Tuesday, March 3, 2020

चीन संबंधी नारे

Jay ghosh
1. चीनी वस्तु छोड़ कर,
     बोलो वंदे मातरम
2. चीनी वस्तु न भाई ना, न भाई ना, ना भाई ना, ना भाई ना
3. चीनी बहिष्कार, स्वदेशी स्वीकार।
4. हम सबका एकही नारा, चीनी सामान नहीं हमारा।

5.
बायकॉट बायकॉट, चाइनीज बायकॉट
बायकॉट बायकॉट, चाइनीज बॉयकॉट।
1. रोजगार बचाने को, चाइनीज बॉयकॉट।
व्यापार बढ़ाने को, चाइनीज बॉयकॉट।
2. सेहत की सुरक्षा को, चाइनीज बॉयकॉट।
पर्यावरण की रक्षा को, चाइनीज बॉयकॉट।
3. आतंकी करने फेल को, चाइनीज बॉयकॉट।
नक्सली पर नकेल को, चाइनीज बॉयकॉट।
4. कुटीर उद्योग बढ़े घर घर,-चाइनीज बॉयकॉट।
लघु उद्योग उड़े फर फर, चाइनीज बॉयकॉट।
5. कई रोगों की एक दवा है, चाइनीज बॉयकॉट।
कई पापों की एक सजा है, चाइनीज बॉयकॉट।

6. बच्चे ,बूढ़े, जवान करेंगे, चाइनीज बॉयकॉट।
कामगर किसान करेंगे, चाइनीज बॉयकॉट।
7. 
बॉयकॉट, बॉयकॉट, चाइनीज बॉयकॉट।
 

गांधी कहते हैं

गाँधी जी कहते हैं
1. Gandhi Speaks - 5 Civil disobedience becomes a sacred duty when the state becomes lawless or corrupt. जब राज्य कानून विहीन या भ्रष्ट हो जाता है तब असहकार पवित्र फ़र्ज़ बन जाता है। 
2.Gandhi Speaks -  The moment the slave resolves that he will no longer be a slave, his fetters fall. Freedom and slavery are mental states. जिस क्षण कोई गुलाम यह तय करे कि अब वह गुलाम नहीं रहेगा, उसी क्षण उस की जंजीरें टूट जाती है। स्वतंत्रता और गुलामी एक मानसिक स्थिति होती है।

3. I understand democracy as something that gives the weak the same chance as the strong. मैं लोकतंत्र को ऐसी कुछ बात समझ रहा हूं कि इस में दुर्बल व्यक्ति को भी सबल व्यक्ति जितने ही अवसर प्राप्त हों। 4. स्वदेशी: Much of the deep poverty of the masses is due to the ruinous departure from Swadeshi in the economic and industrial life. If not an article of commerce had been brought from outside India, she would be today a land flowing with milk and honey! लोगों की भारी गरीबी मोटे तौर पर आर्थिक एवं औद्योगिक जीवन में से स्वदेशी की विनाशक बिदाई है। भारत के बाहर से किसी भी व्यापारी चीज़ अगर नहीं लाई जाती तो आज इसमें दूध और मध की नदियां वाली भूमि होती।
Speaks -4, In democracy, individual's opinion and actions are carefully protected. Therefore, I believe that minority has full rights to behave differently from that of majority. लोकतंत्र में व्यक्ति के मत और कार्य की स्वतंत्रता की सावधानी से रक्षा की जाती है। इस लिए मेरी मान्यता है कि अल्प मत को बहुमत से भिन्न आचरण करने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि जिसमें लोग भेड़ों की तरह बर्ताव करें। अंतरात्मा की आवाज़: The only tyrant I accept in this world is the still voice within. इस जगत में मैं सिर्फ एक ही त्रासवादी का स्वीकार करता हूं और वह है मेरे अंदर से आ रही मजबूत आवाज :

5. Gandhi Speaks -  In matters of conscience, the law of majority has no place. अंतरात्मा के मामले में बहुमत के कानून का कोई स्थान नहीं है।
6.Speaks : The spirit of democracy cannot be superimposed from the outside. It must come from within. Freedom is like birth. Till we are fully free, we are slaves. बाहर से लोकतंत्र की भावना थोपी नहीं। जा सकती। वह तो अंदर से आनी चाहिए। स्वतंत्रता तो जन्म जैसी है। हम सम्पूर्ण स्वतंत्र हों वहां तक हम गुलाम ही होते हैं।

7. A 'No' uttered from the deepest conviction is better than a 'Yes' merely uttered to please, or worse, to avoid trouble. पूर्ण निष्ठा के साथ कही गई 'ना', यह सिर्फ किसी को खुश करने हेतु या, इस से भी बदतर, मुसीबत टालने हेतु कही गई 'हां' से ज्यादा अच्छी है। 
8. No government on Earth can make men, who have realized freedom in their hearts, salute against their will. पृथ्वी पर की कोई भी सरकार ऐसे मनुष्यों को उन की इच्छा के ख़िलाफ़ सलामी देने वाले नहीं कर सकती जिन्होंने अपने हृदय में स्वतंत्रता सिद्ध कर ली है।

10.  असली अर्थशास्त्र: The economics which preaches worship of wealth and allows the powerfuls to amass wealth at the cost of the weak, is wrong economics, and it is fatal. जो अर्थशास्त्र धनपूजा का उपदेश दिया करता हो और जो अशक्त लोगों की कीमत पर शक्तिमान लोगों को धन संचय करने देता हो, वह गलत शास्त्र है, और वह घातक है।

11. Nothing is more shameful in the whole history for the human intelligence than the acceptance of the remedies offered by present economics as a science
. वर्तमान अर्थशास्त्र के उपायों को विज्ञान के रूप में स्वीकार करना उस से ज्यादा शर्मनाक चीज़ मनुष्य बुद्धि में समूचे इतिहास में दूसरी कोई नहीं है। Speaks

12. If we establish power of ethics instead of wealth in our homes, in our palaces and in our temples, we will be able to fight any kind of a group of enemies without suffering from the burden of a gaint military. Only this is real economics. 
अगर अपने घरों में, अपने महलों में, अपने मंदिरों में हम धन की सत्ता के बजाय नीति की सत्ता को प्रस्थापित करेंगे तो, बड़ी सैना का भार बर्दाश्त किए बिना हम किसी भी प्रकार के शत्रु समूह के सामने लड़ सकेंगे। यही सच्चा अर्थशास्त्र है।

13. The economics which ignores ethics and emotions is like a wax statue, life can't enter into it. 
जो अर्थशास्त्र नीति एवम् भावनाओं का अनादर करता हो वह मोम के पुतले जैसा है, उसमें जीवन का प्रवेश नहीं हो सकता।

14. Every human being has a right to life and therefore, he as a right to acquire means for his own nutrition and own clothings and house wherever needed. But, we don't need any help of economists or their theories for this very simple function. 
हरेक मनुष्य को जीवन जीने का हक है और इसी लिए उसे अपने पोषण करनेके साधन एवम् जहां ज़रूरत हो वहां वस्त्र और घर प्राप्त करने का हक है। लेकिन, इस अति आसान कार्य के लिए हमें अर्थशास्त्रीओंकी और उन के सिद्धांतों की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं। 
15.  The economics which damages the moral well-being of an individual or a nation is unethical and therefore sinful. जो अर्थशास्त्र व्यक्ति या देश की नैतिक कुशलक्षेम को हानि पहुंचाता है वह अनैतिक है और लिए पापी है। 

16. The economics which allows hunting of one country by another country is immoral. जो अर्थशास्त्र एक देश को दूसरे देश का शिकार करने की अनुमति देता है वह अनैतिक है। Source: Young India, 13-10-1921.

17. A poor and illiterate person is a very big person than the clever trader, lawyer or doctor who earns money through improper means. अयोग्य साधनों से पैसे कमाने वाले चतुर व्यापारी, वकील या डॉक्टर से तो गरीब और निरक्षर व्यक्ति बहुत बड़ा आदमी होता है। Speaks - 41 [11/28, 22:46]

: ऋतस्य श्लोको बधिरा ततर्द । - (ऋग्वेद, 4.23.8) सत्य की प्रशंसा बहरों के भी कानों को खोल देती है। [11/29, 06:03]

18. Speaks - 59 Economic equality is the prime key of perfect non-violent swaraj. आर्थिक समानता अहिंसक पूर्ण स्वराज की प्रमुख चाबी है।1 29-11-2018. [11/30, 06:01]

19. Speaks - 60 Working for economic equality means ending of a permanent quarrel between capital and labour. 
आर्थिक समानता के लिए काम करने का अर्थ है पूंजी और मजदूरी के बीच की स्थायी लड़ाई को मिटाना। . [12/1, 06:01]

20.Speaks - 61 My ideal is equal distribution but it is not possible to achieve till I see, therefore, I work for the just distribution. मेरा आदर्श समान वितरण का है पर मैं देख सकूं वहां तक इसकी सिद्धि संभवित नहीं है इस लिए मैं न्यायी वितरण के लिए कार्य करता हूं। . [12/2, 06:21]

21. Gandhi Speaks - Swaraj of my dream is the Swaraj of the poor. All the needs of life used by the king and the rich class should also be easily available to the poor. मेरे सपने का स्वराज गरीबों का स्वराज है। राजा और अमीर लोग जीवन की जिन ज़रूरतों का इस्तेमाल करते हैं वे उनको भी सुलभ होनी च

22. Speaks - Coal made of burnt woods may have become cheaper after the fire, bricks of fallen house may have become cheaper after the earthquake, but nobody would dare to say that fire and earthquake were beneficial to the people. आग लगने के बाद लकड़े जलके बने कोयले सस्ते हो सकते हैं, भूकंप आने के बाद गिरे हुए घरकी इंटें सस्ती हो सकती हैं, लेकिन इस से आग और भूकंप प्रजा के लाभ के लिए हुए ऐसा कहने की हिम्मत कोई नहीं करेगा। (चीन व ऐमज़ॉन के बारे में ठेड़क है)

23. Speaks -  It is useless talking about India's freedom by those people who are not glad in their hearts by seeing goods produced by our poor artisans and who do not wish to renounce something for them. हमारे गरीब कारीगर स्त्री- पुरुषों द्वारा बनाई चीजों को देख कर जिन का हृदय प्रसन्न नहीं होता, जिन्हें उनके लिए थोड़ा त्याग करने का मन नहीं होता, वे भारत की स्वतंत्रता की बात करे यह बेकार की बात है

24. Gandhi Speaks - 
Only those companies can be called Swadeshi where control, management and administration by a managing director or a managing agent are in the hands of Indians. 
जिन कंपनीओं में नियंत्रण, प्रबंधन एवम् मेनेजिंग डायरेक्टर या मेनेजिंग एजेंट द्वारा चलनेवाला प्रशासन भारतीयों के हाथ में हो उसे ही स्वदेशी कहा जा सकता है। :

25.Gandhi Speaks -  I cannot expect to establish economic equality of my imagination. If it is to be established, I will have to drag myself to the situation in which the most poor person lives. 
मैं अपनी कल्पना की आर्थिक समानता की स्थापना करने की आशा नहीं रख सकता। अगर इस की स्थापना करनी हो तो मुझे अपने आप को गरीबों में भी जो गरीब है, उस की स्थिति में ले जाना चाहिए।

26.speaks -  I cannot expect to establish economic equality of my imagination. If it is to be established, I will have to drag myself to the situation in which the most poor person lives. मैं अपनी कल्पना की आर्थिक समानता की स्थापना करने की आशा नहीं रख सकता। अगर इस की स्थापना करनी हो तो मुझे अपने आप को गरीबों में भी जो गरीब है, उस की स्थिति में ले जाना चाहिए।

27.  We all should do that kind of labour for one hour which is being done by the poor and in that way we will achieve solidarity with them and through them with the whole humankind. I can not imagine a more noble or national work than that labour.
हम सब एक घंटे के लिए गरीबों को जो मजदूरी करनी पड़ती है वह करें और इस तरीके से हम उन के साथ और इन के द्वारा समूची मानवजात के साथ एकता सिद्ध करें। इस से ज्यादा अच्छा या राष्ट्रीय कुछ और भी हो सकता है,ऐसी कल्पना मैं नहीं कर सकता।

28. Speaks - Each and every individual should do physical labour for bread, the body should be bent, that is the Divine Rule. 
रोटी के लिए प्रत्येक मनुष्य को मजदूरी करनी चाहिए, शरीर को मोड़ना चाहिए, यह ईश्वरीय नियम है। The state is a necessary evil. We need it to protect our rights...the state has to tax us to protect us, and the violence it thus commits is necessary to protect us from greater violence.

