अमेरिका से ऊपर ही रहे, काफी उप्पर ही रहे, ये असली हिन्दू ग्रोथ रेट था.
Is liye sirf 2000 saal ke likhit isaayi kalganana mien sirf 200 varsh Maine ki ek chouthayi same mien hi Bharat ka str nee he aaya varna 75 per cent time ham Europe America se upar hee rahe, kaafi uppar hee rahe, ye asli Hindu growth rate tha.

In a long-term historical perspective, what we now call the developing world—Asia, Africa, Latin America—but essentially Asia, had an overwhelming significance in world economy. A thousand years ago it accounted for 80% of the world income and world population, of which China and India alone accounted for 50% of the world population. And the situation was about the same even 500 years later, in 1500. The beginnings of change, from 1500s to 1800s, had to do with the first phase of colonialism, the discovery of the new worlds, and then there was the industrial revolution. But even in 1820, less than 200 years ago, India and China still accounted for 50% of the world population and world income. But the period from 1820-1950, a short span of 130 years, saw a transformation in the world economy, as there was what is now described as the great divergence. Per capita income in Asia was half that in Europe in 1820, and was one-tenth of that in Europe in 1950. In industrial production, the share of what we now know as the developing world collapsed from about two-thirds to less than 10%.
The reason of my inquiry is how much has the world changed since 1950.
SG.

But this colonial theory was proved fake in 1983 -- exactly five years after Rajkrishna trashed Hinduism for India’s low growth. In that year Paul Bairoch, a Belgian economist, came out with his study of the world economy and his findings astounded the West. He said that in 1750 India’s share of world GDP was 24.5 per cent, China’s 33 per cent, but the combined share of Britain and the US was - believe it - just two per cent. Yes only two per cent!

India’s share, Bairoch found, fell to 20 per cent in 1800; to 18 per cent in 1830; and finally crashed to 1.7 per cent in 1900, while China’s crashed to 6.2 per cent from 33 per cent. In these 150 years, the combined share of Britain and the US rose to from 2 per cent to over 41 per cent. Bairoch shook the West by saying that in middle 19th century, the West had a lower standard of living than Asians - read Indians and Chinese. The Organisation for Economic Cooperation and Development [OECD], network of rich nations, forthwith constituted a Development Institute Studies under Angus Maddisson, a great economic historian, to conduct a comprehensive research into economic history - the implied agenda was to prove Bairoch wrong.

Angus Maddisson postulated, ‘if Bairoch is right, then much more of the backwardness of the third world presumably has to be explained by colonial exploitation’ and ‘much less of Europe’s advantage can be due to scientific precocity, centuries of slow accumulation, and organisational and financial superiority’. After two decades of hard work, Maddision published his studies titled ‘World Economic History - A Millennial Perspective in 2001’.

His study confirmed Bairoch’s study of 150 years and more, as Maddisson studied the entire 2000 years economic history. Maddisson showed that India was the leading economic power of the world from the 1st year of the first millennium till 1700 - with 32 per cent share of world’s GDP in the first 1000 years and 28 per cent to 24 per cent in the second millennium till 1700.

China was second to India except in 1600 when China temporarily overtook India. India again overtook China in 1700. The global economic play was in the hands of India and China till 1830. And two nations disqualified for development by Weber for following Hindu and Buddhist religions. Maddison confirmed, actually confessed, that [Hindu] India fell only due to colonial exploitation. Now the Maddisson study, endorsed by OECD, is the most authentic economic history of the world. What does it prove? The Hindu rate of growth had kept India going as the most powerful economy of the world for 1850 years out of 2000 years. That is why William Dalrymple described the rise of India ‘as the empire striking back’ -- meaning that India’s rise was not rags to riches story.

The Bairoch-Maddisson studies have sealed the discourse decades back. Their studies have also been corroborated by other studies and records. Some of them are: studies into the Mayuran export-led economic Model Hindu India [American Journal of Economics and Sociology April 1993]; study into consumption during Akbar’s regime as being higher than in Europe by Centre for West Asia Studies Jamia Milia Islamia University; the Economic History of Greco-Roman World which described how two thousand years ago India was bankrupting Roman Egypt of its gold reserves by its export surplus; the history of Indian merchant navy which had a fleet strength of 40,000 ships in Akbar’s time and as many as 34,000 ships before the British arrived and the Bank of International Settlements [BIS] Annual report of 1934-35 which said that between 1493 and 1930 India absorbed 14 per cent of world gold production - which meant that it earned that much export surplus for five centuries continuously.
Western scholars didn't know till Paul Bairoch told them in 1983 that India & China had better std of living in 16-17 centuries than West.
7:52 PM - 1 Dec 2014
Western scholars didn't know till Paul Bairoch told them in 1983 that India & China had better std of living in 16-17 centuries than West.
7:52 PM - 1 Dec 2014

. उसे यहाँ छोड़ दीजिये, जो वल्र्ड का नामिनल जी.डी.पी है उसमें हमारी एक्सचेंज रेट के आधार पर यह हमारी स्थिति है। हम दुनिया की 16.5 प्रतिशत जनसंख्या है लेकिन विश्व के जी.डी.पी. में हमारा कुल योगदान 2.5 प्रतिशत है .

1000-34, 1000-1500 32, 1700-24 , 1947 3.8, 1991-3.2, now 2.5, population 16.5 but (ppp basis 5.

3. Examples of previous glory in science and technology and our downward trend in Manufacturing sector...1. हमारे पूर्व इतिहास पर और भी दृष्टि डाले तो अभी तमिलनाडु में कोडुमनाल नाम के स्थान पर एक उत्खनन हुआ है। पिछले 20-22 वर्षों में वहा पर एक पुरानी औद्योगिक नगरी निकली है। वहाँ पर विट्रीफाइड क्रुसीबल्स....उस औद्योगिक नगरी में स्टील बनाने के कारखाने भी निकले हैं, वस्त्र बनाने के कारखाने भी निकले है, वहाँ पुरातात्विक उत्खनन में रत्नों के संवर्धन के भी उद्यम निकले हैं और भी निकले हैं। यूरोप में पहली बार विट्रीफिकेशन का अभी विकास हुआ है। लेकिन, हमारे यहाँ वो तेइस सौ साल पुराने विट्रीफाइड क्रुसिबल्स निकले हैं अर्थात् हम उस समय विट्रीफिकेशन करते थे। वहाँ पर इजिप्ट के सिक्के भी निकले हैं तो रोम व थाईलैण्ड के भी सिक्के निकले हैं। अर्थात् तब हम अपने औद्योगिक उत्पाद विश्व भर में निर्यात करते थे। इसलिये वल्र्ड जी.डी.पी. में हमारा पिछले साल अर्थात् 2013-14 में हमारी मेन्यूफेक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ रेट (वार्षिक वृद्धि दर) ऋणात्मक अर्थात् नेगेटिव हो गई थी, ऐसा पहली बार हुआ आजादी के बाद 1950 के दशक में भी हमारी मैन्यूफेक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ रेट 5.9 प्रतिशत थी साठ के दशक में दो युद्ध होने के बाद भी हमारी मैन्यूफेक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ रेट 5.6 प्रतिशत थी और 1990-91 में जिस समय हमें बैंक आॅफ इंग्लैण्ड के पास सोना गिरवी रखना पड़ा था। उस समय भी हमारे मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि दर (ग्रोथ रेट) 4.5 प्रतिशत थी। हमारे आजादी के बाद के इतिहास मंे यह 4.5 प्रतिशत से नीचे कभी नहीं गई। लेकिन, 2012-13 हमारी उत्पादक उद्योगों की यह उत्पादन वृद्धि दर गिरकर 1.91 प्रतिशत और 2013-14 में ऋणात्मक या नेगेटिव हो गई। आज देश के पास सर्वाधिक युवा शक्ति हैं, और जो मेन्यूफेक्चरिंग सेक्टर है. देश में उत्पादक उद्योगों के हृास के कारण ही आज हम देखे तो देश के विदेश व्यापार में 150 अरब डाॅलर का घाटा है। आज हम सब प्रकार के उच्च प्रौद्योगिकी आधारित उत्पादों के मामले में आयातों पर निर्भर हो गये हैं.

Manufacturing rate. 1950s 5.9, 1991, 4.5,12-13 1.9, 13-14 negative

4. ENVIRONMENT/MNCs
पूरी दुनियां का जितना भी मनुष्य निर्मित प्रदूषण जो भय, भयानकता और भूकम्प तक का कारण जाना जाता है
1. वो मात्र दुनिया की 90 कंपनियो जिनके हेडकुआर्टर्स 43 देशों में फैले है, द्वारा 63% तक फेलाया जाता है। ये आंकड़ा हमने नहीं 8 साल के कठिन परिश्रम से कोलोराडो के अन्वेषक रिचर्ड हीड ने 2013 में एकत्र किया और IPCC के एलगोरे ने मान्यता दी।
2. दूसरी बात जो इसके साथ जोड़ी की बेशक आंकड़ा 1751 से 2013 तक का है परंतु कुल प्रदूषण यानि1450 गीगा टन का आधा तो केवल गत 25 वर्ष में ही इकठ्ठा हुआ है।
3. तीसरी बात बताई कि 7 को छोड़ शेष सभी 90 में से 83 तो एनर्जी सेक्टर यानि तेल गैस व कोयले की कंपनियां है और 7 सीमेंट की।
4. Chouthi और भी मजेदार बात बताई कि इन में से मुख्य कंपनियां जोकि अमरीका यूरोप और चीन आदि में केंद्रित है, वो ही दुनियां में चलने वाले प्रदूषण विरोधी आंदोलनों को फण्ड मुहैय्या कराती है! इस लिये इन आंदोलनों ने ही कई जंगलो को कटवाया है, कटवाने वालों को बचाया है और ईमानदार आंदोलन के नाते स्वदेशी जागरण मंच को हमेशा याद किया जायेगा - इस रास्ते पे जब कोई साया न पायेगा, ये आखिरी दरख्त बहुत याद आएगा!,
ham bade nahin hae, par phir bhee sabse bade hae,
jahan sab gir pade hae ham vahan khade hae.
Fs.90 companies caused 2/3 rd of world carbon emission.or of man-made global warming emissions

Chevron, Exxon and BP among companies most responsible for climate change and some goverment ownedncompanies. since dawn of industrial age, 1750
link- http://www.theguardian.com/environment/2013/nov/20/90-companies-man-made-global-warming-emissions-climate-change?CMP=twt_gu

1750-2013 (8) -90.63%, 1450 gigatonnes/ half25 yrs

5. Unequally,दुनिया के ऊपर के 5वां हिस्सा जो अमीरों का है वो दुनियां का कुल 86% गुड्स एंड सर्विसेज निगलता है और नीचे का 5 % मात्र 1.3% । क्या विश्वास नहीं हो रहा तो बतादे ये आंकड़े UNO के सेक्रेटरी जेनेरल कोफ़ी अन्नान के दिए हुए है। Aadmi tune hee, inke pas 1.3 aur moto ke pas 86%,
1. अब थोडा और विस्तार से बता दे कि ये ऊपर के 5% पूरी दुनिया की खपत का 45 %मीट व मछली, 58% ऊर्जा का भक्षण करते है और 74% टेलीफोन लाइन, 84% कागज़ 87 % वाहन भी इसी के कब्जे में है।
2. अगर ये आंकड़े डरावने नहीं तो आगे बतादे कि दुनियां के सबसे बड़े तीन मात्र तीन अमीरो की परिसम्पतिया दुनिया के 48 गरीब देशों से ज्यादा है। तीसरा आंकड़ा और भी ज्यादा खतरनाक।
3. दुनिया के 225 सर्वाधिक अमीर व्यक्तियों जिनमे 60 केवल अमरीका के है उनके पास 1 ट्रिलियन डॉलर की सम्पति है जोकि दुनियां के 47 देशो नहीं कुल 47% नीचे की आबादी की वार्षिक आमदनी से ज्यादा है।
अदम गोंडवी की जुबानी
वो जिसके हाथ में छाले है पेरो में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आयी है।
इधर इक दिन की आमदनी का औसत चवन्नी है
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमायी है।
रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रखके ये कीमत चुकाई है।

6. We use to say that every country requires a unique model keeping in mind it's unique requirements. Guru has also outlined the same.
Paradigm shift

There is an unseen paradigm shift in this Budget. For the first time, an Indian government’s budget seems to focus on national effort as the core impetus for national development.
1. This is not surprising as the Cabinet resolution on NITI Aayog directs the national policymaking body “most importantly” to “adhere to the tenet that while incorporating positive influences from the world, no single model can be transplanted from outside into the Indian scenario. We need to find our own strategy for growth.”
2. Almost a decade back, Finance Ministers and Central Bank Governors of the G20 nations had declared that “there is no uniform development approach that fits all countries” and “each country should choose the development approaches and policies that suit its specific characteristics.”
3. Three years later, the World Bank conceded “we have learned the hard way that there is no one model that fits all.”
Yet, for a decade more, India followed the economic model of the West till the NITI Aayog decided to correct the course. The game-changing elements in this Budget are in line with NITI Aayog’s philosophy.

7. sme sector informal sector

The first expression of the India-centric approach is the innovative agenda to ‘fund the unfunded’ 58 million 5 crore and 80 Laius) micro and small businesses in the non-formal sector. This sector, according to the Credit Suisse Asia Pacific/India Equity Research report of July 2013, is unique to India. While in other countries the informal sector is largely illegal, in India, the report says, it is non-formal because government policies have not reached it.
2. These 58 million non-formal micro businesses generate millions of rural and semi-urban entrepreneurs and provide 128 million 12 crore 80 Laius, I.e. That almost 2:5 persons employed by one entrepreneur on average) jobs.
3. Two-thirds of these units are operated by Scheduled Castes, Scheduled Tribes and Other Backward Classes.
4. Yet, this Kamadhenu of job creation gets only 4 per cent of its credit needs from banks. The sector now borrows at usurious rates of interest of 120 per cent and beyond.
5.,While it is denied funds, the formal sector — which garnered some Rs.54 lakh crore since 1991 by way of foreign and domestic capital and loans — has added just a couple of million jobs in two decades.
6, All governments since liberalisation had expected these millions of units to die of euthanasia ( mercy killing) in market economics. But they have posted the fastest growth among all segments of the Indian economy. But economic policymaking in India continued to ignore them. 7. Mr. Modi is the first political leader to see the potential of this sector to drive up jobs. He also realised that the modern banking system is unsuited to fund this sector. In the last budget, the Modi government had announced a committee to structure a new financial architecture for this sector. The Reserve Bank of India reportedly opposed any new architecture. But this Budget has gone ahead and announced a new financial architecture, the Micro Units Development Refinance Agency (MUDRA), for the non-formal sector with a corpus of Rs.20,000 crore and budgetary support of Rs.3,000 crore for credit guarantee. MUDRA will come into existence by a separate law. This will fund the millions of entrepreneurs by an innovative financial architecture that will integrate the existing private financiers of small businesses as last-mile lenders. It is a completely indigenous, India-centric and innovative solution for the most job-intensive, yet totally credit-starved, segment of an economy unique to India.
8.
9. Value of human body..dr. pratap Reddi of Appolo in his article on government health policy quotes Dr.Herald J.Morovtz of Yale university that if an artificial human body is to be produced it will cost 6000 lakh crore of dollars, which is 77 times more than the total GDP of the whole of the world. Other examples, kidney transplant, A eye. Etc.

