१. कुल संख्या रही १२० परन्तु कह नहीं सकते की कितने लोग उसमे से इस सूची में से आये जो की हम कह रहे है परिषद् की सूची है.
२. आम शिकायत रही कि लोगों को भागीदारी करने का ज्यादा अवसर नहीं मिला. जो कुछ थोडा मिला भी तो वो मेरे आधे घंटे या 45 मिनट्स में से था जो की सत्र था संगठनात्मक बातों का. दूसरी शिकायत रही कि प्रस्तावों का लिखित स्वरूप न तो चर्चा के पहले मिला और नो ठीक से बाद में ही. हर बार लम्बी भूमिका तो बाँधी जाती है लेकिन लोगो के बोलने का समय नहीं दिया जाता.
३. व्यवस्था पक्ष की सबने सराहना की. भोजन, स्थान का चयन, सेवा भावना आदि सभी बातें लोगों को अच्छी लग रही थी. अधिकारी व्यवस्था और आम कार्यकर्ता की व्यवस्था स्थली में थोड़ी दूरी थी, लेकिन अधिकाँश समय तो कार्यक्रम में इकट्ठे ही रहे, इस लिए कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई. सभी को भेंट में वस्त्र मिला और वो भी अच्छे ढंग का सूती वस्त्र, अतः लोगों ने ठीक ही मन.
४. कार्यक्रमों में उपस्थिति भी लगभग ठीक रही. घूमने फिरने का स्थान भी बहुत दूर नहीं था अतः जो लोग गए भी तो समय से लौट आये. महिलायों की संख्या भी 5-6 रही और एक, श्रीमती जगतसिंह को छोड़ कर कोई भी घूमने फिरने नहीं बल्कि भाग लेने ही आई थी.
५. दो प्रस्ताव पारित हुए. पहला था स्वस्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थो पर अंकुश, जो की मग्गी प्रकरण से सम्बंधित था. इसको श्री भगवती जी ने तेयार किया और पढ़ा. दूसरा था श्री अश्वनी जी द्वारा तेयार किया पून्जिखाते में रुपये की परिवर्तनीयता अवांछनीय, जो की थोडा कठिन विषय तो था लेकिन लम्बे समाये से स्वदेशी जागरण मंच इस पर विचार करता रहा है.
६. अन्य विषय : इसके अतिरिक्त कई विषयों पर चर्चा हुई यथा प्रो.कुमारस्वामी जी ने पर्यावरण के विषय को लेकर पिछले दिनों पर्यावरण पर बनी हाई लेवल समिति की रिपोर्ट चर्चा की. शायद इस विषय पर उन्होंने एक छोटा लेख भी तेयार किया है. श्री सुन्दरम जी ने वर्तमान आर्थिक परिद्रश्य पर अंग्रेजी में एक विषय लिखित में तेयार किया और बोला भी. श्री धनपत राम जी ने भी अपना आईपीआर का विषय रखा, सिर्फ १२ मिनट्स में मात्र और अच्छे ढंग से.
७. प्रांत अनुसार संख्या: अभी प्राप्त करनी है और लिखनी है और यदि संभव हुआ तो उनलोगों को एक एस एम् एस भेजना जो आये थे और बाकी को एक पात्र लिखना या sms करना जो नहीं ए थे. साथ ही एक अपेक्षा भी करना की आपने क्या क्या करना है. अपेक्षा है की एक विचार वलय चलाये और साथ साथ ही आगे के आन्दोलनों को चलाने के लिए भी तेयारी करें. पत्रिका, पत्रक, प्रचार, प्रदर्शन, एवं प्रवास/प्रवाह आदि विषयों की और भी ध्यान देना. एक विचार ये भी आया की कुछ विषयों का वृत्त हर बार लिया जाये, यथा कुल कितने जिले, और कार्ययुक्त जिले, कुल कार्ययुक्त स्थान या ग्रामीण और नगरिया इकाईयां. कई बार हम प्रांतीय, विभागीय, और जिले स्तर के कार्यकर्तायों की संख्या और उनकी सक्रियता की बात भी करते हैं. इसी प्रकार विचार वलय आदि का विषय भी बार बार पूछना चाहिए.
८. अन्य अनुवर्ती प्रयास: सूची जो की परिषद् की हे उसको ठीक करना है और साथ साथ ही अगली कार्यकारी मंडल की बैठक को भी व्यवस्थित सूची के आधार पर करना चाहिए और जो बाते हमने इसमें अधूरी पायी हैं उनको उसमे दूर करना चाहिए.