29. राज्य एक अनिवार्य अनिष्ट है। अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हमें इस की आवश्यकता है.... राज्य को हमारी रक्षा हेतु हम से कर वसूली करनी पड़ती है, और इस तरीक़े से वह जो हिंसा करता है वह ज्यादा हिंसा से हमारी रक्षा करने के लिए आवश्यक है। By Amit Varma (Indian writer, 1945 - ):

30. Speaks - In cities and palaces, crores of people can never live with each other in peace. There, they can not escape from taking resort to violence and untruth. शहरों और महलों में करोड़ों लोग एकदूसरे के साथ कभी भी शांति से जी नहीं सकते। वहां हिंसा एवम् असत्य का आसरा लिए बिना उन के पास कोई चारा नहीं है। Source: 'The Last Phase - 2', p: 544. By Pyarelal. . Source: 'Harijan', 12-11-1938.

31.Speaks - As long as democracy is sustained by violence, it can't protect or maintain the weak people. 
जहां तक लोकतंत्र को हिंसा द्वारा टिकाए रखते हो वहां तक वह न तो दुर्बल लोगों की रक्षा कर सकेगा या न तो उनका निर्वाह कर पाएगा।

32. Speaks -  Purchasing or using goods produced by exploited labour is a sin. शोषित श्रम से पैदा हुई चीजों को खरीदना या इन का उपयोग करना पाप है। Ahmedabad.15-12-2018.

33. Gandhi Speaks -  Today the machines help few people to ride over the back of the lakhs of people. The inspiration behind them is not the instinct of philonthrophy for labour saving but it is greed. With all my powers I am fighting against this kind of social composition. आज तो यंत्र बहुत थोडेसे लोगों को लाखों लोगों की पीठ पर सवार होने में सहायता करते हैं। इसके पीछे की प्रेरणा श्रम बचाने की परोपकारी वृत्ति नहीं है बल्कि लोभ है। मैं अपनी पूरी ताकत के साथ समाज की ऐसी रचना के ख़िलाफ़ लड़ रहा हूँ। Source: All Men Are Brothers, Navjeevan, p: 162.

34. Gandhi Speaks -  The ideal of continuously creating necessities in unlimited terms and satisfying them is an illusion and a conspiracy. 
अमर्यादित मात्रा में ज़रूरतें पैदा करते ही जाने का और इन की परिपूर्ति करने का आदर्श एक भ्रम है, और यह एक साज़िश है। Source: The Selected Works of Mahatma Gandhi, Vol.6, p:326.

Wednesday, May 15, 2019

स्वदेशी आंदोलन - ठेंगडी जी

1. "स्वदेशी आंदोलन" नामक माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी का भाषण 8 जुलाई 2002 का जोधपुर का है . वैसे तो कई बार इस विषय पर श्रधेय ठेंगडी जी बोले हैं, परंतु यह भाषण अपने आप मे अलग से है, स्वदेशी के सभी पक्ष इसमें सविस्तार लिए हैं। यह 'सर्वसमावेशी स्वदेशी' पुस्तक में संकलित है और यूट्यूब में भी है। वहां शीर्षक है "स्वदेशी ही समाधान || दत्तोपंत ठेंगडी और यह 57.10 मिनट्स का है और उसका लिंक है https://youtu.be/h--Vk_sU9Pc
और आइए उस भाषण का सारांश पढ़ लेवें।
1. सब से पहले वो कहते हैं स्वदेशी का ग्रह योग ऐसा है की स्थापना की पूर्व से ही इसका विरोध होता रहा है और किस प्रकार साम्यवादी लोग स्वदेशी का इसलिए विरोध करते कि हमने विदेशी चीजें नहीं खरीदनी इसीलिए स्वदेशी कंपनियां हमें लूटेंगे और हमें पैसा दिया गया है । ऐसा आरोप लगाया।परंतु अगले दिन ही जब स्वदेशी ने  कास्ट ऑफ़ प्रोडक्शन के आधार पर कीमत लिखा जाने का निर्णय किया तो उनकी बोलती बंद होगी गई ।
वह शुक्र नीति के उस श्लोका वर्णन भी करते हैं जिसमें कीमत कैसे तय होती है
2. स्वदेशी सिर्फ वस्तु प्रयोग तक सीमित नहीं, विचार है: एक नेता बोला कि हमारे क्षेत्र में स्वदेशी की बात सुनकर के लोग मजाक उड़ाएंगे कि यह 16वीं शताब्दी में देश को ले जाना चाहते हैं । उस पर वह बोलते हैं कि क्या आप के लोग क्या इतने एडवांस्ड हैं जैसी मोतीलाल नेहरू और दादा भाई नौरोजी  जिन्होंने स्वदेशी अंगीकार किया, तो चुप हो जाते हैं ।
बाद में कुछ उदाहरण 10 ऐसे देते हैं कि स्वदेशी क्या है?
पहला उदाहरण उसमें से जापान के द्वारा अमेरिकी संतरे ना बिकने का है।
दूसरा उदाहरण ब्रिटेन की महारानी ने जर्मनी की कार खरीदने का निर्णय और जनता के विरोध के कारण अपने देश की कार ही खरीदना।
तीसरा वियतनाम प्रमुख हो ची मिन्ह का और यह बताना फटी और मुरम्मत की गई पैंट इस लिए पहनता हूँ कि "माय कंट्री कैन अफ़्फोर्ड थिस मुच्।"
चौथा,  गांधी इरविन पैक्ट के समय महात्मा गांधी जी का निंबू पानी में वह नमक पुड़िया से डालना जो उन्होंने दांडी यात्रा में प्राप्त किया था।
पाचवां, कोलकाता में देश भक्तों द्वारा ब्रिटिश पुडिंग का विरोध और भारतीय पुडिंग यानी रसगुल्ला जैसे मिष्टान्नका परिवर्धित स्वरूप बनाया।
सातवां मुस्तफा गाजी कमाल पाशा जब तुर्किस्तान के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने तुर्की भाषा में कुरान का अरबी से तर्जुमा करवाया और इस पर खून खराबा तो हुआ लेकिन इस्लाम का राष्ट्रीयकरण यानी स्वदेशीकरण हुआ।
आठवां,  क्रिश्चियन मिशनरीओं के कुछ ग्रुप किस प्रकार से भारतीय परंपरा के अनुसार आमीन की जगह ओम और चौगा भी भगवा पहन रहे हैं।
नोवा उदाहरण, किस प्रकार से बाबू गेनू ने विदेशी सामान नहीं आने दिया और हम 12 दिसंबर का दिन मनाते हैं ।
दसवां  चीन और कोरिया की सरकारों ने माइकल जैकसन को अपने यहां प्रवेश नहीं दिया क्योंकि यह उनके देशों पर सांस्कृतिक हमला होगा .
3. इसके बाद ठेंगड़ी जी राष्ट्रवाद व अंतरराष्ट्रीयवाद के भ्रम को दूर करते हैं और मनमोहन सिंह व रामास्वामी के झूठे तर्कों को बताते हैं इंटरडिपेंडेंस और इंडिपेंडेंस में कहाँ तक विरोध नहीं है । स्वदेशी के मुताबिक :
3.1 पहला उदाहरण वह विरोध का यह बताते हैं कि हम पश्चिम के विकास मॉडल को ग्लोबल मॉडल है, और उसकी नकल सब देशों करना चाहिए,  इसका विरोध करते हैं।
3.2 और यही हमारे स्वदेशी का आधार कि हम दूसरे देशों से लेनदेन तो करेंगे पर बराबरी के आधार पर और उससे हमारे आत्मनिर्भरता पर आंच नहीं आनी चाहिए ।
3.3 दूसरा उदाहरण  देते हैं कि डब्ल्यूटीओ की भूमिका क्या है और इससे पहले बताते हैं कि कई बार हमारे पर आपत्ति की जाती है कि हम  सरकार में अपोजिशन का रोल अदा करते हैं । ऐसा नहीं है बल्कि हम सब सरकारों को राष्ट्रीय सरकार मानते हैं और उसके साथ "रेस्पॉन्सिव  कोऑपरेशन" के आधार पर व्यवहार करते हैं ।
4. WTO की भावना की शुरुआत 1991 से नहीं बल्कि पुरानी है। 
यह दूसरे विश्व युद्ध  के अंतिम चरण में 6 जून 1945 से जब अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर की सेनाएं यूरोप तब आ गई और जब लगा कि इसमें सफलता मिलने वाली है तो उन्होंने किस प्रकार अपनी कॉलोनीज़ यानी अपनी उपनिवेशों को बचाया जाए ।इसके लिए प्रयास किया और वही अंतर्राष्ट्रीय ट्रेड की पहली सीढी बना। IMF एवम वर्ल्ड बैंक स्थापित किये।
4.  उनके कॉलोनी या उपनिवेश जीवित रहें इसके लिए पहला भ्रम फैलाया की हमारी पूंजी के बगैर किसी देश का विकास नहीं हो सकता इसलिए फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट FDI अति आवश्यक है।
यह गलत बात है, और वह बताते हैं कि किस प्रकार राइट टू इन्वेस्ट हमारी संप्रभुता पर आघात है।
4.1 साथ ही हमारे नेताओं ने कहना शुरू किया कि लोग त्याग करने को तैयार नहीं हैं, वास्तव में यह बात भी ग़लत है। नेताजी सुभाष जब दक्षिण एशिया गए तो किस प्रकार लोगों ने सहयोग किया और लाल बहादुर शास्त्री का भी लोगों ने सप्ताह में एक समय का भोजन छोड़ कर के सहयोग किया ।और 62 की लड़ाई हो के बंगलादेश की, हमारे मजदूरों ने ओवरटाइम ना लेते हुए ज्यादा घंटे तक काम किया।  बेशक सामन्यतःव्यक्ति स्वार्थी है पर अगर ठीक ढंग से प्रेरणा दी जाए तो वह निस्वार्थ काम या परमार्थ के काम भी करता है।
4.3  दूसरा भ्रम फैलाया गया की विदेशी टेक्नोलॉजी ही मॉडर्न टेक्नोलॉजी है,और इसी प्रकार से अगर हम को देश आगे बढ़ाना है तो विदेशों से टेक्नोलॉजिकल सहयोग जरूर लेना चाहिये।  हिरोशिमा और नागासाकी का उदाहरण देकर के वो बताते हैं कि साइंटिफिक एडवांसमेंट की भी सीमा है और उसके लिए दुनिया में टेक्नोलॉजिकल ओंबड्समैन ombudsmen या उस पर नियंत्रण रखने वाले लोग होना चाहिए। और डॉक्टर अब्दुल कलाम की बात इंडिया 2020 की कहते हैं कि हमारा देश अपनी ही  तकनीकी एडवांसमेंट के आधार पर फर्स्ट रैंकिंग कंट्री हो सकता है ।
5. इसी प्रकार वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन है विश्व व्यापार संगठन के बारे में बताते हैं कैसे उसका विरोध भी उसी के जानकार करते हैं और वह दो उदाहरण  जोसेफ स्टिगलटीज़ और दूसरा उदाहरण इंटरनेशनल मोनेटरी फंड के टॉप ऑफिशल डेविसन एल्बुगका देते हैं जिन्होंने खूब डट कर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का विरोध किया है।
5.1 फिर वह गोरे देशों की ग्रीन रूम पॉलिसी के बारे में बताते हैं। और मलेशिया के प्राइम मिनिस्टर महाथिर मोहम्मद में इसके विरोध में आवाज उठाई और साउथ साउथ कमिशन बनाया जिसके जनरल सेक्टरी डॉ मनमोहन सिंह थे और जब वह वित् मंत्री बने तो वह उन बातों को भूल गए कि कैसे गोरे देशों के विरोध में साउथ साउथ कमिशन रिपोर्ट तैयार की थी ऐसा ही उदाहरण यशवंत सिंहा जो उस समय भारत के वित्त मंत्री थे उनका भी वह देते हैं कि पहले वह विश्व व्यापार संगठन का विरोध करते थे परंतु जब वित्त मंत्री बने तो उन बातों को भूल गए और वह "एमनिशिया" amnesia नामक बीमारी का यानी पूर्ण विस्मरण वाली बीमारी का उल्लेख करते हैं जो वित्तमंत्री बनते ही शुरू हो जाती है।
5.2 अगला बिंदु है कि डब्ल्यूटीओ के मुताबिक सब देश समान है परंतु अमेरिका ऐसा नहीं करता वे 1988 के उस  कानून का और उसके स्पेशल 301 क्लॉज़ का वर्णन करते हैं और इसी प्रकार वह दूसरे नियम का भी वर्णन करते हैं कि जिसके कारण से उनका सामान कोई रोक नहीं सकता चाहे किसी देश को जरूरत हो या ना हो।
6.  अगला बिंदु लेते हैं कि महाथिर मोहम्मद ने सुझाव दिया था कि इन गोरे देशों की मोनोपोली को कैसे तोड़ा जाए और उसके लिए विकासशील देशों का अलग ब्लॉक बनाने की जरूरत है और भारत को उसका नेतृत्व करना चाहिए पर भारत में ऐसा नहीं किया । दूसरी बात कहते हैं कि हम ने समय-समय पर जो आवाज इसके खिलाफ उठाई उसके कारण डब्ल्यूटीओ की बैठक में दोहा में मुरासोली मारन ने विरोध किया और दुनिया में भारत छा गया। और हमने उनके सार्वजनिक अभिनंदन की बात भी सोची थी ।
7. साथ ही जो निवेश मीडिया में प्रिंट मीडिया में फॉरेन इन्वेस्टमेंट आ रहा है उसके लिए विरोध किया सरसंघचालक माने सुदर्शन जी की बयान को भी तोड़ मरोड़ कर छापा गया जो बाद में स्पष्ट हो गया तो इस यह सब बातें जन जागरण द्वारा जो चल रही है।
8.  अंत में इक्ष्वाकु राजा के सार्वभौमिकता का श्लोक बोलते हुए वे अपना भाषण पूरा करते हैं।