10. How honest govt can save crores. Coal auction.
CAG Said it govt. Lost 1.86 lakh crores now govt has earned 1.76 lakh crores due to auction of 30 coal blocks and earned 1.76 lakh crores.
SC blocked 214 coal blocks. E auction.

11. Education worth. One data is from Australia how much govt. Lost due to attacks on india students. Second is from a research paper prepared by Tata institute of social sciences that our iiteans never produced any Nobel laureates.

12. Economic interesting data

1. How much has he sensex spurt in the last six months and how it has effectefd Modi?
A. 35 per cent, modi is not happy as it may be hot money t ojust
Romote certain shares of the companies. Now 11 % down.

2. How much GDP comimg from urban and RURAL areas?
A. 65 pc coming from urban centers While 65 pc resides in RURAL AREAS

3. What's the number in trade facilitation to global market in india?
A. India’s poor ranking in its foreign trade promotion policies explains our showing in inward FDI. In the World Economic Forum’s 2012 Global Enabling Trade Index, India figures in the bottom tier. On market access parameters in particular, it figures third from last on a list of 132 countries promises.
4. what is the percentage of de eloped countries from their earnings from IPR
A. 35% of USA and 39% of EU. Novartice, another NATCO, sowaldi 80,000 to 1000 rs.

13. RAILWAYS

आम आदमी रेल का टिकट ले भी ले तो उसे सीट की बात तो छोडि़ए,ठीक से खड़े होने अथवा गलियारे में बैठने की जगह भी नहीं मिलती। इस आपूर्ति के लिए ४५,००० डिब्बों की अतिरिक्त जरूरत है। जिससे हरेक रेल में अतिरिक्त डिब्बे जोड़े जा सकें। अतिरिक्त रेल लाइंने बिछाने के साथ इकहरी लाइनों का दोहरीकरण भी जरूरी है,जिससे रेलगाडि़यों की संख्या बढ़ाई जा सके। इन बुनियादी सुविधाओं को जमीन पर उतारने की बजाय हमारे यहां अहमदाबाद से मुबंई बुलेट ट्रेन चलाने की बात हो रही है। ज्ञात हो,साधारण यात्री गाडि़यों के लिए औसतन एक किलोमीटर लंबी पटरी बिछाने पर १० करोड़ रूपए प्रति किमी का खर्च आता है,जबकि द्रुत गति की बुलेट ट्रेन पर १०० करोड़ रूपय प्रति किमी का खर्च आएगा। जाहिर है,इन दो शहरों के बीच ५०० किमी पटरी बिछाने पर जितना खर्च आएगा,उतनी राशि में ५००० किमी लंबी पटरी बिछाई जा सकती है। जो २० करोड़ यात्रियों की आवाजाही का साधन बनेगी

14. FDI
यहाँ पर इसके केवल 2 ही उदाहरण उद्धत कर देना पर्याप्त है। उदाहरणार्थ वर्ष 1999 के पूर्व देश में सारा सीमेन्ट भारतीय स्वदेशी उद्यम बनाते थे। देश में निर्माण कार्यों में उछाल आने की आशा में यूरोप के छह बडे़ सीमेन्ट उत्पादकों ने दक्षिण पूर्व एशिया के कोरिया आदि देशोें से सस्ती सीमेन्ट भेज कर प्रारंभ कर हमारे देश में स्थानीय सीमेन्ट उत्पादकों को दबाब में लाकर उनको उद्यम बिक्री को बाध्य करके आज हमारी आधी से अधिक सीमेण्ट उत्पादन क्षमता पर कब्जा कर लिया है।. उदाहरणार्थ आज टाटा के टिस्को के सीमेन्ट के कारखाने हो या एसीसी व गुजरात अम्बुजा आदि के यूरोपीय कम्पनियों लाफार्ज व डाॅलसिम द्वारा अधिग्रहण के बाद आज देश की दो तिहाई सीमेन्ट उत्पादन क्षमता यूरोपिय सीमेन्ट उत्पादकों के स्वामित्व व नियंत्रण में गयी है। अर्थात् विदेशी कम्पनियां भारत में ‘‘मेक इन’’ कर रही हैं।
8 aaज शीतल पेय जैसे अनेक उपभोक्ता उत्पादों के 70-80 प्रतिशत तक बाजार कोक-पेप्सी के हाथों टूथ पेस्ट व जूते पाॅलिश सदृश अनेक उपभोक्ता उत्पादों में 85-90 प्रतिशत बाजार एवं स्वचालित वाहनों से लेकर टीवी, फ्रीज, ऐसी, सीमेन्ट आदि टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों में 65-70 प्रतिशत बाजार विदेशी कम्पनियों के नियंत्रण में है।
15. 9. Soft drinks - sad saga
उत्पादन तंत्र का दो तिहाई आज विदेशियों के नियंत्रण में चला गया। उदाहरण के लिए हमारे देश में साफ्ट ड्रिंक्स के करीब पचास-साठ ब्रांड्स विभु, सुनौला, थम्स अप, लिम्का, कैम्पा कोला बहुत सारे पूरे देश भर में अनेक ब्रांड थे और अब दो विदेशी ब्राण्ड ही बच गये सारी साफ्ट ड्रिंक्स कम्पनियाँ या तो बंद हो गई या विदेशियों द्वारा अधिग्रहीत (टेकओवर) कर ली गई। जैसे पारले प्रोडक्ट का साफ्ट ड्रिंक का जो 600 करोड़ रुपये वार्षिक का साफ्ट ड्रिंक्स का व्यवसाय था, वह कारोबार कोको कोला ने अधिग्रहित (टेकओवर) किया। पार्ले प्रोडक्ट्स के शीतल पेय व्यवसाय के अधिग्रहण की इस कहानी को बताने से थोड़ा सा समय ज्यादा लगेगा।
A. लेकिन, इससे यह स्पष्ट होगा कि भारत में उत्पादन के नाम पर 1990 के दशक में चलते हुये उद्यमों को अधिग्रहीत करने का षड़यंत्र था। कान्सपिरेन्सी किस तरह की होती रही है। जब कोका कोला कम्पनी आई तो उसमें सबसे पहले पारले प्रोडक्ट्स लगेगा थम्स अप लिम्का के बॉटल बाजार से गायब होनी शुरू हो गयी। दुकानदारों को पार्ले के ब्राण्डों के खाली क्रेट के बदले कोका कोला के भरे क्रेट मिलने लग गये।
B. उस समय शीतल पेय काँच की बोतलों में आता था जो बॉटल मेन्यूफेक्चरर था। पारले प्रोडक्ट्स के बाॅटल निर्माता को भी अनुबन्धित कर लिया कि हम तुमसे इतनी बोतल खरीदेंगे शर्त यह है कि इस अवधि में तुम किसी दूसरे के लिए बोतल नहीं बनाओगे। अब पार्ले प्रबन्धन को लगा कि हमारी बोतल मार्केट से वापस री-सरकुलेट होकर नहीं आ रही है कि उनको धोकर वापस भरें, तब अपने मेन्युफेक्चरर को कहा कि इतनी बोतल बना दो तो उसने कहा नहीं अब तो मैं टाई-अप हूँ, मैं नहीं करूँगा।
C. इसके अतिरिक्त हाइवे पर व अन्यत्र रेस्टोरेण्टों को भी अनुबन्धित कर लिया कि जैसे मान लो बनारस से दिल्ली तक हाइवे पर आपने उस समय देखा होगा कि जो ढाँबे वाले या रेस्टोरेंट वाले होते थे उनको एक छोटा फ्रिज मुफ्त देती थी कम्पनी और कहती थी अपना पूरा परिसर हमारे ब्राण्ड के नाम से पेंट करवा लो और एक या दो साल तक किसी दूसरे का साफ्ट ड्रिंक नहीं रखना तो यह फ्रिज मुफ्त देंगे यानी कि बाजार पर अपना एकाधिकार करना।
D. जैसा मैंने पूर्व में कहा कि हमारे यहाँ इनकम टैक्स रेट बहुत ऊंची थी, पूंजी निर्माण कठिन था। किसी भी कम्पनी का सार्वजनिक निर्गम (Public Issue of Shares) आता तो पूंजी निर्गमन नियन्त्रक अनुमोदन आवश्यक था। इसलिये हिन्दुस्तान में किसी भी कम्पनी में प्रवर्तकों (Promoters) के शेयर 10-20 प्रतिशत ही होते थे। 40 प्रतिशत के करीब शेयर्स फाइनेन्शियल इन्स्टीट्यूूशन्स के पास होते थे। उन दिनों ऐसे भी समाचार थे कि शेयर बाजार से पार्ले के शेयर कुछ कोका कोला कम्पनी ने खरीदने प्रारम्भ किये थे। इसलिये पार्ले के मालिकों को लगा कि कहीं ऐसा ना हो कि वो 10-12 प्रतिशत शेयर स्टाक मार्केट से खरीद कर उसका हास्टाइल टेकओवर (बलात अधिग्रहण) न हो जाए। ऐसे में पार्ले कम्पनी पूरी हाथ से निकल सकती थी, इसलिए 600 करोड़ के टर्नओवर वाली कम्पनी जिसके थम्स अप, लिम्का जैसे अत्यन्त लोकप्रिय ब्राण्ड थे बिक गयी.

16. OUR OLD SCIENCE AS MYTH. MANJUL BHARGAVA
भारतीय मूल के कैनेडियन-अमरीकन गणितज्ञ हैं 40 वर्षीय मंजुल भार्गव। गत वर्ष 2014 में उन्हें गणित के क्षेत्र का नोबल पुरस्कार कहलाने वाला फील्ड्स मेडल पुरस्कार प्रदान किया गया। मंजुल की शिक्षा-दीक्षा कुछ हटकर हुई। उन्होंने अपने नाना से संस्कृत सीखी और भारतीय गणित की प्राचीन परंपरा का गहरा अध्ययन किया। कुछ माह पहले दिए गए एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, 'जब मैं बड़ा हो रहा था तो मुझे महान गुरुओं को पढ़ने का अवसर मिला। इनमें पाणिनी, पिंगल और हेमचंद्र जैसे महान भाषा वैज्ञानिक और कवि तथा आर्यभट्ट, भास्कर और ब्रह्मगुप्त जैसे महान गणितज्ञ शामिल हैं। इनके काम में गणित की महान खोजें छिपी हुई हैं, जिन्होंने मुझ जैसे युवा गणितज्ञ को गहराई से प्रभावित किया। पिंगल, हेमचंद्र और ब्रह्मगुप्त का प्रभाव मेरे काम में देखा जा सकता है। अपने नाना से मैने जाना कि किस प्रकार वे महान गणितज्ञ स्वयं को गणितशास्त्री न मान कर कवि समझते थे।'

मंजुल ने आधुनिक गणित को काफी कुछ दिया है। साथ ही जर्मन गणितज्ञ कार्ल फैड्रिक गॉस के काम से सामने आई दो सौ साल पुरानी गणितीय उलझन को सुलझाया है। लेकिन मंजुल का कहना है कि उन्हें इसकी दिशा 628 ई. के भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त के संस्कृत ग्रंथ से मिली है। अर्थात् परंपरा ने प्रतिभा को राह दिखाई।

लेकिन सबकी समझ मंजुल भार्गव की तरह नहीं होती। कुछ लोगों की समझ पर पूर्वाग्रहों के ताले जड़े होते हैं। मैंने एक भिखारी के बारे में सुना था जिसके मरने पर जब उस स्थान को खोदा गया जहां बैठ कर वह भीख मांगता था तो वहां से बहुत सारा धन निकला। कुछ लोगों को अपने घर का कुंआ नहीं पड़ोस का पोखर ही ज्यादा अच्छा लगता है और कुछ लोग सत्य को अपने वाद के जंगले में कैद रखना चाहते हैं। 3 जनवरी, 2015 को 102वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मेक इन इंडिया' पर अपने विचार रखे और प्रेरणा स्वरूप प्राचीन भारतीय विज्ञान के कुछ प्रसंगों, परिकल्पनाओं पर प्रकाश डाला। आयोजन के दूसरे दिन कुछ विषय विशेषज्ञों ने प्राचीन भारतीय विज्ञान पर अपनी प्रस्तुतियां दीं। इस आयोजन के एक सदी पुराने इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था।
17. WTO AND SUBSIDIES WAR.,.
Thursday, 28 August 2014
धर्मेंद्रपाल सिंह
जनसत्ता 28 अगस्त, 2014 : 1. अपने खाद्य सुरक्षा अधिकार की रक्षा के लिए भारत के कड़े रुख के कारण विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के आका अमीर देश भले नाराज हों,
लेकिन अब हमारे समर्थन में कुछ देश और संगठन खुल कर सामने आए हैं। पहले पड़ोसी चीन ने समर्थन दिया और अब संयुक्त राष्ट्र के इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (आइएफएडी) के अध्यक्ष ने भारत के पक्ष में पैरवी की है। आइएफएडी अध्यक्ष के अनुसार किसी भी राष्ट्र के लिए अन्य देशों में रोजगार के अवसर सृजित करने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम अपनी जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान करना है। भारत भी यही चाहता है।।