ashmiri Lal
12:35 AM (6 hours ago)
to me
Resolution - 1
स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य पदार्थों पर प्रभावी अंकुश की आवश्यकता
भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण द्वारा नेस्ले जैसी छः लाख करोड़ रूपये की वार्षिक कारोबार वाली विदेशी कंपनी द्वारा मैगी जैसे जहरीले पदार्थों से युक्त खाद्य उत्पादों व बिक्री की लंबे समय तक अनदेखी के बाद अब अंततः उन्हें वापस लेने का आदेश देने को बाध्य होना पड़ा है। ऐसे ही जंक फूड कहलाने वाले उच्च वसा, चीनी व नमक युक्त अस्वास्थ्यकर आहारों के संबंध में उच्च न्यायालय के आदेशों के बाद भी ऐसे अस्वास्थ्यकर आहारों के संबंध में बनाये मार्गदर्शी प्रावधानों में भी इतनी अधिक कमियां छोड़ दी है कि इन अस्वास्थ्यकर आहारों की विद्यालयों में बिक्री पर प्रभावी रोक व नियंत्रण संभव नही होगा।
इनके अतिरिक्त देश में अनेक उत्पादों के संबंध में विहित मानकों का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति भी लगातार बढ़ रही है। आईसक्रीम में क्रीम के स्थान पर ऐसी वानस्पतिक वसाओं, जिनका लोग सामान्य खाद्य में उपयोग करने में हिचकते हैं उनका प्रयोग कर उसे फ्रोजन डेजर्ट नामांकित कर देना या स्नान के साबुन में कुल वसा की मात्रा 75 प्रतिशत के स्थान पर 65 प्रतिशत रखने के लिए उसे सौंदर्य साबुन नामांकित कर देने जैसी विधि के प्रावधानों की धज्जियां उड़ाने वाले अनेक उदाहरण हैं। इसी प्रकार विगत डेढ़ दशक से देश में निरंतर मांग किये जाने पर भी जैव रूपांतरित अर्थात जेनेटिकली मोडिफाइड खाद्य युक्त आहारों के लेबल पर जी.एम. आहार अंकित करने संबंधी कानून का विधेयक लंबित है। जबकि यूरोप सहित कई देशों में कई जी.एम. आहार प्रतिबंधित है।
डिब्बा बंद पोषक आहारों में कुछ ही विदेशी कंपनियों के बढ़ते एकाधिकार को देखते हुए इन उद्योगों में होने वाले अधिग्रहणों आदि के विरूद्ध भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की निष्क्रियता भी चिंताजनक है। ऐसी एकाधिकारयुक्त कंपनियों द्वारा सीसा व मोनोसोडियम ग्लूटामेट जैसे हानिकारण पदार्थों से युक्त या यकृत, गुर्दा एवं मस्तिष्क आदि के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहे तैयार आहारों के भारी भरकम विज्ञापन से उपभोक्ताओं को जिस प्रकार भ्रमित किया जा रहा है, उन्हें व उनके विज्ञापनों में उनके मिथ्या गुणों का बखान करके समाज के साथ धोखाधड़ी कर रहे प्रसिद्ध सितारों पर भी रोक व उनके विरूद्ध कार्यवाही की पहल आवश्यक है।
जंक फूड कहे जाने वाले उच्च वसा, नमक व चीनी युक्त हानिकारक तैयार आहारों के दुष्प्रभावों पर हुए सभी शोध इनसे उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अवसाद, गुर्दे खराब होने आदि के जो दुष्प्रभाव बता रहे हैं, उन्हें देखते हुए जंक आहार के उत्पादन, बिक्री, लेबल पर चेतावनियों की अनिवार्यता, उन पर प्रभावी अंकुश और बच्चों की पहुंच से उन्हें दूर रखना आवश्यक है। इसके साथ ही ऐसे खाद्य आहारों के समय-बद्ध नमूने लेकर जहां उनके संबंध में कठोर मानकों के विधेयन और दंड के प्रावधान भी अनिवार्य हैं।
खाद्य पदार्थों की लेबलिंग की दृष्टि से रोगकारक ए-1 श्रेणी व रोगरहित रखने मंे सक्षम ए-2 श्रेणी के दूध पर भी क्रमशः ए-1 और ए-2 का भी अंकन होना चाहिए। वस्तुतः भारतीय नस्ल की सभी गाय का दूध रोगरहित रखने वाला ए-2 श्रेणी का ही होता है।
विविध अस्वास्थ्यकर आहारों के संबंध में आ रहे शोध परिणामों के आलोक में स्वदेशी जागरण मंच मांग करता है कि ‘सरकार ऐसे सभी तैयार आहारों के मानकों का ठीक से निर्धारण कर उनके उल्लंघन पर कठोर सजा के प्रावधान व लेबल पर वांछित चेतावनियांे के अंकन का प्रावधान करे। ऐसे हानिकारक आहारों के उत्पादन और विपणन में लिप्त सभी कंपनियों को दण्डित करे एवं उन्हें देश में कारोबार से पूरी तरह प्रतिबंधित करे। मंच देशवासियों को भी आगाह करता है कि वे ऐसी कंपनियों के सभी उत्पादों का बहिष्कार करते हुए ऐसे घातक आहारों के विरूद्ध संपूर्ण समाज को जागरूक करे।
Resolution - 2
पूंजी खाते पर रूपये की परिवर्तनीयता अवांछनीय
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर और भारत सरकार के वित्त राज्यमंत्री के इन बयानों, कि रूपये को जल्द पूंजी खाते पर परिवर्तनीय बनाना चाहिए, पर आपत्ति दर्ज करते हुए स्वदेशी जागरण मंच की राष्ट्रीय परिषद सरकार को आगाह करती है कि रूपये को पूंजी खाते पर परिवर्तनीय बनाने की गलती न करे।