Monday, January 14, 2019

Angus Medisson and GDP



Britain perpetrated economic holocaust in India for 200 years
13 Jan 2019 16:18:10 


Economic history of Bharat is the tale of evolution from a largely agricultural/trading society with highest contribution to world GDP to a Nehruvian mixed economy of Communism manifested by perpetually in loss PSUs, Government manufacturing bread to running hotels as well as rag-tag of Capitalism manifested by strangulated private sector groaning under Licence-Permit Raj, unmitigated corruption, bribery and methodical plunder of nation’s wealth.

Organisation Of Economic Co-operation established OECD Development Centre in 1962, engaged a British economist Angus Maddison to study world economy and author a comprehensive treatise on that. Maddison rose to the call diligently and authored a famous book ‘The World Economy – A Millennial Perspective’ to illustrate the long-term economic performance of nations, factors to explain successful economies and bottlenecks that hamstrung laggards. It was published in 2001 by OECD as the entire project was sponsored by them. Maddison studied economic history of the world for the entire Christian era from AD 1 to AD 2000 conclusions of his extensive study have been startling for the entire world –

Since AD 1000, world population multiplied 22 times, per-capita GDP 13 times and World GDP 300 times. Major beneficiaries have been North America, Western Europe, Japan and Australia. However, these major beneficiaries have been poorer than Africa in AD 1000 albeit 20 times ahead of them now.

The contribution of Bharat’s GDP to the world GDP was highest in the year AD 1 at 34 per cent. The position of No. 1 in the world was re-attained in years AD 1000, AD 1500 and AD 1600 too.

USA and western countries contributed less than 2 per cent during this period of Christian history.

It begins with Indus Valley Civilisation (BC 3500–1800) marked by agriculture, animal husbandry, production of sharp-edged tools/weapons of copper, bronze and tin. Trading activity included terracotta pots, jewellery, precious gems, pearls and precious metals. By BC 600, silver coins were minted by Mahajanpadas symbolising extensive trading and urbanisation.

Mauryan Empire (321-185) was a great unifying empire of all kingdoms. Political stability and security ensured a massive rise in economic activity in all disciplines of human enterprise. The empire also imparted a tremendous boost to infrastructure development.

During 1500 years of post-Mauryan Empire, Bharat commanded the largest economy in the world. By AD 1700, Bharat possessed one-fourth to one-third of world’s entire wealth.

Unprecedented prosperity and accumulation of wealth continued even during the Mughal era (AD 1526-1858).

British association with the Indian economy came into being in AD 1600 through East India Company and export of Indian textiles and raw silk used to be paid through bullion. By AD 1757, British involvement expanded and they began paying for Bharatiya raw material, spices etc. through ‘revenue’ plundered from provinces captured by them largely through unfair means. Thus began decline and destruction of Bharatiya industry and wealth. The inflow of bullion completely stopped and British occupiers funded wars in Bharata/Europe with the land revenue extorted in the country and development coming to a grinding halt.

It took just 80 years to ruin Bharatiya economy (1780-1860) under colonial occupation from an exporter of finished products to exporter of raw material and importer of products manufactured abroad. Exploitation by British was ruthless and once a flourishing leading economy in the world was entirely emaciated to skeletons.
 
By 1950, Europe’s share rose to 23 per cent and Bharat’s declined to a mere 3 per cent.
 
Chanakya, the prime minister to first Mauryan King Candragupta (BC 340-290), described silver coins as Rupyarupa. Gold coins were known as Suvarnarupa, copper coins as Tamrarupa and lead coins as Sisarupa. Rupee, the name of contemporary currency originated from Chanakya’s Rupa alone.
 
On Aug. 15, 1947, 1 US $ was equivalent to 1 rupee only.
 
Madison authored a famous table that revealed how Bharat’s share in world economy declined from 24.4 per cent in AD 1500 to a measly 4.2 per cent in AD 1950. It is Table A.6 in Statistical Appendix A of Contours Of The World Economy, AD 1-2030 published in 2007. Bharat’s per-capita GDP in AD 1500 at $550 (valued at 1990 levels) with 25.1 per cent share of world population conceded the nation a gigantic economy in spite of per-capita GDP of western countries is higher at $798 and of China $600. The rate of growth of per-capita GDP and GDP peaked during AD 1870 to AD 1913 and registered at lowest level during AD 1870 to AD 1913. From 25 per cent of the world economy to the abject 4 per cent due to ruthless colonial plunder, is indeed a very tragic and sordid economic history of contemporary Indian economy. The Table also illustrates economic transformation spurred by the industrial revolution, rise of US and China post-1970 and collapse of the Soviet economy.
 
An Englishman Q. Craufurd described “Hindoo” society in his “Sketches Of The Hindoos” as he observed in the 1790s when British colonialism had not yet commenced their orgy of rape and plunder, “…where destructive hand of the conqueror had not fallen, Hindoos under their native sovereigns were governed on principles of the most just and benevolent policy. In those countries (local principalities), lands were highly cultivated; towns and their manufacture flourish; villages were composed of neat and commodious habitations and filled with cheerful inhabitants; and wherever the eye turned, it beheld marks of the mild protection of the Government and of ease and industry of the people.”
 
Utsa Patnaik of Columbia University estimated, during AD 1765 to AD 1938 Sterling Pounds 9.2 trillion equivalent to US $ 44.6 trillion were siphoned off at the colonial exchange rate of US $ 4.8 per Sterling Pound compounded at 5% interest rate. As entire foreign exchange earnings were transferred straightaway to London, the country was unable to import machinery and technology to modernise economy on the lines of Japan in AD 1870s. There was absolutely no rise in per-capita income from AD 1900 to AD 1929 in spite of second largest export earnings in the world for decades. Life-expectancy at birth in AD 1911 was mere 22 years and per-capita foodgrain consumption declined from 200 Kg. in AD 1900 to 137 Kg. in AD 1946. People died like flies while British were entirely busy plundering away our earnings to England. They established an elaborate tax-collection machinery with District Collector being the pivotal figure. Tax collections trebled under East India Company and the massive Bengal famine in 1770 killed at least 1 crore natives out of 3 crore human population. Tax collections were used to purchase goods from peasants and British ensured, collectors and buyers were different persons approaching at different intervals so that peasants never suspected, it was their own tax collected being used for buying their produce. So British-occupiers collected entire produce absolutely free. Intermediaries were nurtured extensively and several contemporary business houses earned their money through ‘Dalali’ for the British with almost non-existent income-tax, so established Utsa Patnaik.
 
Now it turns out for sure that the entire doctrine of Capitalism is based on robbery and plunder of so-called III-World/Developing Economies. According to Utsa Patnaik, during AD 1780 to AD 1820, British rate of savings was exactly the same figure that was siphoned off from Bharat and West Indies i.e. 6 per cent of British GDP. With 70 countries colonised, the quantum of plunder was so huge that it was impossible for a tiny country like Britain to digest entire loot, so they turned around to become the largest capital exporter. Entire so-called advanced capitalist world viz. USA, Europe, even Russia are in reality, capitalised with the loot and plunder perpetrated in so-called III-World countries. With this plundered wealth, Britain funded infrastructure in USA/Europe. Even war expenses too, were passed onto Bharatiya Budget with the shortfall whenever, declared as debt with hefty interest levied on that head. London-based Secretary of State for India used to hold one-third of Bharatiya revenue as ‘Expenditure Abroad’ to import from Bharata. So audacious are they that even today in 21st Century AD, Britain and Europe dub Bharatiya and Chinese investors in Africa ‘Neo-Imperialists’ with the sole intention to deflect focus from the economic holocausts that they committed in Bharat and China through colonialism disregarding the fact that they have been dealing with independent African governments. Then they dished out the dubious doctrine of ‘Free Trade’ only to serve their own interests at the expense of others.
 