2. भारत के लिए खाद्य सुरक्षा कानून कितना जरूरी है, यह जानने के लिए विश्व भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) पर दृष्टि डालना जरूरी है। इसके अनुसार भूख के मोर्चे पर जिन उन्नीस देशों की स्थिति अब भी चिंताजनक है उनमें भारत एक है। रिपोर्ट में कुपोषण की शिकार आबादी, पांच साल से कम आयु के औसत वजन से कम बच्चों की संख्या और बाल मृत्यु दर (पांच साल से कम आयु) के आधार पर दुनिया के एक सौ बीस देशों का ‘हंगर इंडेक्स’ तैयार किया गया और जो देश बीस से 29.9 अंक के बीच में आए उनकी स्थिति चिंताजनक मानी गई है। भारत 21.3 अंक के साथ पड़ोसी पाकिस्तान (19.3), बांग्लादेश (19.4) और चीन (5.5) से भी पीछे है। शिक्षा के अभाव, बढ़ती सामाजिक-आर्थिक खाई और महिलाओं की बदतर स्थिति के कारण भारत में विशाल कंगाल (गरीबी रेखा से नीचे) आबादी है।
इसीलिए भारत ने डब्ल्यूटीओ की जिनेवा बैठक में कड़ा रुख अपनाया, जिससे अमेरिका, यूरोपीय देश और आस्ट्रेलिया बिलबिलाए हुए हैं।
3. भारत ने बैठक में साफ कर दिया कि जब तक उसे अपनी गरीब जनता की खाद्य सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी तब तक वह व्यापार संवर्धन समझौते (टीएफए) को लागू नहीं होने देगा। मनमोहन सिंह सरकार ने पिछले साल संसद में खाद्य सुरक्षा कानून पारित किया था, जो देश की लगभग अस्सी करोड़ आबादी को सस्ता अनाज मुहैया करने की गारंटी देता है।
इस कानून के अंतर्गत जरूरतमंद लोगों को तीन रुपए किलो की दर पर चावल, दो रुपए किलो गेहंू और एक रुपया किलो के हिसाब से मोटे अनाज (बाजरा, ज्वार आदि ) प्रदान करना सरकार की जिम्मेदारी है। नया कानून लागू हो जाने पर सरकार को करोड़ों रुपए की सबसिडी देनी पड़ रही है। इस साल के बजट में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने के लिए एक सौ पचास लाख करोड़ रुपए का प्रावधान रखा है।
4. डब्ल्यूटीओ के कृषि करार (एओए) के अनुसार किसी भी देश का सबसिडी बिल उसकी कुल कृषि पैदावार का दस प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। पिछले साल बाली (इंडोनेशिया) की डब्ल्यूटीओ बैठक में भारत ने जब इस दस फीसद पाबंदी का प्रबल विरोध किया तो उसे चार साल तक की छूट दे दी गई। छूट के बदले अमीर देशों ने इस वर्ष 31 जुलाई से टीएफए लागू करने की शर्त रखी थी। टीएफए पर अमल का सबसे ज्यादा लाभ अमीर देशों को होगा, इसलिए वे इसे जल्दी से जल्दी लागू कराना चाहते हैं। भारत की मांग है कि टीएफए लागू करने से पहले कृषि सबसिडी विवाद का स्थायी हल खोजा जाना चाहिए। उसे डर है कि टीएफए लागू हो जाने से उसके हाथ बंध जाएंगे। चार साल की छूट खत्म हो जाने के बाद अमीर देश दस फीसद खाद्य सबसिडी की शर्त उस पर थोप देंगे।
5. दुनिया में आज दो तरह की खाद्यान्न सबसिडी चालू है। पहली सबसिडी किसानों को दी जाती है। यह सरकार द्वारा सस्ता उर्वरक और बिजली-पानी मुहैया कराने और न्यूनतम फसल खरीद मूल्य तय करने के रूप में दी जाती है। दूसरी सबसिडी उपभोक्ताओं को मिलती है।
राशन की दुकानों से मिलने वाला सस्ता गेहूं-चावल इस श्रेणी में आता है। भारत में दोनों तरह की सबसिडी दी जा रही है और उसका सबसिडी बिल कुल खाद्यान्न उपज के दस प्रतिशत से अधिक है। डब्ल्यूटीओ समझौते के अनुसार अगर कोई देश करार का उल्लंघन करता है तो उसे अपना खाद्यान्न भंडार अंतरराष्ट्रीय निगरानी में लाना पड़ेगा। प्रतिबंधों की मार झेलनी पड़ेगी, सो अलग। भारत ऐसे इकतरफा नियमों का विरोध कर रहा है।
6. डब्ल्यूटीओ का कोई भी समझौता सदस्य देशों की सर्वानुमति से लागू हो सकता है। विकसित देश भारत पर आरोप लगा रहे हैं कि विश्व व्यापार के सरलीकरण के लिए जरूरी टीएफए की राह में वह रोड़े अटका रहा है। भारत के नकारात्मक रवैए के कारण उनके निर्यात को भारी नुकसान पहुंचेगा। उनका मानना है कि टीएफए लागू हो जाने से विश्व व्यापार में दस खरब डॉलर की वृद्धि होगी और 2.1 करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा।
7. सच यह है कि अमेरिका और यूरोपीय देश अभी तक मंदी की मार से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। अपना माल बेचने के लिए उन्हें भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे विकासशील देशों के विशाल बाजार की दरकार है। टीएफए लागू हो जाने से करों की दरें कम होंगी और खर्चे घटेंगे। इससे दुनिया की मंडियों में उनका माल कम कीमत पर मिलेगा।
भारत और उसके समर्थक विकासशील देशों का मत है कि बड़े देशों को रास आने वाले टीएफए पर अमल से पहले उन्हें अपनी जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
8. हिंदुस्तान पर बाली में बनी सहमति से पलट जाने का आरोप लगाने वाले अमीर देश यह भूल जाते
हैं कि अपना हित साधने के लिए उन्होंने 2005-2006, 2008-2009 और 2013 में कैसे-कैसे अड़ंगे लगाए थे। विश्व बिरादरी की भावनाओं की उपेक्षा कर अमेरिका आज भी अपने किसानों को हर साल बीस अरब डॉलर (बारह खरब रुपए) की सबसिडी देता है और इसी के बूते खाद्यान्न निर्यात कर पाता है।
9. Inclusive growth... आंकड़े गवाह हैं कि देश की 17.5 फीसद आबादी कुपोषण की शिकार है और चालीस प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम है। बाल मृत्यु दर भी 6.1 फीसद है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार अगर कोई सरकार ‘इंक्लूसिव ग्रोथ’ मॉडल को ईमानदारी से अपनाए तो विकास दर में जितने फीसद वृद्धि होगी उसकी आधी दर से कुपोषण में कमी आएगी। उदाहरण के लिए, अगर विकास दर में चार प्रतिशत के हिसाब से बढ़ोतरी होती है तो कुपोषण दो प्रतिशत के हिसाब से कम होना चाहिए। हमारे देश में 1990-2005 के बीच औसत विकास दर 4.2 प्रतिशत रही, लेकिन इस दौरान कुपोषण में कमी आई महज 0.65 फीसद। इसका अर्थ यही है कि खुली अर्थव्यवस्था अपनाने का लाभ गरीब और कमजोर वर्ग को न के बराबर मिला है।
आज जहां एक ओर करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं है, वहीं दूसरी तरफ बेवजह खाकर मोटे हो रहे लोगों का बढ़ता आंकड़ा देश और दुनिया में गरीबों-अमीरों के बीच चौड़ी होती खाई को उजागर करता है।
IMP . फिलहाल पूरी दुनिया में कुपोषण के शिकार अस्सी करोड़ लोग हैं, जबकि मोटापे की शिकार आबादी एक अरब है। भारत में भी संपन्न तबके में वजन बढ़ने का चलन एक महामारी बन चुका है। ....दूसरी तरफ देश में अरबपतियों की संख्या में लगातार हुआ इजाफा हमारे नीति निर्माताओं की पोल खोलता है। ग्लोबल वैल्थ रिपोर्ट के अनुसार भारत में अभी छियासठ हजार अरबपति हैं और 2018 आते-आते उनकी संख्या बढ़ कर 3.02 लाख हो जाएगी। देश में अरबपतियों की संख्या में इजाफे की रफ्तार छियासठ प्रतिशत है, जो अमेरिका (41 प्रतिशत), फ्रांस (46 प्रतिशत), जर्मनी 46% ( और आस्ट्रेलिया (48 प्रतिशत) से भी अधिक, ब्रिटेन (55 प्रतिशत) vah india 66%.

10. खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया में खाद्यान्न की भरपूर पैदावार होने से पिछले साल गेहूं के मूल्य में सोलह प्रतिशत, चावल में तेईस प्रतिशत और मक्का में पैंतीस प्रतिशत कमी आई थी। तब मानसून की मेहरबानी से भारत में भी खाद्यान्न की पैदावार बढ़ी। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब देश और दुनिया में खाद्यान्न की कोई कमी नहीं है फिर कुपोषण की शिकार आबादी कम क्यों नहीं हो रही?
हाल ही में आई पुस्तक ‘फीडिंग इंडिया: लाइवलीहुड, एंटाइटेलमेंट ऐंड कैपैबिलिट’ में इसका उत्तर खोजा जा सकता है। पुस्तक के लेखकों के अनुसार समस्या पैदावार की नहीं, बल्कि पैदावार जरूरतमंदों तक पहुंचाने से जुड़ी है।
खाद्य सुरक्षा विधेयक के पैमाने पर इसे कस कर देखने से भी कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। न्यूनतम खरीद मूल्य के तहत सरकार को गेहूं की कीमत औसत चौदह रुपए प्रति किलो पड़ती है। इसमें परिवहन, मंडी कर, भंडारण, अनाज बोरों में भरने, कमीशन, प्रशासनिक खर्च और ब्याज को जोड़ दिया जाए तो लागत लगभग दोगुना हो जाती है। सरकार के अनुसार भ्रष्टाचार और कालाबाजारी के कारण राशन का तीस से चालीस प्रतिशत अनाज जनता तक पहुंच ही नहीं पाता है। अगर इस चोरी को भी जोड़ दिया जाए तो लागत आंकड़ा और ऊपर हो जाएगा।
घोर गरीबी के कारण देश की लगभग एक चौथाई जनता बीमारी, बेरोजगारी और अकाल का मामूली-सा झटका झेलने की स्थिति में भी नहीं है। समस्त सरकारी दावों के बावजूद करोड़ों गरीबोें को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा नहीं जा सका है।
11. दूसरी तरफ देश में अरबपतियों की संख्या में लगातार हुआ इजाफा हमारे नीति निर्माताओं की पोल खोलता है। ग्लोबल वैल्थ रिपोर्ट के अनुसार भारत में अभी छियासठ हजार अरबपति हैं और 2018 आते-आते उनकी संख्या बढ़ कर 3.02 लाख हो जाएगी। देश में अरबपतियों की संख्या में इजाफे की रफ्तार छियासठ प्रतिशत है, जो अमेरिका (41 प्रतिशत), फ्रांस (46 प्रतिशत), जर्मनी (46 प्रतिशत), ब्रिटेन (55 प्रतिशत) और आस्ट्रेलिया (48 प्रतिशत) से भी अधिक है।
डब्ल्यूटीओ को लगता है कि भारत के खाद्य सुरक्षा कानून से दुनिया के अनाज बाजार में अस्थिरता आएगी और अंतत: खाद्यान्न की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव होगा। सवा अरब की आबादी का पेट भरने के लिए भारत को भारी मात्रा में गेहंू-चावल और अन्य खाद्यान्न की आवश्यकता है। फिलहाल खाद्यान्न के मोर्चे पर देश आत्मनिर्भर है, लेकिन भविष्य में सूखे या बाढ़ से अगर पैदावार घट गई तो भारत को भारी मात्रा में गेहूं-चावल आयात करना पड़ेगा। निश्चय ही तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें आसमान छूने लगेंगी। लेकिन इस लचर तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
12. किसी भी देश की सरकार की पहली जिम्मेदारी अपनी जनता के प्रति होती है और जनता के भोजन का इंतजाम करना उसका उत्तरदायित्व है। इस उत्तरदायित्व पर सवाल उठाने का अधिकार किसी देश या अंतरराष्ट्रीय संगठन को नहीं दिया जा सकता।
भारत का मानना है कि डब्ल्यूटीओ के अधिकतर नियम खुली अर्थव्यवस्था के पैरोकार विकसित देशों के हित में हैं। अपने बाजार को विस्तार देने के लिए वे दुनिया के गरीब मुल्कों को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं। लेकिन कोई भी विकासशील या गरीब देश अपने हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। भारत ने बलि का बकरा बनने से इनकार कर बहुत अच्छा काम किया है।
18,19,....
20. Excellence in technology : साऊथ काॅलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग प्रमुख डाॅ. बॅरेन ने टेक्नालाॅजी के विकास का आदश्र बताया। उन्होंने कहा कि हम टेक्नालाॅजी को उस अवस्था तक ले जाना चाहते हैं जब बड़े से बड़े कारखाने दो कर्मचारियों के भरोंसे हम चला सकेंगे, एक कुत्ता और एक आदमी। सारी मशीनरी आदमी तो मालिक साहब के बटन दबाने के बाद चलती ही रहेगी। इसकें कोई शरारती आदमी आकर बाधा न करें इसलिए एक अच्छा अल्सेशियन कुत्ता रखेंगे और कुत्ते को दिन भर खिलाने-पिलाने के लिए एक आदमी रखेंगे। इन दो कर्मचारियों के भरोंसे हम बड़े से बड़ा कारखाना चलायेंगे। यह इनका आदर्श हो रहा है।

21. Common bird species such as sparrow and skylark facing decline in Europe
Some rarer birds have grown in number over last 30 years due to conservation efforts while some well known species have fallen
यूरोप: 30 साल में 42 करोड़ पक्षी घटे
3 नवंबर 2014. पिछले 30 सालों में यूरोप में पक्षियों की संख्या आश्चर्यजनक तरीक़े से घटी है.
विज्ञान से जुड़ी पत्रिका 'इकोलॉजी लेटर्स' में छपे अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि यूरोप में पिछले तीन दशकों में लगभग 42 करोड़ पक्षी कम हुए हैं.
पत्रिका के मुताबिक़ खेती के आधुनिक तौर-तरीक़ों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास को होने वाले नुक़सान के कारण ऐसा हुआ है.
अध्ययन के अनुसार मैना skylark और गोरैया sparrow सहित पक्षियों की आबादी में क़रीब 90 फ़ीसदी कमी आई है.
क़ुदरती आवास

ख़ास दुर्लभ प्रजाती के पक्षियों की संख्या में हाल के वर्षों में इज़ाफ़ा भी हुआ है. इसे पक्षियों के सरंक्षण से जुड़े प्रयासों का परिणाम माना जा रहा है.
अध्ययन में शामिल और पक्षियों की सुरक्षा के लिए काम करने वाली रॉयल सोसायटी के रिचर्ड ग्रेगोरी का कहना है, "यूरोप के पक्षियों की ये चेतावनी है. इससे साफ़ है कि हम जिन तरीक़ों से पर्यावरण का संरक्षण कर रहे हैं वे पक्षियों की कई प्रजातियों के लिए नुक़सानदेह हैं."
वैज्ञानिकों के मुताबिक़ पक्षियों की संख्या में कमी से मानव समाज को कई तरह के नुक़सान हो सकते हैं.
उन्होंने बताया, "इस समस्या से निजात पाने के लिए हमें सभी पक्षियों और उनके क़ुदरती आवास के संरक्षण और क़ानूनी सुरक्षा की व्यवस्था ज़रूरी है."
पक्षियों की आबादी से जुड़े इस आकलन में 25 देशों में यूरोपीय पक्षियों की 144 प्रजातियों को शामिल किया गया है.