गौरतलब है कि रूपये को पूंजी खाते पर परिवर्तनीय बनाने के प्रयास विभिन्न सरकरों द्वारा समय-समय पर किए जाते रहे हैं। भूमंडलीकरण समर्थकों द्वारा पूंजी खाते पर रूपये को परिवर्तनीय बनाना भूमंडलीकरण की अंतिम कड़ी के रूप में देखा जाता है। पूंजी खाते को परिवर्तनीय बनाने के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि लोग विश्व भर में पूंजीगत परिसंपत्तियां खरीदकर अपना लाभ अधिकतम कर सकते हैं और साथ ही साथ सस्ती दर पर ऋण भी लिए जा सकते हैं। इस संबंध में पहला बड़ा प्रयास सन् 1996-97 में किया गया। उस समय की सरकार रूपये को तुरंत परिवर्तनीय बनाने की ओर अग्रसर हो रही थी। ऐसे में स्वदेशी जागरण मंच ने सरकार के प्रयास को पुरजोर विरोध किया था। सरकार ने अपनी जिद्द में रूपये के पूंजी खाते पर परिवर्तनीय करते हुए रोड मैप तैयार करने के लिए तारापोर कमेटी का गठन किया था। उस समय दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भीषण आर्थिक संकट के चलते सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।
तारापोर कमिटी ने 1997 में दक्षिण पूर्व एशियाई संकट से सबक लेते हुए सिफारिश की कि रूपये को पूंजी खाते पर परिवर्तनीय बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कई शर्तों का अनुपालन करना जरूरी होगा-
1. 1999-2000 तक राजकोषीय घाटे को 3.5 प्रतिशत तक लाया जाए।
2. 1997-2000 के बीच मुद्रास्फीति की दर को तीन से पांच प्रतिशत तक लाया जाए।
3. बैंकों के एनपीए को उस समय के 13.7 प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत तक लाया जाए।
4. विदेशी आर्थिक नीतियांे को इस प्रकार बनाया जाए कि चालू प्राप्तियां बढ़े और इससे ऋण परिशोधन का अनुपात घटाकर 25 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक किया जाए।
गौरतलब है कि रूपये के परिवर्तनीयता के लिए जरूरी शर्तों को आज तक पूरा नहीं किया जा सका।
स्वदेशी जागरण मंच का यह सुविचारित मत है कि रूपये की पूंजी खाते पर परिवर्तनीयता देश की बचत को विदेशों में भेजने का काम कर सकती है, जो भारत जैसे देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकता है। यहीं नहीं इस कारण से रूपये के मूल्य में उथल-पुथल को बढ़ावा मिल सकता है। संरचनात्मक सुधारों के मद्देनजर देश में नियमन और नियंत्रण की आवश्यकता है। ऐसे में रूपये की परिवर्तनीयता को अनुमति देना खतरनाक हो सकता है।
Do not make Rupee Convertible on Capital Account
Taking objection to the recent statements of the Governor of Reserve Bank of India and the Minister of State for Finance, Government of India, that rupee should be made convertible on Capital Account, the National Council of the Swadeshi Jagran Manch cautions the Government not to make this mistake.
Various Governments from time to time attempted the Capital Account Convertibility of the Rupee. Globalization apologists look upon this as a final step towards integrating domestic economy with the world.
Those favoring convertibility of rupee on capital account argue that domestic investors can maximize their profits by purchasing Capital Assets abroad. They also argue that this would help raising loans from abroad at lower rates of interest.
First major attempt in this direction was made by Government of India in the year 1996-97. Swadeshi Jagran Manch strongly opposed the move of the then Government. However, taking an adamant stand, the Government constituted a committee, known as Tarapore Committee, to prepare a road-map for making rupee fully convertible on Capital Account. Thanks to the South East Asian financial crisis, the Government had to take its hands off from this move.
Tarapore Committee recommended that in order to move into this direction, following conditions need to be satisfied among others:
a. Fiscal Deficit to be brought down to 3.5 percent by 1999-2000.
b. Rate of inflation to be brought down to 3 to 5 percent
c. Non Performing Assets (NPAs) of the banks be brought down from 13.7% then to 5%
d. External sector policies designed to increase Current Receipts to GDP Ratio and bring down debt service ratio from 25% to 20%
India is yet to achieve the targets as set forth by Tarapore Committee for initiating the Capital Account Convertibility and any attempt to do it now will be in violation of the Report.
Swadeshi Jagran Manch firmly believes that a free Capital Account will lead to export of domestic saving, which for a capital-scare country like India, can seriously affect the economy adversely. Full Capital Account Convertibility will not suit an economy like India, which is undergoing the process of structural reforms which needs controls and regulations for the time being.


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