Western countries want free access to agriculture in Bharat and China because they cannot cultivate crops and horticulture that are harvested here. Indeed, tropical countries must unite to extort better terms as so-called advanced western civilisations are critically dependent on us for their propped-up standards of living with some 70 per cent products sold in their Malls are essentially tropical in origin. And we are goaded to believe that so-called advanced countries are advanced because they are stupendously innovative and entrepreneurial. Not a single word of truth of history of economic-holocaust is ever taught in Britain and Bharat for obvious reasons, British grow up imbued with snobbery/haughtiness with a sense of ‘White man’s burden’ to civilise Blacks and Browns across the world while Hindus grow up suffused with ‘inferiority complex’, to accept it as destiny should they ever come to know all about that eventually or to prevent them from revolting out of sudden burst of anger if ever at all.
 
It is more than obvious, it is not for nothing that invaders intruded and ferociously ravaged us. They had multiple reasons to invade and colonise Bharat and China as otherwise, it would have been an impossible exercise for them to exist with profligacy. Quite ironically, all important reasons for them to intrude into Bharat still exist shall ever exist. It is absolutely imperative for Hindus of Bharat to remain incessantly conscious of all those impending dangers and lurking threats of survival, always stand united in this constant battle of existence. Even negligible slackness on this issue may invite terrible consequences to reckon with for a long time to come. Even pursuit of Vedic values for aeons failed to impart a sense of Hindu-unity among Hindus and Hindus stretched those values to disparagingly suicidal limits. Those invasions and plunder by intruders from overseas might have been a providential exercise to inculcate that sense of purpose among Hindus.
 
British Crown particularly King George V onward may be regarded as carriers of heaviest/enormous sins and felony perpetrated during their monarchy all over the world. According to Christian theology, every man is born as a sinner. Where else do you find such a nano-accuracy of the doctrine in action other than British Monarchy?
 
Like American Civil Rights leader Dr. Martin Luther King Jr., I too have a dream. I have a dream, one-day Raisina Hills in New Delhi shall appoint a Bharatiya Governor-General for the province of Britain, headquartered at Buckingham Palace, based in London and the province of Britain shall be ruled over by Bharat for at least 400 years. Not only shall we reclaim and recover our entire wealth plundered in those 200 years or so with interest, but also Bharat shall govern them, teach them essentials of governance and civility, disabuse them of ‘White man’s burden to civilise the world’ so that no country in the world shall ever dare to capture and ravage any other country in the world. That shall be yet another great gift from our ancient civilisation to the entire world at large.

 from Ritam
 
 


Angus Medisson and GDP AND PCI


World history by per capita GDP


World history by per capita GDP

Capital Account | Manas Chakravarty

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WED, AUG 25 2010. 10 43 PM IST

Updated: Wed, Aug 25 2010. 10 43 PM IST

Angus Maddison, the famed British economic historian who passed away earlier this year, is best known for his estimates of world gross domestic product (GDP) that go back all the way to the year 1 AD. In recent times, his charts have been used to tell the fascinating story of how the share of India and China in world GDP used to be very high till about 1600 AD, but started declining thereafter as they missed the industrial revolution. With their current rapid growth, their share in the world economy is now rising once again.

In 1000 AD, according to Maddison’s calculations, China and India together contributed 50.5% of world GDP (GDP being computed in 1990 dollars and in purchasing power parity (PPP) terms). By 1600, that share had gone up to 51.4%, with China accounting for 29% and India 22.4% of world GDP. A hundred years later, China’s GDP had fallen but India’s went up to 24.4% of world output. By 1820, however, India’s share had fallen to 16.1%. By 1870, it went down to 12.2%. International Monetary Fund (IMF) projections indicate that India’s share of world GDP would be 6.1% in 2015.

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Was colonialism to blame? Did the drain of wealth to Britain impoverish a once wealthy country? Or was the decline in importance merely the result of the rise in productivity in Europe?

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Well, the growth of India’s GDP between 1500 and 1600 was 22.7%, between 1600 and 1700 it was 22.2% and between 1700 and 1820 it logged 21%. So it’s not as if there was any huge decline in the rate of growth. Of course, that doesn’t preclude the possibility that Indian growth, too, may have taken off if the country was not under the thumb of the British. But China continued to be an independent country, albeit one much plagued by the Western powers, and its rate of growth too during the period was nothing to be proud of. What the data seem to be saying is that the coming of the British did not, at least in the first 100 years of colonial rule, make much of a difference to the growth rate of the Indian economy.

Was India a wealthy country before the British came? The numbers that have garnered the most attention have been his GDP estimates, because they fit in with the narrative of a strong India and China getting back their clout in the world economy. But what is that to the average Indian or Chinese citizen? What if the only reason these countries had such a high GDP in earlier times was because they had a larger population?

That is what is brought out by Maddison’s estimates of GDP per capita, again in PPP terms in 1990 dollars. In 1 AD, India’s GDP per capita was $450, as was China’s. But Italy under the Roman Empire had a per capita income of $809. In 1000 AD, India’s per capita income was $450 and China’s $466. But the average of the West Asian countries, such as Turkey and Iraq, was much higher at $621. In terms of general prosperity, therefore, it was the Arab world that was doing well a millennium ago. The Caliphate in Baghdad was a centre of power at the time and both science and culture flourished.

By 1500, though, new centres of prosperity had emerged. India’s per capita income was $550 and China’s $600 in 1500. The Arab world had declined. But standards of living in Western Europe at that time had already gone far ahead. Italy topped the table, with a per capita income of $1,100, the Netherlands following with a per capita income of $761. This was the Italy of the Renaissance, the Italy of Michelangelo and Leonardo da Vinci, of Raphael and Titian. The UK was not far behind, with a per capita income of $714.

By 1600, the centre of Europe had shifted northwards and the golden age of Holland had begun. Dutch per capita income was $1,381 in 1600, while Britain in Shakespeare’s time had a per capita income of $974.

Recall that 1600 was the year the East India Company was founded. In contrast, India’s per capita income continued to be $550, while China’s was $600. Note that even Ireland, one of the poorest of Western Europe’s countries, had a per capita income of $615, higher than India’s and China’s. In short, the per capita GDP numbers mirror the changes in power, prosperity and cultural and scientific achievement.

It wasn’t till 1981 that India had a per capita income of $977, beating that of Britain in 1600. And it wasn’t until 1993 that India’s per capita income of $1,399 surpassed what the Dutch had achieved in 1600. Maddison’s calculations show that in 2008, India’s per capita GDP ( in 1990 dollars, PPP terms) was $2,975, slightly more than one-third of the world average of $7,614. We have a long way to go.

Graphic by Yogesh Kumar/Mint

Manas Chakravarty looks at trends and issues in the financial markets. Comment at capitalaccount@livemint.com