लंदन। एक अध्ययन के अनुसार यूरोप में पिछले 30 साल में 42 करोड़ पक्षी कम हुए हैं। इनमें से 10 फीसदी बहुतायत और आम तौर पर पाए जाने वाले पक्षी गौरेया, मैना, चकवा, भूरे तीतर आदि हैं। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि इनकी संख्या कम होने की वजह खेती के आधुनिक तौर-तरीकों का होना और पक्षियों के प्राकृतिक आवास को होने वाली क्षति है।
Kuchh log apane ko mehdood bana lete hain, jeene ko to ji lete hain, magar chidiya ghee nahin anti unki chat par, kambakht jo munh pher ke kha lete hain.
वैज्ञानिकों ने 24 देशों में यूरोपीय पक्षियों की 144 प्रजातियों पर किए एक अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला है। अध्ययन से यह भी पता चला है कि ऎसा नहीं है कि पक्षियों की संख्या सिर्फ कम ही हुई है। खास दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों जैसे बाज, विशेष प्रजाति का कौआ, गिद्ध, सारस, रॉबिन (एक प्रकार का पक्षी, जिसकी छाती लाल होती है), श्यामा पक्षी आदि की संख्या में हाल के साल में इजाफा भी हुआ है। यह पक्षियों के संरक्षण से जुड़े प्रयासों का परिणाम है। ( shayad yahi Hal saman ka ghee hae, samanya vyakti jahan preshan hae, kuch ameer manviya prajatiya phalpool rahee haein. Sheer chavani have, vahan lakho
इधर इक दिन की आमदनी का औसत चवन्नी है
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमायी है।
रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रखके ये कीमत चुकाई.
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Azeen Ghorayshi
The Guardian, Sunday 2 November 2014 16.08
A skylark, one of the 144 species looked at in the study. The skylark population has fallen by 46% since 1980.
Bird populations across Europe have decreased by over 420 million in the past 30 years, according to a study that brings together the results of scientific surveys in 25 countries While some rarer species have seen an increase in numbers due to concerted conservation efforts, more common species across Europe are facing a steep decline.

Some of the birds that have suffered the most alarming declines are the most well known species including the house sparrow which has fallen in number by 147m or 62%, the starling ( maina) (53%) and skylark (46%).

The study looked at 144 species across Europe between 1980 and 2009. Dividing the species up into four groups, from extremely rare to most common, analysts found that a small number of common species declined by over 350 million –over 80% of the total population decline of birds in that time period overall. Rarer birds, in contrast, increased by over 21,000 in the same time period.

The results indicate that efforts at conserving rarer species seem to be having an impact but may be too narrow an approach, possibly at the expense of more common species.

“The focus up to this point has very much been on conserving rare species,” says the lead author, Richard Inger, from the University of Exeter. “That’s what it should be, in many ways, but the issue there is that if you’re not careful, you can spend all of your conservation dollars on just protecting the rare things. You can take your eye off the ball, if you will.”

Birds which increased over the course of the study include the blackcap (up 114%), common chiffchaff (up 76%) and wren (56%).

A male blackcap. Photograph: Andrew Darrington/Alamy
The issue is complicated by the fact that conserving rare bird species is relatively easy in comparison to more widespread efforts required to conserve common ones.

“If the species is very localised, there may be very strong conservation measures,” says Graham Madge, a spokesman for the Royal Society for the Preservation of Birds, which collaborated on the study. “Whereas for a species like the skylark, which will occur in most countries across Europe, it’s much harder to bring in a rescue measure because it requires the rollout of broad, landscape-scale conservation measures.”
Reasons.
The most commonly cited reason for this vast decline in bird species is agricultural intensification which has squeezed out areas that birds need for feeding and nesting.

But Inger emphasises that this can’t be seen as the only problem. “People have tended to concentrate on farmland, but some of these species that don’t use farmland habitats at all are also declining. It’s a sign of wider scale environmental issues, such as increases in urbanisation, and the only way we’re going to protect these widespread species is a more holistic approach to how we manage the environment in general.”

Benefits of birds, tota maina ki kahani to purani purani ho gayi,Nevertheless, Madge and Inger agree that wildlife-friendly farming schemes like the UK’s will be necessary to focus conservation efforts beyond token rarer species. But the repercussions extend beyond just bird biodiversity, as birds play vital roles in ecosystem processes such as decomposition, pest control, pollination, and seed dispersal. Since common species exist in higher numbers, they play a bigger role in maintaining the ecosystem as well.

“This was a bit of a wake-up call really,” says Inger. “We knew we were going to see a big decline in bird populations, but to see how big that number really was and how focused the declines were on this small number of common species was really very surprising.”
21. पर्यावरण को लेकर कब जागेंगे हम?
bhaskar news|Nov 04, 2014, 05:37AM IST

“वैज्ञानिकों ने अपनी बात कह दी है। उनके संदेश में कोई अस्पष्टता नहीं है। नेताओं को अब अवश्य कदम उठाने चाहिए। समय हमारे साथ नहीं है”- यह बात संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून ने जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिकों की ताजा रिपोर्ट जारी करते हुए कही। क्या अगले महीने पेरू के शहर लीमा में जलवायु परिवर्तन रोकने की नई संधि पर बातचीत के लिए इकट्ठे होने वाले नेता इस भावना से कदम उठाएंगे? 1990 के बाद से इंटर गवर्नमेंटल पैनल की आई पांचवीं रिपोर्ट का संदेश यही है कि ऐसा नहीं हुआ तो दुनिया उस मुकाम पर पहुंच जाएगी, जहां इनसान के पास सिर्फ भाग्य के भरोसे रहने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। दरअसल, वैज्ञानिकों ने अपनी ताजा रिपोर्ट में जितनी सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है, वैसा उन्होंने पहले कभी नहीं किया। अपने निष्कर्षों को उन्होंने इस बार अधिक जोर देकर कहा है। याद दिलाया है कि वातावरण और समुद्र का तापमान बढ़ने, वैश्विक जलचक्र में परिवर्तन, हिमखंडों में ह्रास और समुद्र का औसत जलस्तर बढ़ने की घटनाएं सच्ची हैं और इनका कारण मानव गतिविधियां हैं। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में पर्याप्त कटौती नहीं हुई, तो इन परिघटनाओं को रोका नहीं जा सकेगा, बल्कि इनके परिणामस्वरूप दुनिया को अनाज की कमी, लोगों के पलायन, समुद्र तटीय शहरों और द्वीपों के डूबने, वन तथा पशुओं के व्यापक विनाश आदि जैसी समस्याओं से जूझना पड़ सकता है। एकमात्र उपाय यही है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती हो। इसके लिए धन चाहिए, जो खर्च करने के लिए न तो विभिन्न देशों की सरकारें तैयार हैं और न ही बड़ी कंपनियां, इसीलिए वैज्ञानिकों ने कहा है कि लीमा में बजट पर सहमति नहीं बनी तो जलवायु परिवर्तन रोकने की तमाम बातें निरर्थक रहेंगी। यही सवाल आज दुनिया के सामने है। क्या जिन देशों ने धरती के वातावरण को जितना गंदा किया है, उसकी सफाई के लिए वे उतना त्याग करने को तैयार हैं? ऐसा करने पर 22 वर्ष पहले सिद्धांत रूप में सहमति बनी थी, लेकिन अपने स्वार्थ में अंधे धनी देश और समृद्ध वर्ग अपनी जिम्मेदारियों से बचते रहे। अब खतरा सिर पर आ गया है, तब वे क्या करते हैं, यह जल्द ही जाहिर होगा। उन्हें समझना होगा कि समय गुजरने के साथ लागत बढ़ती ही जाएगी।
22. International data and Indian scenario
अब भारत की विषम आर्थिक स्थिति 1990-91 के बीच पैदा हुई। जब असल ही पूरी तरह विफल हो गया, तो नकल को तो होना ही था। भारत भी 1947-48 से लेकर अब तक लगभग 40 साल तक इसी साम्यवादी-समाजवादी व्यवस्था के चलते अपने आपको चैपट कर बैठा। 1990 आते-आते भारत भी दिवालियापन के कगार पर आ पहुंचा। 1990 में जब चार महीनें के लिए देश में चन्द्रशेखर सरकार बनी, तो भारत की हालत इतनी खराब थी कि अपना भुगतान संतुलन का चन्दा भी पूरा करना कठिन हो गया। विदेशों से, विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष से जो उधार ले रखा था, उसका ब्याज भी चुकाना संभव नहीं हो रहा था। अंतत भारत सरकार को 67 टन सोना इंग्लैण्ड (20 tonnes) तथा स्विटजरलैंड 47 tonnes,to raise £600 million, between 21 may to 31 may 1991 jolting the country out of economic slumber. Isi ke saath hee chandershekhar ki sarkar giri aur narsingharao PM aur Dr. Manmohan singh FM bane, rsshtr ke naam Sandesh me naye PM ne kana ki there is no alternative to liberalisation. क बैंकों के पास गिरवी रखना पड़ा। व्यक्ति अपने घर का सोना-चांदी कब गिरवीं रखता है? जब उसके सारे संसाधन समाप्त प्रायः हो जाते हैं। भारत का हाल भी यही हुआ। सोना गिरवी रखने से थोड़ी बहुत राहत मिली, किन्तु आगेे क्या किया जाए? यह यक्ष प्रश्न था। तुरन्त चुनाव हुए - मई-जून 1991 मंे। श्री नरसिंह राव के नेतृत्व मंे कांग्रेस ने कुछ अन्य दलों के सहयोग से सरकार बनाई। श्री नरसिंह राव ने तत्कालिक वित्त सचिव डाॅ. मनमोहन सिंह से पूछा कि भारत को इस आर्थिक गर्त से निकालने का कोई मार्ग है क्या? डाॅ. मनमोहन सिंह के हामी भरने पर उन्हें वित्त सचिव से वित्तमंत्री बना दिया। डाॅ. मनमोहन सिंह ने आते ही इस दिशा में 180 डिग्री का परिवर्तन किया। देश को अमेरिकी पूंजीवादी माॅडल
1990-91 - 67 tonnes ( 20 E+47 Sw)

23. लेकिन अमेरिका में इन दिनों अमेरिकी समृद्धि की बात नहीं हो रही। यू-ट्यूब पर आप देख सकते हैं कि वहां इन दिनों उन विश्लेषकों की धूम है जो यह कह रहे हैं कि विश्व का सबसे समृद्ध देश होने के बावजूद अमेरिका में सबसे विकट गरीबी के दर्शन किए जा सकते हैं।
A. तीस करोड़ की आबादी वाले अमेरिका में पांच करोड़ अमेरिकियों को दो समय का भोजन उपलब्ध नहीं है। उनकी आमदनी दो डॉलर प्रतिदिन से भी कम है और उन्हें नाममात्र की मिलने वाली सरकारी सहायता न मिले तो उनका जीवन दूभर हो जाए। आधी अमेरिकी आबादी निर्धनता में जी रही है, अपनी न्यून आय से वे हारी-बीमारी या किसी आपात-स्थिति के लिए कुछ बचा सकने में समर्थ नहीं हैं।
B. अमेरिका में 1970 के बाद से ऐसी नौकरियों की संख्या लगातार घटती रही है जिनकी आय उन्हें मध्यवर्ग में पहुंचा सकती है। मध्यवर्ग सिकुड़ता जा रहा है और ऐसी रही-सही नौकरियों पर भी भारतीय या चीनी पकड़ बढ़ाते जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस पर चिंता जता चुके हैं। कई अमेरिकी राजनेता बाहरी लोगों को काम सौंपा जाना बंद करवाना चाहते हैं। पर समस्या यह है कि ऐसे लोग ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए हुए हैं।
C. बाहर से आने वाले लोगों के कारण अमेरिका का जन-भूगोल बदलता जा रहा है। 1980 में अस्सी प्रतिशत अमेरिकी यूरोपीय मूल के गोरे थे। अब उनकी संख्या घट कर तिरसठ प्रतिशत रह गई और 2060 तक उसके घट कर चौवालीस प्रतिशत रह जाने की आशंका है। इसका राजनीतिक प्रभाव आप बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने में देख सकते हैं। कहते हैं कि वे अश्वेत अमेरिकियों के समर्थन से ही जीते हैं।

D. 1%has20. Upper 10 has 40%?अमेरिका में एक तरफ गरीबी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ अमीरी भी बढ़ रही है। दुनिया के सबसे अधिक अरबपति अमेरिका में ही हैं और उनकी संख्या और समृद्धि दोनों बढ़ते जा रहे हैं। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका की एक प्रतिशत आबादी के पास अमेरिका की कुल संपत्ति का बीस प्रतिशत है और ऊपर की लगभग दस प्रतिशत आबादी के पास लगभग चालीस प्रतिशत। कुछ विश्लेषकों ने कहा है कि अब्राहम लिंकन के समय के अमेरिका में गुलामी की प्रथा समाप्त किए जाने से पहले भी उतनी विषमता नहीं थी जितनी आज है। अमेरिका में 1970 के बाद से श्रमिकों की मजदूरी नहीं बढ़ी। 2008 के बाद से उनकी मजदूरी में चालीस प्रतिशत कटौती हो चुकी है। यह बात कम लोग जानते हैं कि पूंजीवादी अमेरिका में मजदूरों के लिए यूरोप जैसे हितकारी प्रावधान नहीं हैं। वहां उन्हें बीमारी आदि के लिए भी कोई सवेतन छुट्टियां नहीं मिलतीं। उन्हें हारी-बीमारी के लिए कोई चिकित्सकीय सुविधाएं भी नहीं हैं, जबकि चिकित्सा बहुत महंगी है।

c. इस दुरवस्था ने अमेरिकी बौद्धिक जगत के एक छोटे-से वर्ग में आत्मनिरीक्षण की प्रवृत्ति पैदा की है। पिछले दिनों दर्जनों ऐसी बहुचर्चित पुस्तकें छपी हैं जिनमें अमेरिकी इतिहास के भीषण अपराध वर्णित हैं। उनमें बताया गया है कि किस तरह पहले मुख्यत: स्पेन और फिर ब्रिटेन से सोना खोजने वालों की बाढ़ अमेरिका आई थी। कोलंबस के अमेरिका पहुंचने तक वहां स्थानीय निवासियों की दस करोड़ से अधिक आबादी थी और पशुओं तथा वनस्पतियों की प्रचुरता और बहुलता। यूरोपियों की लोभजन्य क्रूरता ने थोड़े ही समय में इन सबको नष्ट कर दिया। इससे पहले मनुष्य के इतिहास में इतनी बड़ी क्रूर हिंसा का उदाहरण शायद ही रहा हो।

D. जब स्थानीय आबादी हिंसा और रोगों की भेंट चढ़ गई तो अफ्रीका से गुलामों का आयात आरंभ हुआ। इस घृणित व्यापार ने अफ्रीकी महाद्वीप को स्वस्थ्य और योग्य आबादी सेवंचित कर दिया था। 1619 में पहली बार बीस अफ्रीकी गुलाम अमेरिका पहुंचे थे। उसके बाद ढाई सौ वर्ष तक लाखों की संख्या में अफ्रीका से लाए गए गुलाम सब तरह के अत्याचार सहते हुए गोरे अमेरिकियों को संपन्न बनाने में जुटे रहे।

E. अकेले अठारहवीं शताब्दी में साठ से सत्तर लाख अफ्रीकी गुलाम बना कर अमेरिका लाए गए थे। फिर जब तंबाकू के खेत बरबाद हो गए और उतरी प्रांतों में खड़े हो रहे कपड़ा उद्योग को मजदूरों की आवश्यकता हुई तो गुलामी की प्रथा समाप्त करने का नारा लगा। 1870 में उन्हें नागरिक बना कर वोट का अधिकार दे दिया गया, लेकिन आज भी अफ्रीकी मूल के अमेरिकी सबसे निम्न स्तर पर ही जी रहे हैं।

F. अमेरिका दुनिया भर में नागरिक अधिकारों का अलम्बरदार बना घूमता है। लेकिन अफ्रीकी मूल के लोगों को नागरिकता मिलने के सौ वर्ष बाद तक उन्हें गोरों के साथ बस में यात्रा करने, रेस्तरां में खाना खाने या स्कूल में पढ़ने की मनाही थी। 1960 में रंगभेद के विरुद्ध जो आंदोलन छिड़ा उसने ही कुछ हद तक उन्हें ये अधिकार दिलवाए। आज भी अगर अमेरिकी श्रमिक सब सुविधाओं से वंचित हैं तो इसका कारण पूंजीवाद से अधिक भेद-भाव ही है, क्योंकि अधिकांश श्रमिक आबादी अफ्रीकी मूल के या हिस्पानी लोगों की है। अमेरिकी जेलों में भी उन्हीं की बहुसंख्या है। अमेरिकी कानूनों में अमेरिकी नागरिकों को सब तरह के भेदभाव से बचाने का आश्वासन है और ऐसे मामले सामने आने पर सख्ती भी बरती जाती है। लेकिन गोरे अमेरिकी स्वाभाववश उनके मार्ग में बाधाएं खड़ी किए रहते हैं और वे एक स्तर से ऊपर उठने में सफल नहीं हो पाते। इसका विषाद ही उन्हें अपराध और आक्रामकता की ओर धकेलता है।

G. Insecurity..एक शताब्दी तक शक्तिऔर समृद्धि में विश्व के शिखर पर रहने के बावजूद अमेरिकियों में अपने भविष्य के प्रति आश्वस्ति या स्वभाव की स्थिरता नहीं आ पाई। पहले उन्हें रूस और साम्यवाद संसार के लिए सबसे बड़ा खतरा दिखाई देता था। जापान की तेज आर्थिक प्रगति ने भी बहुत-से अमेरिकियों को इस आशंका से भर दिया था कि कहीं जापान की समृद्धि अमेरिका को पीछे न छोड़ दे। इस आशंका में उन्होंने चीन को आगे बढ़ाना आरंभ किया और अब उन्हें डर सताने लगा है कि देर-सबेर चीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाला है और वह उनके वर्चस्व को समाप्त कर सकता है। इस आशंका ने उन्हें भारत की ओर आशा से देखने के लिए प्रेरित किया है। वास्तव में विश्व का आर्थिक ढांचा कुछ ऐसा है कि जब तक कोई और देश अपनी समृद्धि से अंतरराष्ट्रीय पूंजी का प्रवाह अपनी ओर नहीं मोड़ लेता, अमेरिका शिखर पर बना रहेगा।

H. आज अमेरिका की समृद्धि वास्तविक कम, वायवी अधिक है। 1900 से 1970 तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था का स्वर्णिम दौर था। 1970 के बाद अपने यहां के प्रदूषण को कम करने और कई दूसरे कारणों से अमेरिका ने अपना विनिर्माण उद्योग अन्य देशों तथा चीन की ओर खिसका दिया। उसके बाद अमेरिका निर्माता की जगह आयातक देश हो गया। इससे व्यापारिक घाटा हुआ।

I. लेकिन अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और व्यापारिक तंत्र के बल पर अमेरिका अपना वर्चस्व बनाए रहा और जर्मनी, जापान और बाद में चीन की बचत-पूंजी अमेरिकी बाजार में पहुंच कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को टिकाए रही। अमेरिकी विश्लेषकों का मानना है कि इस वित्तीय जोड़-तोड़ से छोटी अवधि में तो अपना वर्चस्व बनाए रखा जा सकता है, लंबी अवधि में नहीं। अब तक वर्चस्व बनाए रखने के लिए अमेरिका पहले उद्योग से व्यापार पर आश्रित हुआ, फिर व्यापार से वित्त पर आश्रित हो गया। आधी शताब्दी पहले तक वह संसार का सबसे बड़ा निर्माता देश था, आज वह सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। इस परिवर्तन से अमेरिकियों की तकनीकी कुशलता में क्षति हुई है, जो उत्पादन तंत्र के नित नवीनीकरण के लिए आवश्यक होती है। क्योंकि उसी के सहारे आप लंबे समय तक बाजार में टिक सकते हैं।

J. Army.यह ढोल की पोल केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विशेषता नहीं है। अमेरिकी सामरिक शक्ति में भी ऐसी ही ढोल की पोल है। अब तक अमेरिकियों ने अपने शौर्य के बल पर कोई युद्ध नहीं जीता, अपने संहारक हथियारों के बदल पर विरोधियों को झुकने के लिए विवश किया है। हिरोशिमा और नागासाकी पर आणविक हथियारों का दुरुपयोग एक ऐसा कलंक है जो उसके माथे पर हमेशा बना रहेगा। वे न विएतनामियों का मनोबल डिगा पाए, न अफगानिस्तान से विजय होकर निकले। इराक में सद्दाम हुसैन के शासन को उन्होंने अपने उन्नत हथियारों के बल पर ध्वस्त कर दिया, पर अब उनसे आइएसआइएस से उलझते नहीं बन रहा। अमेरिकी सेना सीधी लंबी लड़ाई नहीं लड़ सकती। लंबी अवधि में हथियार नहीं, शौर्य ही काम आता है। अमेरिका औरों से नहीं, अपने नागरिकों से भी इतना आशंकित रहता है कि उसने अपने आप को एक पुलिस स्टेट में बदल दिया है।
24.
नोवार्टिस , पेटेंट कानून और जनस्वास्थ्य - नॉवरेतिस बनाम भारत सरकार, Nexawar vs. NATCO PHARMA

स्विटजरलैंड की एक दवा कंपनी नॉवरेतिस और भारत सरकार के बीच सुप्रीम कोर्ट में आजकल एक मुकदमा चल रहा है। ए पेटेंट प्रदान नहीं कर रही। इसके चलते यह कंपनी अपनी बनाई हुई दवा पर एकाधिकार नहीं रख सकती। कंपनी का कहना है कि यह विषय उसके लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके द्वारा दवा के शोध और विकास पर किया गया खर्च वसूल नहीं हो सकेगा। नॉवरेतिस कंपनी ने पहली बार वर्ष २००६ में भारत सरकार के खिलाफ अपनी इस दवा जिसका नाम उसने 'इमैटिनिब' रखा है, को पेटेंट देने से मना कर दिया था। भारत सरकार का यह कहना था कि इस दवा को बनाने में कंपनी ने कोई नया तत्व इजाद नहीं किया और पहले से बनी दवा में मात्र कुछ परिवर्तन किए हैं। भारत के पेटेंट कानून के प्रावधान ३-डी के अनुसार पुरानी दवा में मात्र कुछ हल्के बदलाव करके कोई कंपनी नया पेटेंट प्राप्त नहीं कर सकती। इसलिए भारत सरकार ने इस दवा के लिए पेटेंट प्रदान न करके कोई गलती नहीं की है। मद्रास हाई कोर्ट ने इस मुकदमें में यह फैसला दिया कि कंपनी को इस दवा पर पेटेंट नहीं देना सही है।

B. देश की आजादी के बाद सभी संबंद्ध पक्षों से विचार विमर्श और देशव्यापी चर्चाओं के आधार पर एक पेटेंट कानून बनाया गया, जो था भारतीय पेटेंट अधिनियम, १९७०। गौरतलब है कि इस पेटेंट कानून के आधार पर देश में दवा उद्योग का विकास बहुत तेजी से हुआ। अनिवार्य लाइसेंसिंग और प्रोसेस पेटेंट व्यवस्था और पेटेंट की लघु अवधि, इस पेटेंट कानून की कुछ खास बातें थी। देश में दवा उद्योग का इस कदर विकास हुआ कि भारत दवाओं के क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर देश बन गया। भारत इस बात पर गर्व करता है कि भारत में एलोपैथिक दवाईयां दुनिया में सबसे सस्ती है। भारत का दवा उद्योग केवल देद्गा के लोगों के लिए ही दवा उपलब्ध नहीं कराता बल्कि दुनिया के अधिकतम विकासद्गाील देद्गा भी अपनी दवा की आवद्गयकताओं के लिए भारत पर निर्भर करते है।
भारत दुनिया का मूल्य की दृष्टि से चौथा और मात्रा की दृष्टि से तीसरा सबसे बड़ा दवा उत्पादक देद्गा है। आज भारत २०० से अधिक देद्गाों को दवा निर्यात करता है और वैद्गिवक स्तर की सस्ती जैनरिक दवायें दुनिया को भेजता है।

भारत द्वारा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) के समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बाद, उसकी शर्तों के अनुसार देश के पेटेंट कानून में १ जनवरी २००५ से संशोधन किये गये। उसके बाद देश का पेटेंट कानून काफी हद तक बदल गया। प्रक्रिया (प्रोसेस) पेटेंट के बजाय अब उत्पाद (प्रोडक्ट) पेटेंट व्यवस्था लागू कर दी गई, सरकार द्वारा अनिवार्य लाइसेंस दिये जाने के अधिकार पर अंकुश लगा दिया गया और पेटेंट की अवधि को बढ ा दिया गया।
*देश के जन स्वास्थ्य पर संभावित खतरों के मद्देनजर, सरकार द्वारा पेटेंट व्यवस्था को बदलने के विरोध में जन आन्दोलनों और विशेषज्ञों के भारी विरोध के कारण पेटेंट कानून में किये जा रहे कई संशोधनों को सरकार को वापिस लेना पड ा। सदाबहार (एवरग्रीन) नहीं कर सकती।

नॉवरेतिस बनाम भारत सरकार मुकदमे के मायने

भारत में कई अन्य कंपनियां 'ग्लीवैंक' नामक इस दवा को बनाती हैं। यह दवा बल्ड कैंसर के मरीजों के लिए अत्यधिक कारगर दवा है। ऐसा माना जाता है कि देश में हर वर्ष बल्ड कैंसर के २० हजार नये मरीज बनते हैं। नॉवरेतिस कंपनी अपनी बनाई गई इस दवा के लिए लगभग १ लाख २० हजार रूपये प्रतिमाह वसूलती है। जबकि यही दवा भारतीय कंपनियों द्वारा मात्र १० हजार रूपये प्रतिमाह की कीमत पर बेची जाती है। यदि इस दवा के उत्पादन पर किसी एक कंपनी का एकाधिकार हो जायेगा तो गरीब मरीजों द्वारा दवा नहीं खरीद सकने के कारण उन्हें मौत की नींद सोना पड़ सकता है।