Wednesday, January 9, 2019

रोजगार का स्वदेशी पथ, पुस्तिका

Kashmiri Lal Fwd: Sh. Satish ji's book on Rojप्रस्तन कॉलेज के सब बच्चे चुप हैं, कागज की इक नाव लिए चारों तरफ दरिया की भांति, फैली बेरोजगारी है।...“ राहत इंदौरी बेशक कोई अर्थशास्त्री या समाज शास्त्री नहीं, पर उसकी लिखी ये पंक्तियां समाज और अर्थव्यवस्था की दुखती रग, यानि बेरोजगारी की समस्या के बारे में बहुत कुछ कह जाती है। आपके हाथ में आई यह पुस्तिका सिर्फ बेरोजगारी रूपी बीमारी का एक्सरे रिपोर्ट ही नहीं है, बल्कि काफी कुछ इलाज भी लिखा है और नए रास्ते तलाशने को भी प्रेरित करती है।  पीछे देखा जाए तो देश के विकास और कल्याण के लिए 1951-52 में पंचवर्षीय योजनाओं को आरंभ किया गया था। योजना आरंभ करने के अवसर पर आचार्य विनोबा
 भावे ने कहा था कि किसी भी राष्ट्रीय योजना की पहली शर्त सबको रोजगार देना है। यदि योजना से सबको रोजगार नहीं मिलता, तो यह एकपक्षीय होगा, राष्ट्रीय नहीं। आचार्य भावे की आशंका सत्य सिद्ध हुई। प्रथम पंचवर्षीय योजनाकाल से ही बेरोजगारी घटने के स्थान पर निरंतर बढ़ती चली गयी। आज बेरोजगारी की समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी इसीलिए स्पष्ट कहा था कि जैसे पीने का पानी, सांस लेने के लिए हवा, एक नागरिक का मूलभूत अधिकार है, उसी प्रकार उचित रोजगार भी व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। लगभग इसी से मिलती-जुलती बात सभी भारतीय महापुरुषों ने कही है। पर ध्यान रहे कि इन सभी ने रोजगार की बात कही है, सिर्फ नौकरी की नहीं कही!  प्रस्तुत पुस्तिका इसी बेरोजगारी की मूलभूत समस्या का निदान और उपाय सोचने के लिए मन और मस्तिष्क तैयार करती है। लेखक यायावर है, हमेशा घूमते रहते हैं, सुनते रहते है, इस बीच जो लोगों को समझ में आ जाये, ऐसे बिंदु सहेजते रहते है। उसी संकलन एवं मंथन से जो माखन निकला, उसे आपके सामने सरल व रोचक व विद्वतापूर्ण ढंग से लेखक ने प्रस्तुत किया है। हम जानते है कि पहला सवाल ये उठेगा कि अगर बेरोजगारी एक विकराल समस्या है तो इसका व्याप कितना बड़ा है? यानी आंकड़े क्या है? ऐसे सभी आंकड़े भी प्रस्तुत किये है। हम ये भी जानते है कि आंकड़े जब सरकारी गलियारों से परोसे जाते है, तो वो जानने-समझाने के लिए कम, और कुछ चीजें छुपाने के लिए ज्यादा होते है। लेकिन लेखक ने बड़े सटीक और स्पष्ट ढंग से बताया है कि रोजगार किस क्षेत्र से, कितना आता है और कहां-कहां कम रोशनी वाले स्थानों पर रोजगार के संभावित खजाने छिपे हुए हैं। साथ ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सफेद हाथी बहुत कम रोजगार देते है, और उन पर आधारित विकास का  मॉडल रोजगार रहित मॉडल है। बस यही बात समझने की है कि हमें रोजगार प्राप्त करना है, तो विकास का माॅडल ही बदलना पड़ेगा।  वास्तविकता यह है कि लघु उद्योग, कुटीर उद्योग और कृषि में सुधार के बिना रोजगार सृजन नहीं हो सकता। यही अर्थव्यवस्था के छुपे खजाने हैं। समझना होगा कि एफडीआई एक मृग-मरीचिका है। इसलिए सरकारी नीतियों में बदल की जरूरत है, और समाज की बदली हुए सोच बहुत बड़ी क्रांति ला सकती है। कई बार लगता है कि बेरोजगारी की समस्या तो है ही, परंतु उससे भी ज्यादा रोजगार सृजन के बारे में प्रचलित सोच ज्यादा बड़ी समस्या है।  विशेष रूप से पढ़ी-लिखी युवा शक्ति, सरकारी और संगठित क्षेत्र में जॉब्स के पीछे भागती नज़र आती है। ‘मैं रोजगार देने वाला बनंू’, ये सोच बढ़ानी पड़ेगी। इसलिए यह एक समाज जागरण का भी विषय है। इस बात को कहकर छुट्टी नहीं पाई जा सकती कि यह एक ‘ग्लोबल फेनोमेनन’ है जैसा कि प्रायः पहले भ्रष्टाचार के बारे में जुमलेबाजी की जाती थी।  प्रस्तुत छोटी सी पुस्तिका कुछ ऐसे प्रसंगों को समेटे हुए है कि जो लोग नौकरी छोड़कर स्वरोजगार में गए और अत्यधिक सफल बने। वे रोजगार याचक नहीं, बल्कि प्रदाता बनें। ऐसे लोग समाज में प्रेरणा देते है, युवकों के लिए भी मार्गदर्शक बनते है। पाठकों से निवेदन है कि ऐसे प्रेरक उदाहरण सफल व्यक्तियों के आप भी भेजेंगे तो समाज के लिए उत्प्रेरक बनेंगे। ऐसा नहीं है कि “ये कहानी है, एक दिए और तूफान की’’....बल्कि ये समुद्र में बने दीप स्तंभों (light houses) की है, जो वास्तव में बने ही समुद्री थपेड़े सहने को है। झंझावातों में जहाजों को मार्ग दिखाने के लिए ही बने हैं। कहीं BTW के सतीराम यादव, जिसने फैजाबाद से दिल्ली आकर बिट्टू टिक्की वाला नाम से रेहड़ी से शुरूकर आज कैटरिंग का बड़ा ब्रांड बना है... और कहीं तमिलनाडू के एक अनपढ़, गरीब भरत द्वारा अण्डरगारमैण्टस के अब भारत के प्रसिद्ध ब्रांड VIKING उद्योग की गाथा इसी श्रेणी में आती है।  इस वर्ष जिन विषयों को हमने गहन रूप से लेना है, बेरोजगारी की समस्या, यह वहीं विषय है। आशा है कि ये पुस्तिका स्वदेशी कार्यकर्ताओं, समाज के अन्य लोगों के लिए भी मार्गदर्शिका बनेगी। रोजगार विषय को अभियान के नाते नहीं, बल्कि स्वदेशी विकास के माॅडल में बदल को प्रण और प्राण के नाते स्वीकार करेंगे, ऐसी आशा है। - कश्मीरी लाल ।
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 रोजगार व स्वदेशी पथ रोजगारः युवा भारत की प्रथम आवश्यकता 
 प्द्यर्थी बहनों व भाईयों ! स्वदेशी जागरण मंच गत 26 वर्षों से देश के आर्थिक प्रहरी के रूप में काम करता आया है। इन 26 वर्षों में डब्ल्यूटीओ, एनराॅन, मछुआरों की समस्या, एफडीआई इन रिटेल, पशुधन बचाने जैसे अनेक प्रकार के अभियान, आंदोलन तथा आवश्यकतानुसार सरकार से संवाद करते हुए, यह आर्थिक अभियान आगे बढ़ता आया है। गत वर्ष चीन के द्वारा भारत के बाजार, भारत के उद्योग व भारत के रोजगार पर पड़ रहे विपरीत प्रभाव को रोकने के लिए एक व्यापक ‘राष्ट्रीय स्वदेशी-सुरक्षा अभियान’ लिया गया। हम सब जानते हैं कि वह बहुत ही उत्तम विधि से सफलता की ओर बढ़ रहा है। इसी अभियान के दौरान ही यह स्पष्ट हो गया कि इस समय देश की जो सबसे बड़ी चुनौती है, वह है-रोजगार का क्षेत्र। अभी गत 26 जनवरी 2018 को राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में भी देश की महती आवश्यकता रोजगार को ही बताया है। प्रधानमंत्री तो 2014 से 1 करोड़ प्रतिवर्ष रोजगार का वायदा करते ही आये हैं। इस वर्ष के बजट में भी इस विषय का बार-बार उल्लेख आया है। यहां तक कि मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहमंयम ने भारत सरकार के लिए करणीय कार्य के पांच सूत्री कार्यक्रम (एजेंडा) में रोजगार को प्रथम स्थान पर रखा है। फिर इन्हीं दिनों इंडिया टुडे-MOTN व ABP News के CSDS-Lok Niti द्वारा किये गये दो बड़े सर्वेक्षण आये हैं। इनमें भ्रष्टाचार, महंगाई, आतंकवाद, सामाजिक भेदभाव, पर्यावरण व रोजगार के 6 विषयों पर भारत की राय ली गई। इन समस्याओं में से सर्वाधिक 28 व 29 प्रतिशत के साथ रोजगार को ही भारत की प्रमुख समस्या बताया गया। सामान्य काॅलेज, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों से लेकर नीति आयोग के प्रमुख सदस्यों तक ने इस समय पर भारत की सर्वाेच्च आवश्यकता इस समस्या के समाधान को ही माना है। इसे ही हमें विस्तार से अध्ययन भी करना है व इसका समाधान भी करना है। दुनिया का युवा देश भारत भारत की युवा आबादी इस समय पर केवल भारत में ही नहीं, दुनिया में सर्वाधिक है। वैसे कुल भारत की आबादी जो कि इस समय पर 132.6 करोड़ है, वह दुनिया की कुल आबादी का 17.2 प्रतिशत है। कुल दुनिया के 204 देशों में से पिछले 141 देशों की आबादी, यह हमारे देश के बराबर है। यानि कि भारत अपने आप में एक विश्व है। किंतु अगर हम युवाओं के क्रम को भी देखें, तो भारत में इस समय पर युवा 35.6 करोड़ है। दूसरे नंबर पर चीन है-28.5 करोड़। फिर युवाओं की संख्या अफ्रीकन देशों में ही है। जबकि सारा यूरोप अब बूढ़ा हो चला है। यही नहीं जापान, कोरिया, आस्ट्रेलिया, यहां तक कि अमरीका भी बूढ़ा हो गया है। चीन ने 40 वर्ष पूर्व जो ‘वन चाईल्ड’ की नीति अपनाई थी, उसके कारण से वह भी अब तेजी से बड़ी आयु वाला देश होता जा रहा है। वास्तव में तो भारत व अफ्रीकी देश ही अगले 25-30 वर्षों तक युवा रहेंगे। अन्यथा विश्व के अन्य देश तो न्यूनतम युवाओं वाले देश बनते जा रहे हैं।  किंतु भारत द्वारा अपनी युवा शक्ति का, जो कि भारत का सबसे बड़ा वरदान बिन्दू है, ठीक ढ़ंग से उपयोग नहीं हो रहा। इन युवाओं को रोजगार देना भारत के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता व सबसे बड़ी चुनौती है। इस समस्या का जब हम गहराई से विश्लेषण करते हैं तो यह ध्यान में आता है कि वास्तव में यह अधिक आबादी के कारण से नहीं है बल्कि गलत प्रकार के आर्थिक मॉडल को अपनाने के कारण से है। युवा व अधिक आबादी होने से तो भारत का उपभोग का स्तर अधिक रहता है, इससे हमारी अर्थव्यवस्था को गति ही मिलती है। आज भारत दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था हो गया है, उसमें एक कारण हमारी आबादी व युवा शक्ति भी है।  हजारों वर्षांे से भारत एक आर्थिक महाशक्ति एक बड़ा प्रश्न है कि क्या कभी भारत पूर्ण रोजगारयुक्त और बड़ी आर्थिक शक्ति रहा है? थोड़ा सा हम अपने इतिहास का अध्ययन करते हैं तो ध्यान में आता है कि भारत कम से कम गत दस हजार वर्षों से एक सुदृढ़ आर्थिक व्यवस्था रहा है। यह हम ही नहीं कह रहे, बल्कि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सीनियर प्रोफेसर रहे डाॅ. एंगस मेडिसन के द्वारा लिखित ‘मिलेनियम पर्सपेक्टिव’ (The World Economy: A Millennium Perspective) में इस बात को स्पष्ट रूप से बताया गया है। उसी को ही प्रोफेसर डॉ. दीपक नैय्यर (पूर्व वाइस चांसलर (VC) व बाद में हार्वड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर) की पुस्तक 'Catch Up' में भी दोहराया गया है। इसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि भारत 1 ईस्वीं से 1000 ईस्वीं तक विश्व सकल घरेलू विनिर्माण (Manufacturing) में 31.1 प्रतिशत तक का हिस्सेदार रहा है। उसके बाद भी भारत का 1500 ई. तक दुनिया की जीडीपी में 28.6 प्रतिशत हिस्सा था और इस्लामिक, पुर्तगाल, फ्रांसीसी व अंग्रेजों के आगमन व भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने की प्रक्रिया तेज करने के बावजूद 1700 ई. में दुनिया की जीडीपी में योगदान 19.0 प्रतिशत व 1820 ई. में 12 प्रतिशत तक रह गया और उसके पश्चात इसी तरह घटता ही चला गया। और अंततः 1947 में जब अंग्रेज यहां से चले गये तो उस वर्ष भी भारत का हिस्सा 3.2 प्रतिशत था, जो आज केवल 2.2 प्रतिशत या इसके आसपास है।  