A. MSF.यही कारण है कि आजकल नॉवरेतीस के इस मुकदमें के खिलाफ दुनिया भर में एक मुहिम छिड ी हुई है और स्थान-स्थान पर कैपचर नॉवरेतीस के नाम पर चल रहे इस आंदोलन के तहत नॉवरेतीस के कार्यालयों पर प्रदर्शनकारी अपना कब्जा जमा रहे हैं। दुनिया भर के जन स्वास्थ्य की रक्षा हेतु बने संगठन इस मुकदमें के मद्देनजर भारत सरकार पर नॉवरेतीस के सामने न झुकने के लिए दबाव बना रहे हैं
b. BROWN FIELD INVESTMENT, ।पिछले एक दद्गाक में लगभग ९ अरब डॉलर का विदेद्गाी निवेद्गा दवा उद्योग में प्राप्त हुआ, जिसमें से ४.७३ अरब डॉलर स्थापित दवा कंपनियों को अधिग्रहित करने के लिए आये। इसको व्यवसायिक भाषा में ब्राउन फील्ड निवेद्गा कहा जाता है। वर्तमान नियमों के अनुसार दवा उद्योग में नये निवेद्गा और स्थापित भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण दोनों में १०० प्रतिद्गात निवेद्गा बिना किसी अनुमति के बेरोकटोक आने का प्रावधान है। इस बात का लाभ उठाते हुए बड ी विदेद्गाी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां भारतीय कंपनियों की सस्ते दामों पर दवा बनाने की क्षमता से लालायित होकर इन कंपनियों को ही खरीदती जा रही हैं। १९९८-९९ में जहां दस बड ी दवा कंपनियों में से एक (ग्लैक्सो स्मिथ क्लाइन) विदेद्गाी थी, आज उनकी संखया बढ कर तीन हो गई है (रैनबैक्सी, ग्लैक्सो और पीरामल)। ऐसे में देद्गा का दवा उद्योग संकट में पड ता देख स्वास्थ्य मंत्रालय ने सरकार से गुहार लगायी कि इस प्रकार के अधिग्रहणों पर रोक लगाई जाए। स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि यदि इसे नहीं रोका गया तो बड ी कंपनियां एकाधिकार स्थापित करते हुए कार्टेल बना लेंगी और इससे सरकार की सस्ती दवाईयां उपलब्ध कराने के प्रयास को भारी धक्का लगेगा।

जिस भारतीय पटेंट एक्ट के सेक्शन तीन (डी) को हटवाने का कुत्सित प्रयास ये कंपनिया कर रही हे, उसके कारण केवल एक दवाई ही नहीं बल्कि और भी हजारों दवायों की पहुँच गरीबो से दूर हो जायेगी. अभी नेक्सावार नामक दवाई की कीमत तो विदेशी कंपनिया तीन हज़ार तीन सो गुना जियादा ले रही हे और भारत के एक साहसी और इमानदार पटेंट ऑफिसर श्री कुरियन ने इसके खिलाफ भी भारतीय कंपनी को सस्ती दवा बनाने का कम्पलसरी लायसेंस दिया हे. उसके खिलाफ भी जर्मन की बायर कंपनी कोर्ट में जा सकती हे. Nexawar case March 8, 2013 The Intellectual Property Appellate Board order upholding the compulsory licence granted to Natco Pharma to produce a generic version of Nexavar, or Sorafenib, a cancer drug patented by Bayer Corporation, is a strong endorsement of lawful action taken in public interest. Access to essential medicines is fundamental to the human right to live.
The phenomenon is graphically illustrated by the Nexavar case: the patented and generic equivalent are priced at Rs. 2.8 lakh and Rs. 8,800 respectively for one month's dosage, a staggering differential. Although the licence given in the Natco case resulted in voluntary price cuts on other cancer drugs by some companies, several key branded drugs remain unaffordable in India
**Natco Pharma vs. Bayer Corpn. German, Nexawar/Sorafenib, cancermdrug, March 8, 2013, 2.88-8800 One month dosage', Shri Curien, The intellectual Property Appalet Board, compulsory licence

25. INSURANCE: पर हम बीमा क्षेत्र में अभी तक के विदेशी निवश के अनुभव को देखें तो सरकार का तर्क सही नहीं दिखाई देता। क्लेम निपटारादेश में दो प्रकार की कंपनियां जीवन बीमा के क्षेत्र में काम करती हैं। एक है सरकारी क्षेत्र में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) और दूसरा निजी कंपनियां। इनमें एक निजी कंपनी को छोड़कर शेष 22 कंपनियों में 26 प्रतिशत की विदेशी भागीदारी है।
A. हम देखते हैं कि 2012-13 में निजी कंपनियों ने जीवन बीमा के 7.85 प्रतिशत क्लेम निरस्त कर दिए, जबकि एलआईसी ने मात्र 1.2 प्रतिशत क्लेम ही निरस्त किए थे। यही कारण है कि सामान्यतया जनता निजी कंपनियों को पसंद नहीं करती।
B. 2012-13 तक 23 निजी जीवन बीमा कंपनियों ने कुल 74.05 लाख (16.76 प्रतिशत) पॉलिसियां ही जारी की थीं, जबकि एलआईसी ने 367.8 लाख पॉलिसियां (83.24 प्रतिशत) जारी की थीं। यानी अपने अस्तित्व में आने के 13 साल के बाद भी विदेशी भागीदारी वाली कंपनियां देश की जनता में विश्वास पैदा नहीं कर पाई हैं।
C. जब्ती अनुपात'इरडाÓ की वार्षिक रिपोर्ट 2012-13 के अनुसार उस वर्ष निजी कंपनियों के व्यवसाय में 7 प्रतिशत की गिरावट आई पर उनके द्वारा पूर्व में जारी 35.3 लाख पालिसियों की राशि या तो उन्होंने जब्त कर ली या वे पालिसियां कालबाहृी (लैप्स) हो गईं। इन पालिसियों की बीमित राशि 82,061 करोड़ रुपये थी। एक बड़ी निजी बीमा कंपनी में तो यह जब्ती और लैप्स अनुपात 61.3 प्रतिशत था। उधर सरकारी क्षेत्र की एलआईसी में यह जब्ती और लैप्स अनुपात मात्र 5.6 प्रतिशत ही था।
D.अमीरों पर रहता है ध्यानविदेशी निवेश से विस्तार का तर्क वहीं ध्वस्त हो जाता है, जब हम देखते हैं कि एलआईसी के 44 प्रतिशत कार्यालय ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में हैं, जबकि निजी कंपनियों के मात्र 28 प्रतिशत कार्यालय ही वहां हैं। सरकार का यह तर्क कि बीमा में विदेशी निवेश बढ़ाने से गरीबों तक बीमा का लाभ पहुंचेगा, सही नहीं है।
निजी कंपनियां अमीरों पर ही ज्यादा ध्यान केन्द्रित करती हैं। यह इस बात से पता चलता है कि 2012-e. 13 में निजी कंपनियों द्वारा जारी पालिसियों पर औसत प्रथम वर्ष प्रीमियम 41,525 रुपए था जबकि एलआईसी का यह प्रीमियम मात्र 20,830 रु. था।
F. बीमा का बढ़ता बोझजबसे विदेशी निवेश वाली कंपनियां देश में आई हैं, स्वास्थ्य बीमा के प्रीमियम का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। 4 सदस्यों के परिवार की 3 लाख रुपए की मेडिक्लेम पालिसी की लागत जो पहले करीब 4000 रुपए सालाना थी, अब इन कंपनियों की मनमानी के कारण 11000 रु. सालाना हो गई है। बीमा कंपनियों का कहना है कि ऐसा क्लेम का अनुपात बढऩे के कारण हो रहा है। उधर, सभी वाहन रखने वालों को वाहन का थर्ड पार्टी बीमा कराना पड़ता है।
जब निजी कंपनियां बीमा में नहीं थीं, तब कार का थर्ड पार्टी बीमा मात्र 160 रु. में होता था। अभी वह बीमा उससे 10 गुना ज्यादा में होता है। लगभग सभी प्रकार के बीमा में प्रीमियम बढ़ता ही जा रहा है।
सरकार का यह कहना कि बीमा क्षेत्र में निवेश न होने के कारण विकास नहीं हो पा रहा है, यह सही नहीं है। एलआईसी न केवल अच्छा लाभ कमा रही है बल्कि हाल ही में उसने 1635 करोड़ रु. का डिविडेंड चैक भी वित्तमंत्री को सौंपा था। चिंता का विषय यह है कि जिन कंपनियों को आने का न्यौता दिया जा रहा है वे स्वयं दिवालियेपन की कगार पर हैं।
दुनिया की सबसे बड़ी अमरीकी बीमा कंपनी एआईजी 2008 में लगभग दिवालिया घोषित हो गई थी, तब अमरीका सरकार द्वारा 182 अरब डॉलर की सहायता पैकेज से उसे बचाया गया था।