सदा रोजगारयुक्त ही रहा है भारत! एक व्यवहारिक बात भी देखें। हमारी संस्कृत भाषा जो कि 700-800 वर्षों पूर्व तक भी भारत के जन सामान्य की भाषा थी, सबसे समृद्ध भाषा है। किंतु उसमें बेरोजगार व्यक्ति के लिए कोई पर्यायवाची शब्द ही नहीं है और उसका कारण यह है कि भारत के हजारों वर्षों के इतिहास में कभी कोई व्यक्ति रोजगारविहीन हो सकता है, बेरोजगार हो सकता है, यह कल्पना ही नहीं रही। सहज स्वाभाविक रूप से यह ध्यान में आएगा कि भारत एक उद्योग प्रधान देश रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात विद्वानों ने यह उल्लेख किया कि भारत कृषि प्रधान देश था, किंतु सत्य यह है कि भारत उद्योग प्रधान देश था। यहां लघु उद्योग थे, कुटीर उद्योग थे, ग्रामीण आधारित उद्योग थे, पर्यावरण हितैषी उद्योग थे और परंपरागत उद्योगों के कारण से पिता का उद्योग पुत्र संभालता ही था। इसलिए वैद्य का लड़का वैद्य, कारीगर का लड़का कारीगर, सुनार का लड़का सुनार, अध्यापक का लड़का अध्यापक, सैनिक का लड़का सैनिक आदि होता ही था व क्षमतानुसार बढ़ता भी जाता था। इस अपनी पुरानी अर्थव्यवस्था के बारे में गांधी जी, दादा भाई नैरोजी व बाद में धर्मपाल ने विस्तार से लिखा भी है।  हम सब जानते हैं कि गत 800-900 वर्षों से भारत लगातार इस्लामिक विदेशी आक्रांताओं से और बाद के लगभग 200 से 300 वर्षों तक अंग्रेजों के साथ लड़ता रहा है। इस सारे समयकाल में हमारी जहां पर शैक्षणिक, सामाजिक, संस्कार व्यवस्थायें टूट गई। उसमें सबसे अधिक कठिनाई हुई कि हमारा आर्थिक व्यवस्था तंत्र टूट गया। अंग्रेजांे के कारण से हमारे ग्रामीण उद्योग, लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, बड़े उद्योग बंद हो गए या उन्होंने तहस-नहस कर डाले। शिक्षण व्यवस्था को तहस नहस कर डाला। किंतु यह भी सत्य है कि हमें अपने को स्वतंत्रता के पश्चात जैसी पहल करनी चाहिए थी, उसमें कमी रह गई। इस विषय पर सारे देश में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नये चिंतन व व्यापक चर्चा की आवश्यकता है, ताकि देश फिर से पूर्णतया रोजगारयुक्त बन सके। विकास के पथ पर भारत आज जब हम अपने रोजगार के विषय पर ध्यान करते हैं तो यह बात ध्यान में आती है कि इस समय पर सारे विश्व की तुलना में भारत की अर्थव्यवस्था का जो स्तर है वह सामान्यता ठीक है, अच्छा है। जैसे दुनिया भर में जो मापदंड माना जाता है सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का, उसमें भारत इस समय 7 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक दर से बढ़ रहा है, जो कि दुनिया के सभी देशों में सर्वोच्च है। इस समय पर हम 2.6 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था हो गए हैं और अनेक शोध इस समय बता रहे हैं कि हम 2018 में ही दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएंगे और 2028 तक तो हम तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं। इस समय अमरीका की अर्थव्यवस्था 17.6 ट्रिलियन डालर, चीन 12.1, जापान 6.2, जर्मनी 3.5, फ्रांस व इंग्लैंड 2.9 ट्रिलियन डालर ही हमसे आगे है।   इस समय पर महंगाई काबू में है, लगभग 4.2 प्रतिशत वृद्धि दर तक की है जो कि सामान्यतया नियंत्रण में मानी जाती है। देश में राजनैतिक, सामाजिक स्थिरता है। आतंकवाद अथवा हिंसक तत्व काबू में है। रूपया 63.70 पैसे पर है जो कि मजबूत होता जा रहा है। बजट घाटा, यह अंतर्राष्ट्रीय मानक 3.0 प्रतिशत (जीडीपी का) के निकट (3.5 प्रतिशत) है। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 410 बिलियन डालर पार कर चुका है। स्टाॅक एक्सचेंज मार्किट भी ठीक है। यानि आर्थिक दृश्य ठीक-ठाक है। किंतु इसमें सबसे अधिक विषय आता है कि हमारे यहां पर इस आर्थिक वृद्धि में से भी रोजगार नहीं पैदा हो रहा। कुछ लोगों का कहना है कि यह रोजगारविहीन (jobless growth) है, किंतु कुछ लोग कहते हैं कि नहीं, इसका स्वरुप बदल रहा है। किंतु देश की बेरोजगारी इतनी भी ज्यादा नहीं है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष का कहना है कि रोजगार से बड़ा मुद्दा गुणवत्तापूर्ण रोजगार यानि वर्ष भर के और सुरक्षित रोजगार का है।  गत चार वर्षों में सरकार ने इस दृष्टि से अनेक प्रयत्न किये भी है। जिसमें छोटे, लघु व कुटीर कार्यों के लिए सस्ते लोन की व्यवस्था अर्थात मुद्रा योजना, एक बड़ा प्रयत्न है। इसी तरह युवकों को तकनीकी प्रशिक्षिण की व्यापक योजना ‘स्किल इंडिया’ भी शुरू की गई है। इसी तरीके से स्टैंडअप, स्टार्ट अप, डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं के माध्यम से भी रोजगार पैदा करने के प्रयत्न हो रहे हैं। फिर भी लगभग 10.2 लाख युवक प्रतिमास जॉब मार्केट में आ जाते हैं। भारत को 1 वर्ष में 1.4 करोड़ रोजगार चाहिए। इसके लिए भगीरथ प्रयत्न करने होंगे। अभी, हमारा रोजगार आता कहां से है? आगे की योजना करने से पूर्व जरा एक नजर इस बात पर भी लगाएं कि अभी तक का रोजगार आ कहां से रहा है? तो ध्यान में आएगा कि हमारा कृषि क्षेत्र 40 से 48 प्रतिशत रोजगार दे रहा है। वहीं पर मैन्युफैक्चरिंग में से केवल 26 से 30 प्रतिशत रोजगार आ रहा है, यह लघु उद्योगों से लेकर कॉर्पोरेट तक का है। सर्विस सेक्टर, जो भारत में भी तेजी से बढ़ रहा है, यह 28 से 32 प्रतिशत तक का रोजगार देता है। इस समय पर भारत में कुल वर्क फोर्स अर्थात 18 वर्ष से लेकर 65 वर्ष तक की आयु वाले 49.6 करोड़ लोग है।  उधर सभी 29 प्रदेश सरकारों व भारत सरकार की नौकरियां, चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक, की गणना की गई। इसमें अर्ध सरकारी या पीएसयू, बड़े उद्योगों का संगठित क्षेत्र, जिसे काॅरपोरेट सेक्टर कहते है, चाहे फिर भारतीय कंपनी हो या बाहर की, यह सब मिलाकर 3 करोड़ 42 लाख 60 हजार लोगों को ही रोजगार दे रहे हैं, अर्थात इन सबका मिलाकर रोजगार में योगदान 7 प्रतिशत से अधिक नहीं है। किंतु फिर भी 93 प्रतिशत लोग भारत के अपनी बुद्धि, अपनी पूंजी, अपनी मेहनत व अपना जोखिम, के आधार पर अपना रोजगार स्वयं विकसित कर रहे हैं।  अभी कुछ दिन पूर्व नीति आयोग के उपाध्यक्ष डाॅ. राजीव कुमार ने रोजगार के कुल आकलन के बारे में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। यदि नीति आयोग के इस दृष्टिकोण को भी मानें, जिसमें 10 से अधिक कामगारों युक्त उद्योगों की संख्या भी शामिल कर ली जाए, यद्यपि इनमें बहुत से केजुअल व दिहाड़ीदार लेबर होती है, यानि कि अस्थायी व अप्रशिक्षित कामगार को मिला लें तो भी यह आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंचता है। अर्थात कुल लेबर फोर्स का 20 प्रतिशत। तब भी 80 प्रतिशत यह स्वरोजगार व कृषि वाला असंगठित कार्यबल का ही क्षेत्र है। तो यह ध्यान में करना होगा कि 80 प्रतिशत भारत जो अपना रोजगार स्वयं से निकाल रहा है, वह कृषि व उससे जुड़ी हुई प्रक्रियाएं, रिटेल, स्वरोजगार आदि ही है।  संगठित क्षेत्र का रोजगार में योगदान टेक्सटाइल के क्षेत्र में जो कि जीडीपी में 4 प्रतिशत का योगदान करता है, इससे 4.9 करोड़ लोग रोजगार पाते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन में जीडीपी का योगदान तो 24 प्रतिशत है, परंतु वहां 3.6 करोड़ लोगों को ही रोजगार मिलता है। एक बड़ा सेक्टर रिटेल का है, जहां पर 4 करोड़ लोगों को रोजगार मिल रहा है, जीडीपी में रिटेल का योगदान 10 प्रतिशत है। फिर जनरल मैनुफैक्चरिंग जो कि जीडीपी में 17 प्रतिशत का योगदान कर रहा है, किंतु वहां रोजगार 3 करोड़ ही हैं। इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 7.7 प्रतिशत है, जबकि वहां पर केवल 37 लाख लोग रोजगार पाते हैं। बैंकिंग का क्षेत्र जिसका जीडीपी में हिस्सा 7 प्रतिशत हैं, किंतु रोजगार 15 लाख लोगों को ही दे पाता है। इसी तरह रियल एस्टेट, जीडीपी में 9.0 प्रतिशत, किंतु 15 लाख लोग उसमें रोजगार पाते हैं।  एनर्जी (पावर) एक ऐसा क्षेत्र है जिसका रोजगार का मूल्यांकन करना सहज सरल नहीं हो रहा। किंतु बड़े ध्यान में बात आने वाली है कि प्रदेश व केंद्र सरकारों की एक बड़ी शक्ति सरकारी, अर्ध सरकारी, बड़े उद्योगों के संगठित क्षेत्रों में लगती है। जबकि चाहिए यह कि उनकी 93 प्रतिशत शक्ति 93 प्रतिशत रोजगार देने वाले कृषि व अन्य असंगठित क्षेत्र में लगनी चाहिए।  एक और बात ध्यान में रखने वाली है। वह यह कि इस समय पर दुनिया में तकनीक परिवर्तन आज तक की सबसे तीव्रतम दर पर है। हर 10-12 साल बाद नौकरियों के प्रकार बदल जाते हैं, क्योंकि तकनीक बदल जाती है। आॅनलाईन-कॉमर्स, रोबोटिक्स व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई चुनौतिया आ रही हैं। जब हम स्वदेशी विकास मॉडल (रोजगार केंद्रित) इसकी योजना करेंगे तो उस समय पर हमें इन चुनौतियों का भी ध्यान रखना होगा। जैसे- आईटी रेवोलुशन से अमेरिका के बाद सबसे अधिक लाभ भारत को हुआ था। ऐसे ही इन क्षेत्रों में भी हम कर सकते हैं क्या, यह विचारणीय विषय है।  