26. Example of telecom industry. How we lagged behind...हमको लगता है कि आज टेलीकाॅम में हमने बहुत प्रगति की है। सब की जेब में एक सेलफोन वह भी स्मार्ट फोन है। लेकिन, उसमें जो प्रौद्योगिकी है, उसमें हम कहीं नहीं। दूरसंचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हम पूरी तरह बाहरी देशों पर अवलम्बित हो गये है। हमारा वैल्यू एडिशन क्या है? फस्र्ट जनरेशन आॅफ टैलीकाॅम टेक्नाॅलोजी में हम किसी से पीछे नहीं थे। हमारे सी.डाॅट के विकसित टेलीफोन के इलेक्ट्रोनिक एक्सचेंज बहुत उत्तम थे। वे 80,000 लाइनों वाले एक्सचेंज मोटोरोला, अमेरिकन कम्पनी और सीमेन्स (जर्मन कम्पनी) की तुलना में कुछ माइने में इनसे भी बेहतर टेलीफोन एक्सचेंज विकसित कर लिए थे। तब फिक्स्ड लाइन के समय राजीव गाँधी और सेैम पित्रोदा दोनों ही यह नहीं सोच पाये कि दुनिया में सेकेण्ड जनरेशन टेलीकाॅम टेक्नालाॅजी अर्थात् मोबाइल टेलीफोनी पर रिसर्च हो रही है अगर हमने उस समय उस पैसे का कुछ हिस्सा सेकेण्ड जनरेशन (2 जी) टेक्नालाॅजी पर खर्च किया होता तो मोबाईल टेलीफाॅनी में भी हम फस्र्ट जनरेशन टंेलीकाॅम टेक्नोलाॅजी की तरह ही दुनिया में विश्व स्तरीय प्रौद्योगिकी विकसित कर सकते थे। लेकिन, उस दिशा में हमने तब काम ही नहीं प्रारम्भ किया। चीन ने बाद में बहुत कोशिश की कि, वह थर्ड जनरेशन (3 जी) टेलीकाॅम टेक्नालाॅजी के विकास में यूरो-अमेरिकी कम्पनियों को पीछे छोड़ दे मगर वह कर नहीं पाया। उसने पैसा पानी की तरह बहाया। लेकिन, फिर उसने और भी ज्यादा राशि चैथी पीढ़ी अर्थात् फोर्थ जनरेशन (4 जी) पर अनुसंधान (आर एण्ड डी) पर खर्च किया और इसलिये फोर्थ जनरेशन टेलीकोम टैक्नोलाॅजी उसने यूरो-अमेरिकी देशों की कम्पनियों से भी जल्दी विकसित कर ली। आज हम तो सेकेण्ड जनरेशन टेलीकोम टैक्नोलाॅजी, थर्ड जनरेशन टेलीकोम टैक्नोलाॅजी और फोर्थ जनरेशन टेलीकोम टैक्नोलाॅजी, सभी में पूरी तरह से चीन पर अवलम्बित हैं। akash II tablet story.
27. Same disaapointing story in electronic industry.
अब दूसरी और यदि बात करें इलेक्ट्रानिक उत्पादों की तो आज इलेक्ट्रानिक उत्पादों (प्रोडक्ट) में भी यही स्थिति हो गई है। पेट्रोलियम के बाद दूसरा सर्वाधिक आयात का मद है इलेक्ट्रानिक उत्पाद। ऐसा भी अनुमान है कि 2017 के आते-आते हमारा पेट्रोलियम का इम्पोर्ट भी इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के आयातों से पीछे रह जायेगा और इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट में हमारे इम्पोर्ट और ज्यादा बढ़ जायेंगे। इलेक्ट्रॉनिक में हम आज कुछ ज्यादा उत्पादन करने की स्थिति में नहीं है और इसलिए आज जितने इंजीनियरिंग कालेज है, वहाँ विद्यार्थी भी इलेक्ट्रानिक्स लेने में हिचकते हैं वे देखते हैं कि इसमें हमारा भविष्य नहीं है क्योंकि देश में मेन्यूफैक्चरिंग नहीं है तो कम्पनियाँ हायरिंग अर्थात् नौकरी देने के लिए नहीं जाती, हायरिंग के लिए नहीं जाती, तो विद्यार्थी देखते हैं कि इलेक्ट्रानिक्स लेकर क्या करेंगे, आगे कैरियर नहीं है और इसलिये जब हमारे पास इलेक्ट्रानिक के फील्ड में प्रतिभा नहीं होगी, तो क्या हम आने वाले पाँच या दस वर्षों में भी इलेक्ट्रानिक उत्पादों के उत्पादन के फील्ड में अपना कोई स्थान बना पायेंगे? पावर प्लांटस के डेवलपमेन्ट में हमारी काफी कुछ ठीक स्थिति थी। विदेशों में भी कई जगह हम अपने पावरप्लांट सप्लाई भी करते थे। आज स्थिति इसमें भी यह है कि जो दो तरीके के पावरप्लांट हैं- एक सुपर क्रिटिकल टेक्नोलॉजी आधारित पावरप्लांट, जहाँ पावर जनरेशन की लागत आधी आती है, कोयला कम जलता है प्रदूषण कम फैलता है। दूसरा प्रकार है सब-क्रिटिकल पावर प्लांट, जिसमें कोयला ज्यादा जलता है, प्रदूषण ज्यादा फैलता है, और जनरेशन लागत ज्यादा आती है। आज एक भी सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट का आर्डर भेल, या एल.एण्ड.टी. जैसी हिन्दुस्तानी कम्पनियों के पास नहीं है, जो अभी उनके पास 24000 मेगा वाट के पावर प्लांट बनाने के काम मिल हुये हंै, वे सारे के सारे पुराने पड़ चुके है। सब-क्रिटिकल पाॅवर प्लाण्ट््स है। देश के सोर के सारे आधुनिक व सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट्स के आर्डर केवल और केवल चाइनीज कम्पनियों के पास हैं और भारतीय कम्पनियों की तुलना में अधिकतम 36000 मेगावाट के पावर प्लांट्स के आर्डर चाइनीज कम्पनियों के पास हैं। आज जब हमारी पावरप्लांट बनाने वाली कम्पनियों के पास में एक भी आर्डर सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट के लिए नहीं है तो आने वाले 20 वर्षों के लिए हम सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट के क्षेत्र में भी चीन पर अवलम्बित हो जायेंगे। अब सवाल यह उठता है कि अगर हमारे पावर प्लांट हम देश में नहीं बना रहे हैं तो देश में संबंधित सहायक उद्योग व कम्पानेण्ट सेक्टर, उसमें विकसित होने वाले रोजगार और उनके धन के बहुत हस्तान्तरण से होने वाली उसकी दस गुनी आय के लाभ से भी हम वंचित रह जायेंगे। एक पावर प्लांट बनता है भेल एन.एल.टी. या किसी कम्पनी में तो उसकी जो कम्पोनेन्ट सेक्टर की कम्पनियाँ है, जिनको हम सहायक उद्योग कहते हैं उनको बड़ी मात्रा में काम मिलता है। इससे एक से दो हजार तक सहायक उद्योगों को काम मिलता है। एक पावर प्लांट देश में बनता है तो उससे अनेक बनता है, तो उसके में उनको एनामल्ड वायर चाहिए, तो वायर एनामलिंग की 200 कम्पनियाँ खड़ी होती है, वायर एनामलिंग वाला अगर कॉपर वायर खरीदेगा, तो वायर ड्राइंग मशीन वाली 200 कम्पनियां खड़ी होती है, इस तरह 1000-1200 सहायक उद्योगों का कम्पोनेन्ट सेक्टर खड़ा होता है। उसके कारण खास करके इस प्रकार के मल्टीप्लायर इम्पैक्ट से देश में ही पावर प्लाॅण्ट निर्माण होने पर कम्पोनेन्ट सेक्टर में 1000-1200 सहायक उद्योग चलते हैं, 7-8 गुणा रोजगार सृजित होता है और 8-10 गुना कारोबार विस्तार होता है। इसे समझाने के लिये मैं बिल्कुल एक गाँव का उदाहरण लेता हूँ कम्पोनेन्ट सेक्टर में गुणन प्रभाव से रोजगार व कारोबार विस्तार इसी से समझ आ जायेगा यथा,
28. Marvellous story of the multiplier impact..यदि गाँव के किसी व्यक्ति ने 200 रुपये का जूता वहाँ के मोची से खरीदा तो 100-100 रुपये के दो नोट उस मोची की जेब में चले गये, उस मोची ने गाँव के लोहार से जूता बनाने का औजार 200 रूपये का खरीदा तो वे ही 100-100 रुपये के दो ही नोट उस लोहार के पास चले जाते है। लोहार अगर दर्जी से 200 रुपये से कपड़े सिलवाता है तो वे ही 100-100 के दो नोट उसके पास चले जाते हैं और दर्जी अगर किसान से 200 रूपये के उत्पाद खरीदता है तो वे 100-100 रूपये के दो नोट उसके पास चले जाते हैं। ऐसे यदि तहसील, तालुका या गाँव में वह 100-100 रुपये के केवल दो नोट वहाँ पचास लोगों के बीच में घूम जाते हैं तो 10,000 रुपये की आय सृजित होती है और वही अगर हमने बाटा का जूता पहन लिया तो बाटा इण्डिया लिमिटेड, इंग्लैण्ड की कम्पनी है। और वे 200 रुपये अगर इंग्लैण्ड चले गये तो एक प्रकार से वह मल्टीप्लायर इम्पैक्ट से 200 रुपये से उस तहसील में 10,000 रुपये की आय और 50 लोगों को योगक्षम मिल सकता था वह 200 रूपये की राशि बाहर चली जाती है। ठीक इसी प्रकार अगर पावर प्लांट चीनी कम्पनियाँ सप्लाई करती है तो यह जो कम्पोनेन्ट सेक्टर का विकास होता, वह चीन में होगा। यदि रूपये 1000 करोड़ के पावरप्लांट के आर्डर किसी भारतीय उत्पादक के पास है और वह कम्पोनेन्ट की सोर्सिंग अगर अपने देश से करता हैं तो मेड बाई इण्डिया के गुणन (multiplier) प्रभाव से कम से कम 20 हजार करोड़ रूपये व अधिकतम 50 हजार करोड़ रुपये का डाउन दि लाइन रोजगार व कारोबार विस्तार होता है, फ्लो आॅफ फण्ड नीचे तक जाता हैं और पावर प्लांट बाहर से आ जाते है, यदि चीनी व विदेशी कम्पनियों को ‘मेक इन इण्डिया’ का निमंत्रण देकर विदेशी निवेश बुलाया जाता है तो वे सारा साज सामान बाहर से लाकर, यहाँ पर केवल पाॅवर प्लांट या अन्य वस्तुओं को एसेम्बल मात्र करेंगे। पिछले 23 वर्षों में यही हुआ है। हमारे पहले से चले आ रहे उत्पादक उद्योग भी बदल गए है। विदेशी कम्पनियां अपने वैश्विक श्रम विभाजन के सिद्धान्त पर बाहर से हिस्से पुर्जे ला कर यहाँ पर केवल उन्हें जोड़ने या एसेम्बल करने का ही काम करती हैं। इससे टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट भी वहाँ पर ही होता है और हम एक प्रकार से पूरी तरह से उन पर अवलम्बित हो जाते हैं। आज इसलिए विदेशी निवेश सवर्द्धन के कारण हम केवल असेम्बली लाइन्स के देश रह गए हैं। एसेम्बली लाइन्स के देश किस प्रकार से रह गए हैं।
29.. Lessons from refrigerator. How we lost on this turf..मैं थोड़ा स्पष्ट कर दूँ। सारे रेफ्रीजरेटर 1995-96 तक हम लोग बनाते थे, केलविनेटर सबसे ज्यादा बिकता था। व्हर्लपूल अमेरिका से आयी उसने केलविनेटर आफ इण्डिया लिमिटेड खरीद ली और नाम कर लिया व्हर्लपूल, तो ए.बी. इलेक्ट्रानिक्स स्वीडन से आयी उसने व्हर्लपूल से केलविनेटर नाम खरीद लिया, बिरला से उसने ऑलविन खरीद ली उसने महाराजा इन्टरनेशनल भी खरीद ली। और इस तरह अपने देश के रेफ्रीजरेटर के उद्योग के दो तिहाई पर विदेशी नियंत्रण हो गया जिससे रेफ्रिजरेटर बनता था उसके कच्चे माल से रेफ्रीजरेटर तक सारी चीजे देश में बनती थीं। अब जब व्हर्लपूल आ गई तो उसने कहा कि वी वुल्ड बी सोर्सिंग ए बेटर कम्प्रेशर प्रहृाम अवर ओन सब्सीडियटी इन यूनाइटेड स्टेटस और उन्होंने मिनी कम्प्रेशर जिसमंे कि रेफ्रीजरेटर बनाने में जो मेन टेक्नोलॉजी लगती है वो तो मिनी कम्प्रेशर अमेरिका में लाना शुरू कर दिया बाकी तो अलमारी का एक ढाँचा है। व्हर्लपूल ने जब रेफ्रीजरेटर का मिनी कम्प्रेशर अमेरिका से लाना शुरू किया। तो एक पुर्तगाल की कम्पनी टैकामेश आयी और उसने व्हर्लपूल को प्रस्ताव दिया कि तुम ये मिनी कम्प्रेशर नहीं बनाते हो, यह मिनी कम्प्रेशर प्लांट तुम मुझे बेच दो, तब वह उसने उन्हें बेच दिया। फिर श्रीराम इंस्ट्रीयल इंजीनियरिंग लिमिटेड जो देश की दूसरी मिनी कम्प्रेशर बनाने वाली कम्पनी थी उसका भी मिनी कम्प्रेसर बनाने वाला संयंत्र उसने खरीद लिया। इससे इण्डिया की मिनी कम्प्रेशर बनाने की मोनोपोली या एकाधिकार टैकोमेश उस पुर्तगाली कम्पनी के पास चली गई। तब उसने ने भी मिनी कम्प्रसेर के हिस्से बाहर से लाकर यहांँ असम्बेल करना आरंभ कर दिया। देश मिनी कम्प्रसेर के उत्पादक से ऐसेम्बल कर्ता रह गया। देश में मिनी कम्प्रसेर एसेम्बल करने के लिये वह सिलिण्डर कहीं से लाती है। पिस्टर्न कहीं एक देश से लाती है, वाल्व कहंी और से लाती है आज जैसे बी.एम.डब्लू. कार है पूरी दुनिया में जितनी बी.एम.डब्लू. कारें बनती है, उसके हार्न हिन्दुस्तान में बनते हैं और बाकी सारे पार्ट बाहर से आकर असेम्बल होते हैं।
30. Story of Tata soap and socialism... स्वाधीनता के समय भी हम इतने परावलम्बित नहीं थे। साबुन से लेकर स्पात (steel) तक सभी क्षेत्रों में हम प्रौद्योगिकी सम्पन्न थे। स्टील उद्योग मे टाटा स्टील या टिस्को कम्पनी भी थी, गोदरेज सोप या टाटा आइल मिल्स भी थी, जो साबुन बनाती थी और टिस्को जैसे स्टील उत्पादक भी देश में थे। तब हमारे नेताओं और सरकार ने कहा समाजवाद लायेंगे और समाजवाद के नाम पर चालीस के करीब इंडस्ट्रीज हमने पब्लिक सेक्टर के लिए रिजर्व कर दी। अइरन और स्टील बिरला के एक लाइसेन्स के लिये की दो पीढ़ी निकल गई हमने कहा प्राइवेट सेक्टर पर नया लाइसेंस नहीं देंगे। पहले यह स्थापित इनसिस्टेंट स्टील मैन्यूफेक्चरर को भी कैपासिटी एक्सपान्शन की परमिशन नहीं देंगे। कच्चा लोहा अर्थात् iron ore देश में बहुत थी। हम कच्चा लोहा iron ore निर्यात करते और और लोहा व स्पात आयात कराते। उदाहरणार्थ हम जापान की निप्पाॅन कम्पनी को कच्चा खनिज निर्यात करते, वह वहां पर जापान में उससे लोहा व स्पात बना कर हमें बेचती, उससे रोजगार जापान में मिलता, उत्पाद शुल्क का राजस्व जापान की सरकार को मिलता और प्रौद्योगिकी इनकी विकसित होती। वर्ष 1947 से 1981 तक 30,000 करोड़ रुपये का लोहा व स्पात इम्पोर्ट करना पड़ा। तब तक देश पर विदेशी कर्ज केवल 18,000 करोड़ रुपये का ही था। अगर हमने आइरन व स्टील की देश में उत्पादन की छूट दी होती तो हमारे पास 12,000 करोड़ रुपये का उस समय फॉरन एक्सचेंज सरप्लस होता। हम कर्जदार होने के बजाय देश में टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट करते। समाजवाद के नाम पर देश में उद्यम स्थापना को बाधित करने में नेहरू - इन्दिरा गाँधी युग में सभी प्रयत्न कियेगये थे। इसलिये 1948 व 1956 के औद्योगिक नीति प्रस्तावों में 40 के लगभग उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र के लिये आरक्षित करने के अतिरिक्त दूसरा हमने शेष वर्गों में भी इण्डस्ट्रीज (डेवलपमेण्ट एण्ड रेगुलेशन्स) एक्ट 1951 के अधीन उद्योग लगाने के लिये औद्योगिक लाइसेन्स अनिवार्य कर दिया। इसलिये तब कोई भी उद्योग लगाने के लिए लाइसेन्स जरूरी होता था। और सरकार लाइसेंस बहुत कम देती थी और देती भी थी तो बहुत कम क्षमता के देती थी, उससे ज्यादा कोई उत्पादन कर लेता तो पेनालिटी लगती थी। इसलिये देश में शक्कर, सीमेन्ट, स्कूटर, कार ट्रेक्टर, स्पात से लेकर हर चीज थी। 10-10 साल की अग्रिम बुकिंग करानी पड़ती थी, पर सरकार समाजवादी नीतियों के नाम पर नये लाइसेंस नहीं देती थी। स्वाधीनता के 40 वर्षों तक देश के उद्योगों को घरेलू माँग, जतने उत्पादन की भी छूट नहीं थी। इसलिये वे निर्यात की तो साथ ही नहीं सकते थे। हाइएस्ट रेट आफ इनकम टैक्स 70 के दशक में 97.3 प्रतिशत थी। क्या आय पर 97.3 प्रतिशत टेक्स देना सम्भव हो सकता है? अब आदमी अगर अपनी इनकम को सही डिक्लेयर करता था, तो 97.3 प्रतिशत इनकम टैक्स में चला जाता और नहीं डिक्लेयर करता तो उसकी वह आय काला धन बन जाती है कैपिटल फॉरमेशन हमने नहीं होने दिया, केवल काले धन के सृजन का मार्ग तय किया। अस्सी के दशक तक मरने वाले की सम्पत्ति पर जो मृत्यु कर लगता था, उसकी आय से ज्यादा उसकी वसूली पर व्यय होता था। उस समय की ऐसे बहुत सी विसंगतियाँ थीं। मैं बहुत गहराई में अभी समय सीमा के कारण नहीं जाऊँगा। देश में 44 वर्षों तक उद्यमों को हमने विकसित नहीं होने दिया और 1991 में अचानक कह दिया कि अब देश के उद्यमों को विदेशी स्पर्धा के लिए तैयार हो जाना चाहिए। जिस दिन भारत में उद्योग स्थापना के अनिवार्य औद्योगिक लाइसेन्स वाले कानून इण्डस्ट्रीज डेवलपमेंट एण्ड रेगुलेशन्स एक्ट को समाप्त किया, जिस दिन हमने पब्लिक सेक्टर के लिए रिजरवेशन काफी कुछ कम किए, जिस दिन हमने एकाधिकार व प्रतिबन्धात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम को समाप्त कर देश के उद्यमियों को स्वतंत्र किया, उसी दि नही हमने अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक के दबाव में आयात व विदेशी निवेश संवर्द्धन प्रारम्भ कर दिया। अगर हमने चार पाँच साल के लिए इंटरनल लिब्रलाइजेशन करके और भारतीय उद्यमियों को अपनी स्पर्धा क्षमता ठीक करने का अवसर दिया होता तो जो हमारे उद्योग उद्यम बन्दी या विदेशी अधिग्रहण (टेकओवर) के शिकार हुए वो नहीं होते। अब चूँकि पहले हमने अपने देश में उद्योग लगने नहीं दिये, हर चीज का अभाव था। टाटा की दो पीढ़ी कार उत्पादन के लाइसेन्स के लिये व बिरला समूह की 2 पीढ़ी स्पात उत्पादन का लाइसेन्स मांगती रह गयी, हम आयात आश्रित रह गये उसके बाद 1991 में विदेशी निवेश खोलकर हमने व आयात खुले कर अचानक फॉरेन कम्पटीशन इनवाइट कर लिया। 1991 में हमने सभी जगह के आयात खुले कर दिये। फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेन्ट की संवर्धन की नीति अपना ली और उसके कारण देश का समग्र
देश में शीतल पेय से सीमेण्ट तक व जूते के पाॅलिश से लेकर टी.वी., फ्रिज तक अधिकांश उत्पादन विदेशी कम्पनियाँ बना रही है। वर्ष 1991 से जो विदेशी उत्पादकों को विदेशी निवेश के बदले जो विदेशी निवेशकों को ‘देश में उत्पादन’ (डंाम पद प्दकपं) के निमन्त्रण नीति चल रही है। उससे प्रश्न यह खड़ा होता है कि देश के उत्पादन के साधनों पर 5 वर्ष बाद किसका नियन्त्रण होगा। हम भारतीयों का या विदेशी निवेशकों का? हमारा 80-85 प्रतिशत जूते का पाॅलिश एक अमेरिकी कम्पनी हमारे ही देश में बना कर बेच रही है। सारे शीतल पेय दो अमरीकी कम्पनियाँ बना रही हैं। दो तिहाई स्कूटर विदेशी और दो तिहाई सीमेण्ट देश में विदेशी कम्पनियाँ ही बना रही है। वर्ष 1991 से विदेशी निवेश से ‘मेक इन इण्डिया’ की जो सुविधा विदेशियों को मिल रही है, वह उधार की कोख (surrogate Mothers) की सुविधा जैसा ही है। बाजार हमारा, श्रम शक्ति हमारी पर लाभ उनका, स्वामित्व उनका और नियन्त्रण उनका।


31. Cement industry went to the foreigners...इस तरह से पिछले दिनों एफ.डी.आई. को खोलने से देश के एक कर उद्योग विदेशी स्वामित्व में गये हैं। अब तक देश के वे ही उत्पाद भारतीय उद्यम बनाते थे, वे अब भारत में विदेशी उद्यम बना रहे हैं। सीमेण्ट का ही उदाहरण लें।
Step one: 1998 तक देश का सारा सीमेण्ट भारतीय उद्यम बनाते थे। आज देश का आधे से अधिक, लगभग दो तिहाई सीमेण्ट छः यूरोपीय कम्पनियों के नियन्त्रण में चला गया है, वे हमारे सीमेण्ट को ‘मेक इन इण्डिया’ कर रही है। सीमेण्ट उद्योग अधिग्रहण का एक रोचक उदाहरण है।
Step two: इसी उदाहरण से मुझे याद आ रहा है कि अमेरिका और कनाडा में 90 के दशक में खूब कन्स्ट्रक्शन होते थे। जैसे आजकल हमारे यहाँ हो रहे हैं। मल्टीप्लेक्स और बहुत मल्टीस्टोरी बिल्डिंग और हाइवेज, तो सीमेन्ट, वहाँ उत्तरी अमेरिका में एक उदीयमान उद्योग अर्थात् एक सनराइज इण्डस्ट्री बन गया यूरोप के बड़े सीमेन्ट के बड़े कारखाने अर्थात सीमेण्ट मेजरस, ने उत्तरी अमेरिका में अर्थात्् संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में सस्ती सीमेन्ट की डम्पिंग यूरोप से शुरू की। वहाँ की सीमेन्ट इण्डस्ट्री को टेकओवर करने के लिए और वहाँ पर जब सस्ती सीमेन्ट बिकने लगी, तब वहाँ के सीमेन्ट के कारखाने वालों ने हाथ खड़े करने शुरू कर दिये, वो कारखाने बिके, उन्हें बड़े यूरोपीय सीमेण्ट उत्पादकों ने अधिग्रहीत किया।
Step c: नब्बे के दशक में पूर्वी यूरोप में व मध्य 90 के दशक में लेटिन अमेरिका में और 1997 से दक्षिण पूर्वी एशिया में इन्हीं बडे यूरोपीय सीमेण्ट उत्पादकों ने सस्ती सीमेण्ट की डम्पिंग कर सीमेण्ट उत्पादन का अधिग्रहण किया। दक्षिण पूर्वी एशिया से इनहीं यूरोपीय सीमेण्ट उत्पादकों ने भारत में सस्ती सीमेण्ट की डम्पिंग शुरू की थी। यहाँ मेरी आयु के जो लोग है, उनको अच्छी तरह से याद होगा। कोरिया की सीमेन्ट उस समय में 98-99 या 2000-2001 में बहुत सस्ती, इस देश में बिकती थी, वो यूरोपीय कम्पनियों ने यहाँ की सीमेन्ट कम्पनियों को रुग्ण करने के लिए यह काम किया था।
Step D: सबसे पहले टाटा ने हाथ खड़े किये, टिस्को के सीमेन्ट प्लांट बिके, फ्रेंच कम्पनी लाफार्ज ने खरीदे। टाटा समूह दूसरी बार पुनः दबाव में आया।
ए.सी.सी. जो हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा सीमेन्ट ग्रुप था, देश की 20 प्रतिशत सीमेन्ट मैन्यूफेक्चरिंग पूरे देश में ए.सी.सी. के कारखानों के पास थी, वो बिकी, उसको हाॅलसिम में एक स्विस कम्पनी ने खरीद लिया। थोड़ा मजाक के नाते ये भी सुन लीजिये कि स्वीटजरलैण्ड कितना बड़ा है, हमारे अक्साई चिन से थोड़ा बड़ा है, जो जवाहर लाल नेहरू की लापरवाही से चीन ने हमसे छीन लिया था। कुल 38,000 वर्ग किलोमीटर का अक्साईचीन है, और 41,000 वर्ग किलोमीटर क्षैत्रफल का स्वीटजरलैण्ड का है।

उसके बाद में गुजरात अबूंजा बिकी, उसको भी होल्सिम ने खरीद लिया। अब होल्सिम और लाफार्ज दोनों यूरोपीय कम्पनियाँ मिल कर एक हो गई, फिर इसी तरीके से कई कारखाने हैडरबर्ग व इटालिसीमेन्टी जैसी अन्य छः यूरोपीय सीमेण्ट उत्पादकों ने देश भर में सीमेन्ट के कारखानों को अधिग्रहण किया।
जो सीमेण्ट भारतीय उद्यम बनाते थे, त बवह मेड बाई इण्डिया था अब वह मेड बाई इण्डिया विदेशी यूरोपीय कम्पनियाँ नाम मात्र के निवेश से हमारे यहाँ वे बना रही है। कई कारखाने बन्द भी हो गये और बड़े कारखाने विदेशियों द्वारा ले लिये गये। आज की तारीख में देश का लगभग दो तिहाई के, आस-पास सीमेण्ट देश में विदेशी कम्पनियाँ बना रही हैं। यह लगभग मेक इन इण्डिया ही होता जा रहा हैं। जो सन् 2000 के पहले शत प्रतिशत हिन्दुस्तानियों के पास था और अब नाम तो गुजरात अम्बूजा है। लेकिन होलसिम ने ले लिया, वो उसकी ब्रांड रायलटी स्विटजरलैण्ड भेजता है उसकी टेक्नोलॉजी भी इण्डिया में विकसित हुयी है और उसका ब्रांड भी भारत में विकसित हुआ है और उसकी रायल्टी व लाभ विदेश में जाते हैं,
चूने का पत्थर हमारा सीमेण्ट हमारी जन शक्ति बनाती है यानी कि उसमे मैंनेजिंग डायरेक्टर से लेकर श्रमिक तक जो सारे लोग काम करते हैं वे सब हिन्दुस्तानी हैं और सारी की सारी सीमेन्ट हम खरीदते है, लेकिन मुनाफा वहाँ जाता है, अब हमारा सीमेण्ट हालसिम, लाफार्ज आदि मेक इन इण्डिया कर लाभ यूरोप ले जा रहीं है।

32. GENERAL PERSUASION FOR MADE BY INDIA: अब नेस्ले की टॉफी हो या नेस्ले का पाउडर का दूध हो, दूध हिन्दुस्तानी गरीब किसान निकालता है, वो किसी कम्पनी को बेचता है और उसमें भी मैंनेजिंग डायरेक्टर से लेकर मजदूर तक सारे हिन्दुस्तानी लोग है और उसका अगर पाउडर का दूध या उसकी टाफी, चाकलेट या उसका जो भी बन जाता है आइसक्रीम, उसमें ब्रांड अगर नेसले लगता है, तो मुनाफा स्वीटजरलैण्ड जाता है। टेक्नोलाजी डेवलपमेंट वहाँ होती है और अगर ब्रांड अमूल, सागर, सरस, साँची या ऐसा लग जाता है तो उसका सारा मुनाफा टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट हिन्दुस्तान में होगा। इसलिये हमें चाहिये ‘मेड बाई इण्डिया’ और न कि विदेशी निवेश से विदेशी उद्यमों का मेक इन इण्डिया।
अब पिछले दिनों यह जो 1991 से ही जबसे हमने एफ.डी.आई. (फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेन्ट) के नाम से विदेशी उद्यमों का उत्पादन के लिये प्रोत्साहन देने की नीति शुरू की, उसके बाद से जूते के पॉलिश, टूथपेस्ट उसके आगे चलें तो टीवी, फ्रिज उसके आगे चलें तो स्कूटर, सबसे ज्यादा, आधे से ज्यादा होण्डा का एक्टिवा ही बिकता है। कारें भी दो तिहाई विदेशी उसके आगे चले, तो टेलिकाम व पावर प्लाण्ट निर्माण में भी बढ़ता विदेशी नियन्त्रण हो रहा है। अगर इस देश का सम्पूर्ण उत्पादन तंत्र पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनी का कब्जा हो जायेगा तो ‘मेक इन इण्डिया’ तो वो करेंगे, बना लेंगे हिन्दुस्तान में, लेकिन अगर देश के उत्पादन के साधनों पर विदेशी कम्पनियों का ही कब्जा हुआ तो, उसके मालिक आप और हम होंगे या विदेशी कम्पनियाँ? कल को चुनाव में कोई राजनीतिक दल चंदा लेने के लिए जायेगा तो वो हमारे देश के लोगों के पास नहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लोगों के पास यानि वो हमारे सूत्रधार बन जायेंगे। हमारे देश के उत्पादन तंत्र के साथ व्यापार, वाणिज्य व कृषि सहित सम्पूर्ण आर्पूित तंत्र भी विदेशी नियन्त्रण में जाने को है।
33. Oh, even our bread and butter in their hands: उदाहरण के लिए बाजार में नेचर फ्रेश नाम का आटा कारगिल नामक अमेरिकन कम्पनी का है, एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी है सीमित नियंत्रण वाली है, उसका 136 अरब डॉलर का साल का कारोबार है, भारत में 4 अरब डालर (रुपये 24,000 करोड़ रुपये) matlab Baba ramdevs ke saare vyapaar se 12 tuna ek company kamati have...का कारोबार है। ( baba ramdevs was 1100 crores in 2011 then 150-200 dedicated outlets to 4000 now.and now 2200 crs. in 2015, FMCG. fast moving consumer goods , and products are) अपना आटा बाजार में लाने के लिये उसने मध्य प्रदेश के किसानों की 6000 हेक्टयर जमीन ठेके पर ली, किसान जो जमीन का मालिक था वो बटाइदार ( Share Croppers)) हो गया। ये किसान खेती कारगिल के लिए करेगा और वो गेहूँ, या सोयाबीन व मक्का का बीज देती है और वो उसका गेहूँ आदि बोते हैं, फसल सारी कारगिल उठाती है उसकी आटा के पशु आहार के लिये बड़ी-बड़ी आटा मिलें हैं। इससे कई रोलर फ्लोर मिलें, मिल डाली, दो डाली, तीन चार और डाली तो उससे कई रोलर फ्लोर मिले, पंजाब और मध्य प्रदेश में बंद हुई। हिन्दुस्तान में लघु उद्योगों की श्रेणी में तीसरे स्थान पर सर्वाधिक लघु उद्योग आटा चक्कियाँ हैं लेकिन अब क्या होता है। चाहे वो आशीर्वाद आटा आ.टी.सी. का हो, या नेचर फ्रेश आटा कारगिल का हो, हम उन विज्ञापनों से उस आटे की तरफ जाते हैं, तो खेत खलियान से किचन तक की पूरी फ्रूड सप्लाई चेन कारगिल या आई.टी.सी. टेकओवर कर रही है यानी की ‘मेक इन इण्डिया’ तो है गेहूँ की खेती हम कर रहे हैं, आटा भी हम पीस रहे हैं, खा भी हम रहे हैं, लेकिन हमारा टोटल फूड सप्लाई चेन व पशु आहार से दूध व दूध के उत्पाद तक का खाद्य श्रृंखला विदेशी अधिग्रहीत कर रहे हैं। इसी तरह से टोमैटो की फार्मिंग भी हमारा किसान कर रहा है। हिन्दुस्तान लिवर जो एग्लो डच कम्पनी की है और ऐसा बहुत सारा, उसकी भी हम गहराई में नहीं जायेंगे।

34. The most appalling are the stories of ‘Development-refugees’—a phrase coined by Sainath to refer to those unfortunate tribals and dalits forcefully evicted to acquire land for some project or another. According to Sainath, since 1951, 21.6 million people have been displaced in the name of development ; if one adds to this number the 2.1 million people affected by mining, it amounts to the entire population of Australia and Canada.But Sumitra mahajan chaired parliament commitee says 6 crore 10 lakh acre acquired by govt, that 6 frites displaced, that 40% st, 20 % sc and 20 % obc people displaced so far. That only 8% of total projects stalled due to laar previous.,The most heart-rending instance of forceful eviction is the 400-500 families of Chikapar (Koraput, Orissa).
This entire village was first evicted in 1968 to make room for MiG Fighter Project; after they were resettled in another place (which also they named Chikapar), they were evicted again in 1987 to make room for a multi-purpose Hydel Project; and, in 1993, again, they were evicted from Chikapar-3 so that Military Engineering Service could be established there. ‘Arguably, no other village anywhere in the world has been evicted three times, in the name of development,’ comments Sainath ruefully. To add insult to injury, most of the promises of ‘resettlement’ are never fulfilled.