कृषि क्षेत्रः सर्वाधिक महत्व का विषय भारत के पास 14.8 करोड़ हेक्टेयर भूमि है जो कि दुनिया में सर्वाधिक कृषि योग्य भूमि है। चीन, रूस, अमेरिका इनके क्षेत्रफल भारत से 2 गुना, 3 गुना, 5 गुना होते हुए भी कृषि योग्य भूमि हमारे पास ही सर्वाधिक है। किसान की आय को वर्ष 2025 तक दोगुना करना होगा, तभी हम गांव से शहर की ओर पलायन रोक सकेंगे। क्योंकि यह क्षेत्र सबसे अधिक रोजगार देता है। किंतु किसान की आय तो बहुत ही कम है। वह संतोषकारक नहीं है। फिर भारत में जोत (प्रति किसान कृषि भूमि) का स्तर बहुत छोटा होने के कारण किसान की कठिनाईयां और अधिक बढ़ जाती हैं। हमें फसल की लागत कम करनी होगी, इसके लिए जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग या अन्य प्रकार के तरीके ढूंढने होंगे। उसी तरीके से फसल का मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) करना होगा जिससे किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की आवश्यकता ही ना पड़े। किसान इससे आगे निकलकर अपनी फसल को 3 गुना दाम पर बेचने की प्रक्रिया सोचे। उदाहरण के तौर पर, किसान जब अपना गेहूं बेचता है तो उसे 1680 रुपए समर्थन मूल्य के हिसाब से ही पैसा मिलता है, उसमें भी मंडी का व अन्य प्रकार के खर्चे काटने पर उसको 1500 रुपए क्विंटल से अधिक का दाम घर में नहीं पड़ता। जबकि उसी गेहूं को कारगिल आदि कंपनियां पैकिंग कर 34 रूपये किलो तक में भी बेचती है। यदि हमारे किसान यह निर्णय कर लें कि वह अपनी फसल के गेहूं को दलिया, आटे, बिस्कुट या अन्य किसी उत्पाद प्रक्रिया में डालकर ही बेचेंगे तो उनकी आय में तेजी से बढ़ोत्तरी होगी, इसी को मूल्य संवर्धन कहते हैं। इसके लिए सरकार से सहयोग लेकर और मंडी की तथा मार्केटिंग की व्यवस्था करनी होगी, किंतु यह एक तरीका हो सकता है। इसी प्रकार से और क्या-क्या हो सकता है, यह देश की 2.5 लाख पंचायतों में लोग बैठकर सोचंे। कुल मिलाकर मुख्य बात यह है कि कृषि की लागत कम हो और मूल्य संवर्धन करके उसकी कीमत किसान को अधिक मिले। यह यदि हो गया तो फिर उसको बैंक लोन माफ करने या इस प्रकार की राहत देने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। वह स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होगा और गांव से शहर की तरफ पलायन भी रूकेगा। अन्य अभी क्या-क्या हो सकता है, यह किसान संघ अथवा अन्य किसान, कृषि के जानकार लोग योजना कर सकते हैं।  रोजगार का बड़ा क्षेत्र है- लघु, कुटीर व घरेलू उद्योग कृषि के बाद दूसरा बड़ा रोजगार का क्षेत्र है- लघु, कुटीर एवं घरेलू उद्योग। परंतु इन पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों व चाइनीज कंपनियों की मार पड़ने के कारण से यह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। जब लक्ष्य रोजगार हो ही गया तो हमें उपायों पर भी विचार करना होगा। इनमें सबसे प्रमुख वह है, जो स्वदेशी जागरण मंच सदा कहता रहा हैं कि घरेलू व अन्य सामान्य वस्तुओं में, शून्य तकनीक वाले क्षेत्र में, एफएमसीजी (fast moving consumer goods) क्षेत्र में, किसी भी प्रकार की बहुराष्ट्रीय कंपनियां अथवा चाइनीज कंपनियों को नहीं रहना चाहिए। यहां तक कि भारत की भी बड़ी कंपनियों से इस क्षेत्र को मुक्त रखना चाहिए। हमें सारे देश में ‘केवल स्वदेशी’ यह अभियान चलाना चाहिए। ताकि देश के लोग सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में, घर परिवार की वस्तुओं में केवल स्वदेशी और वह भी लघु एवं कुटीर उद्योगों की बनी हुई ही प्रयोग करें। आज से कुछ वर्ष पहले तक देश में 1430 वस्तुएं ऐसी थी जो कि लघु व कुटीर उद्योगों (SME Sector) के लिए सुरक्षित थी, किंतु धीरे-धीरे करके इन बहुराष्ट्रीय, विदेशी, बड़ी कंपनियों के दबाव में विभिन्न सरकारें यह सूची खत्म करती गईं और इसके कारण से गांवों, छोटे-कस्बों में बनने वाले घरेलू उत्पाद की ईकाईयां बंद होती गई। परिणामस्वरूप बेरोजगारी बढ़ती चली गई। केवल बहुराष्ट्रीय व बाहरी कंपनियां ही नहीं बल्कि भारत के बड़े उद्योग समूहों को रिटेल के क्षेत्र में काम करने की खुली छूट दे दी गई। उदाहरण के तौर पर- रिटेल की दुकान भी अब रिलायंस चलाता है, नमक Tata बनाता है, तेल ऐसे ही कोई बड़ी कंपनी बनाती है। इसी तरीके से हमारे साबुन, तेल, शीतल पेय आदि उद्योगों पर यूनिलीवर, लक्स, पेप्सी-कोकाकोला जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां का कब्जा है। स्वाभाविक है कि उनका मुकाबला छोटे व कुटीर उद्योग, दुकानदार नहीं कर पाते। जिससे वे शीघ्र ही बंद हो जाते हैं और रोजगार के अवसर और कम हो जाते हैं। अतः इन 1430 वस्तुओं को लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए आरक्षित कर देना चाहिए। इसके लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां, अंतर्राष्ट्रीय मानक अथवा विदेशी निवेश का क्या होगा, इससे घबराने की आवश्यकता नहीं। एक उदाहरण देखें, अमेरिका के अंदर डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने, वह अमेरिका के युवकों को दिये इसी आश्वासन पर ही बने कि वह उनके लिए रोजगार जुटाएंगे। मेक्सिको के सामने दीवार खड़ी करेंगे। क्योंकि मेक्सिको से बड़ी मात्रा में बेरोजगार लोग अमरीका में आकर स्थानीय लोगों के रोजगार के अवसर कम कर देते हैं। इसी तरह ट्रंप ने कहा कि चीन की करेंसी मैनीपुलेशन को रोकेंगे और चीन से होने वाले 350 बिलियन डालर वार्षिक घाटे को तेजी से कम करेंगे। यहां तक कि ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत के एच1बी वीजा पर रोक लगाएंगे। अमरीका इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा भी रहा है।  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने यहां रोजगार वृद्धि व व्यापार घाटे को कम करने के लिए अनेक कड़े कदम उठाये हैं। यहां तक कि अमेरिका द्वारा ही प्रारंभ की गई टीपीपी की संधि, जिसमें दुनिया की 42 प्रतिशत GDP के देश आते थे उसको राष्ट्रपति बनने के एक महीने में ही निरस्त कर दिया। उन्होंने सारी दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा स्वीकार किया गया सीओपी2 (पेरिस जलवायु समझौता), उससे बाहर हो जाने की घोषणा कर दी। उन्होंने भारत जैसे मित्र देश की भी परवाह न करते हुए एच1बी वीजा पर सख्त नियम बनाने शुरू कर दिए हैं। केवल एक ही उद्देश्य डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सामने रखा है, और वह है-अमेरिका के लोगों को रोजगार देना, अमेरिका की समृद्धि। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी, एजेंसियां, बहुराष्ट्रीय कंपनियां क्या कहती हैं, इसकी उन्होंने परवाह नहीं की। यदि डोनाल्ड ट्रंप अपने देश में ऐसा कर सकते हैं तो भारत को क्यों नहीं करना चाहिए। यदि 1430 की सूची को फिर से आरक्षित कर देने से भारत में लघु एवं कुटीर उद्योग बढ़ता हो और उससे लाखों रोजगार फिर से बढ़ते हो, तो हमें अवश्य ही इस विषय पर ना केवल विचार करना चाहिए बल्कि इसके लिए व्यापक जनसमर्थन भी जुटाना चाहिए।  बाई अमेरिकन एक्ट की तरह बने भारत में भी कानून हमें जानकारी रहनी चाहिए कि अमेरिका में एक ‘बाई अमेरिकन एक्ट 1933’ बना हुआ है। जिसके अनुसार अमेरिकी सरकार जो भी खरीदती है उसका एक बड़ा भाग अमेरिकी कंपनियों से खरीदना अनिवार्य होता है। गत वर्षों में अमरीका ने इस एक्ट के अंदर आने वाली वस्तुओं की सूचि को लगातार बढ़ाया है यानि इस कानून को कड़ा किया है। अपने यहां के उद्योगों व व्यापार क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए ऐसा किया है। कुछ ऐसा ही फ्रांस के राष्ट्रपति डी. विलेपां ने जब फ्रांस की डायरी कंपनी बिकने लगी तो उसका राष्ट्रीयकरण कर दिया इंग्लैंड की जनता द्वारा तो अपने रोजगार व आर्थिक हितांे के लिए यूरोप यूनियन से बाहर आना (Brexit) स्वीकार किया। अर्थात हर देश को अपने हितानुसार नीतियां स्वीकार या बहिष्कार करते हैं। फिर हमें क्यों नहीं इस प्रकार की संरक्षणवादी प्रक्रिया का उपयोग कर अपने रोजगार व समृद्धि को बढ़ाने की सोचनी चाहिए। किंतु हमारे यहां के अर्थशास्त्रियों के एक वर्ग का कैसा मति भ्रम है कि अभी पिछले बजट में जब भारत सरकार ने कोई 40 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाया तो उसे ही संरक्षणवादी (Protectionism) कह, इसे नकारात्मक रूप से प्रचारित करना शुरू किया। जबकि गत 25 वर्षों में भारत ने लघु व कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित वस्तुओं की सूचि को धीरे-धीरे करके समाप्त किया है। जबकि अमरीका की तरह हमें इसको और बढ़ाना चाहिए था।  हमें संपूर्ण देश में अलग-अलग विद्या (Artican based cluster) वाले कुटीर उद्योग समूहों की श्रंृखला प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना होगा। यथा फिरोजाबाद का कांच-चूड़ी उद्योग, अलीगढ़ का ताला, आगरा-कानपुर का जूता... आदि। यह ग्रामीण क्षेत्रों में भी हो सकते हंै।  हमारे यहां पर भी अमरीका के ‘बाय अमेरिकन एक्ट 1933’ के समानांतर ‘जीएफआर कानून’ है। इस जीएफआर कानून में अभी दो वर्ष पूर्व ही यह अनिवार्य किया गया है कि 50 लाख तक की खरीद, भारतीय कंपनियों द्वारा हो। अब उसे बढ़ाकर 80 प्रतिशत तक भारतीय खरीद करना होगा और उसमें भी 80 प्र्रतिशत लघु एवं मध्यम उद्योगों (एसएमई) से खरीदा जाए, ऐसी व्यवस्था हमें जीएफआर के अंतर्गत बनानी होगी। तभी भारत के उद्योग व निर्माण (Manufacturing) को प्रोत्साहन मिलेगा तथा स्वाभाविक ही है कि रोजगार भी बढ़ेगा। मेड बाई भारत, मेक इन इंडिया आदि के विचार तभी ठीक से फलीभूत हो पायेंगे। उद्यमिता ही है रोजगार का राजमार्ग एक सबसे बड़ा कार्य जो हमें करना होगा, वह है-अपने युवकों के अंदर उद्यमिता (Entrepreneurship) की भावना को जागृत करना। अभी इस समय पर सारे देश के युवकों में एक विचार चलता रहता है कि जैसे ही हम ग्रेजुएशन अथवा पोस्ट ग्रेजुएशन करके निकलेंगे तो हमें सरकारी नौकरी मिले तो सबसे अच्छी बात है, नहीं तो प्राइवेट नौकरी करनी है। नौकरियां सीमित हैं इससे अधिक निकल नहीं सकती। यदि हम उन्हें विद्यार्थीकाल में ही इस बात के लिए प्रेरित करें कि वह नौकरी मांगेंगे नहीं, नौकरी देने वाले बनेंगे। यानि 'Don't be Job seeker, Be job provider' यह उद्घोष लेकर यदि एक बड़ा जन जागरण अभियान चलाया जाये तो इस देश में युवकों के अंदर उद्यमिता की भावना को भरपूर तरीके से जागृत किया जा सकता है। जिससे सारे देश के अंदर नौकरियां देने वाले लाखों युवा खड़े हो जायेंगे। मैंने अनेक स्थानों पर BTW यानि बिट्टू टिक्की वाले का उदाहरण दिया है। वह अयोध्या के पास एक छोटे से गांव में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा करने वाले सतीराम यादव की कहानी है। उसको दोस्तों ने कहा कि दिल्ली जाकर कुछ काम करो, तो वह दिल्ली आ गया। पैसा भी बहुत नहीं था। क्या करें, उसने रानीबाग में एक रेहडी लगा ली, टिक्की गोलगप्पे की। धीरे-धीरे उसका काम चला, तो उसने गांव से अपने भतीजे को भी बुला लिया। फिर इन्होंने मिलकर साल भर बाद धीरे-धीरे एक दुकान खरीद ली और फिर किसी ने उनको बताया तो इन्होंने कैटरिंग का काम शुरु किया। दिल्ली में छोटी मोटी पार्टियों में सामान देना शुरु किया और एक लंबी प्रक्रिया के बाद आज लगभग 25 वर्ष बाद BTW केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत का कैटरिंग क्षेत्र का बड़ा ब्रांड बन गया है। लगभग 1200 लोग उसके यहां पर रोजगार प्राप्त कर रहे हैं, यानि पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव का एक युवक दिल्ली आकर 1200 लोगों को रोजगार देता है, कोई इंजीनियरिंग, पीएचडी नहीं किया हुआ था। न कोई बड़े संपन्न परिवार का या प्रशिक्षित था, पर उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति व उद्यमिता में विश्वास से आज वह इतनी बड़ी स्थिति में पहुंच गया है। यह है एंटरप्रेन्योरशिप का एक उदाहरण। तमिलनाडू के viking उद्योग की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। जिसमें एक बहुत कम पढ़ा लिखा युवक अपनी दादी के प्रोत्साहन व सहयोग से बार-बार विफल होने के बावजूद अंडर-गारमेंट के बड़े ब्रांड व उद्योग-व्यापार को अंततः स्थापित करने में सफल हुआ। भारत में ऐसे सैंकड़ों उदाहरण यहां-वहां देखने को मिल रहे हैं। इस प्रक्रिया को सारे देश में एक जन आंदोलन जैसा खड़ा करना होगा।  इसी प्रकार स्वरोजगार के लिए भारत सरकार और कुछ प्रदेश सरकारों ने भी विभिन्न योजनाएं बहुत अच्छी चलाई हैं। उदाहरण के तौर पर मुद्रा, स्टार्ट-अप, स्टैंड-अप, स्किल इंडिया आदि। किंतु जन जागरूकता और जन सहभागिता के अभाव के कारण वह अपने निश्चित लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पा रही हैं। यदि अपने जन जागरूकता में इसको एक विषय बनाएं तो बहुत सी योजनाएं ऐसी हैं जो प्रदेशों अथवा केंद्र सरकार में हैं, जिनका उपयोग करके हमारे युवा बेरोजगारी की समस्या को दूर कर सकते हैं।  नये उभरते क्षेत्र-समृद्धि व रोजगार के साधन एक और विचार भी है, नए उभरते क्षेत्र। जिसे आजकल सनराइज क्षेत्र कहते हैं। अभी तक ना तो समाज ने, ना ही प्रदेश व केंद्र सरकारों ने उस पर बहुत ध्यान दिया है। उदाहरण के तौर पर, योग। योग, तन-मन की स्वस्थता के लिए है ही, किंतु आज वह सारी दुनिया में 90 बिलियन (अरब) डॉलर की इंडस्ट्री हो गया है। खेद की बात यह है कि उसमें से 35 बिलियन डॉलर का व्यापार अकेले अमेरिका कर रहा है। योग हमारा, हमारे ऋषि-मुनियों का दिया हुआ, किंतु आज उससे कमाई व रोजगार पैदा करने में अमेरिका आगे हो गया है। यहां तक कि नाईक, एडिडास इन कंपनियों की सामान्य सेल गिरी है। किंतु योग के आसन, योग की एसेसरी, एप्रेन से उन्होंने उसकी भरपाई की है। यदि हम इसको एक नए व्यवसाय के रूप में विकसित करें, तो इसमें कुछ वैसी ही संभावना है जैसी 1995 से 2005 के बीच में आईटी क्षेत्र के कारण से भारत की समृद्धि व रोजगार के द्वार खुले थे। परंतु हम तो ......‘मलयागिरि की भामिनी, चंदन देत जलाए’ की कहावत के अनुसार योग का ठीक से आर्थिक उपयोग नहीं कर रहे। केवल भारत में ही नहीं दुनियाभर में हम योग, योग की शिक्षा-शिक्षक, योग से संबंधित बाकी वस्तुओं का निर्यात करके बड़ी मात्रा में रोजगार व समृद्धि पैदा कर सकते हैं।  इसी प्रकार से पंचगव्य, यानि गाय से उत्पन्न दूध, दही, घी, पनीर, गोबर, मूत्र आदि का विषय भी है। पंचगव्य में अभी किसी और ने बहुत काम नहीं किया है, किंतु पंचगव्य की वस्तुओं का मानक तंत्र (Standardisation) विकसित करके यदि ठीक मार्केटिंग की जाए तो एक बड़ा क्षेत्र समृद्धि व रोजगार का पंचगव्य में से भी निकलेगा। यही बात आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण व निर्यात के बारे में भी कही जा सकती है। क्योंकि भारत दुनिया में 11 प्रतिशत की दवाओं के निर्यात के साथ इस क्षेत्र का अग्रणी देश माना जाता है। तेजी से बढ़ता भारत के रोजगार का साधन-पर्यटन पर्यटन (Tourism) का क्षेत्र ऐसा है जिसमें भारत में इस समय पर दुनिया के किसी भी देश से अधिक संभावनाएं हैं। वर्तमान में भी यह जीडीपी में 7 प्रतिशत तक का योगदान कर रहा है। और विभिन्न सर्वेक्षण बता रहे हैं कि भारत में आगामी वर्षों में इसकी वृद्धि दर 15 प्रतिशत तक होगी। इस वर्ष भी हमारे यहां रिकार्ड एक करोड़ विदेशी आये हैं। स्विटजरलैंड व यूरोप के कई देशों की मुख्य आय ही विदेशी पर्यटन से है। फिर भारत तो प्राचीनतम देश होने के कारण से यहां तो अपार संभावनाएं हैं ही। अतः यदि हम ठीक से टूरिज्म के क्षेत्र का दोहन करने में समर्थ हुए तो निश्चित रुप से हम यह पर्यटक संख्या 5 करोड़ तक ले जा सकते हैं। इससे ना केवल बड़ी मात्रा में भारत, भारत की संस्कृति, भारत की ऐतिहासिक धरोहर का ज्ञान हम दुनिया को दे सकेंगे, बल्कि अपने देश के लिए बड़ी मात्रा में अर्थ व रोजगार भी पैदा कर सकेंगे।  ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना ही होगा दुनिया के तेल उत्पादक देश चाहे वो मध्य-पूर्व एशिया (Middle East Asia) के हो, रूस, अमरीका हो, या कुछ अफ्रीकन, वे पेट्रोलियम उत्पाद के दम पर सारी दुनिया की संपत्ति अपनी तरफ खींचते हैं। यदि हमारे हर घर के ऊपर सौर ऊर्जा, यानि सोलर पैनल लगे हो, तो हमें जितनी बिजली चाहिए, वह हम अपने घरों पर ही पैदा कर सकते हैं। यहां पर यह ध्यान में रखने वाली बात है कि गत कुछ वर्षों में भारत सरकार ने मेगा सोलर पार्कों के लिए बड़ी विदेशी कंपनियों को अनुमति दी है, उसके कारण से आज भारत में कोई 12 गीगा वाट बिजली पैदा हो रही है। किंतु भारत जैसे देश में जहां पर जमीन बहुत कम है, वहां पर हमें रूफटॉप पर ही इस प्रक्रिया को केंद्रित करना चाहिए। इसके केंद्रीकरण होने व ट्रांसमिशन में भी बहुत अधिक विद्युत हानि होने से यह खर्चीली हो जाती है।  विकेंद्रीकरण, इस शब्द को ध्यान में रखा तो हमें सौर ऊर्जा में रूफटॉप सबसे उत्तम विकल्प ध्यान में आएगा। इसी प्रकार से गोबर गैस व अन्य बायोमास के क्षेत्र में, देश भर में कुछ प्रयोग सफल हुए, कुछ नहीं भी हुए, किंतु हमें इस पर एकाग्र करना होगा और बायोमास क्षेत्र को यदि हम सफल बनाने में कामयाब हो गए, तो ग्रामीण भारत में ऊर्जा के क्षेत्र में किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी। ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता तो बढ़ेगी ही। पवन ऊर्जा व कचरा ऊर्जा (Waste to Power) भी इसी प्रकार की ऊर्जा हैं। कुल मिलाकर हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हम दुनिया से जो प्रतिवर्ष 92 बिलियन डॉलर (अर्थात 5796 अरब रूपये) का तेल और गैस आयात करते हैं जो कि हमारे कुल आयात का लगभग 25 प्रतिशत है, उसको जितनी जल्दी हम कम करेंगे, अपने देश का पैसा अपने देश में रोकने में हम कामयाब होंगे। इस दृष्टि से दिल्ली की जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी का अच्छा उदाहरण है कि वहां सब कुछ रूफटाॅफ सौर ऊर्जा से ही चलता है और उन्होंने उसके लिए कुछ भी खर्च नहीं किया, सस्ती बिजली स्वयं व कंपनी के लिए पैदा कर रहे हैं। मोहाली का एयरपोर्ट भी सौर ऊर्जा चालित है। हमें निश्चित रूप से ऊर्जा के वैकल्पिक भारतीय व पर्यावरण हितैषी केंद्र खोजने ही होंगे। पवन ऊर्जा, बायोमास, सौर ऊर्जा आदि उसी प्रक्रिया के ही केंद्र है, यह हम हमेशा ध्यान में रखें। शिक्षा व चिकित्सा है समाज का दायित्व इसी नाते से अगर हम ध्यान में करेंगे कि सरकार को कुछ काम करने वाले हैं, कुछ काम समाज को करने वाले हैं, अर्थात सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक संस्थाओं को और बहुत से काम जन जागरण के माध्यम से सामान्य जनता को करने हैं। एक विषय है चिकित्सा क्षेत्र का। ऐसा अनुमान कुछ शोध में आया है कि गत 10 वर्षों में 25 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से निकलकर बाहर आये, किंतु इसी समय में 16 प्रतिशत लोग केवल स्वास्थ्य कारणों से वापिस गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे चले गये। यदि हम एक विचार पर कार्य करें कि भारत के धार्मिक संस्थान, मंदिर, गुरुद्वारे, व अन्य केंद्र अपने साथ कम-से-कम एक बड़ा प्राथमिक चिकित्सा केंद्र चलाएं, ताकि देश भर की प्राथमिक चिकित्सा के क्षेत्र में कम से कम सरकार अथवा व्यवसायिक संस्थानों पर भारत की गरीब जनता की निर्भरता समाप्त हो। उसके अलावा भी देश भर में बड़े धार्मिक संस्थान मिलकर बड़े हॉस्पिटल भी चला सकते हैं। अभी कुछ मात्रा में चला भी रहे हैं। उदाहरण के तौर पर वैष्णो देवी ट्रस्ट, जम्मू अमृतसर का स्वर्ण मंदिर-गुरुद्वारा, व तिरुपति मंदिर आदि बड़ी मात्रा में ऐसे चिकित्सा के संस्थान चला भी रहे हैं। श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव, जग्गी वासुदेव, सत्य सांईबाबा, राधास्वामी अथवा कई अन्य संत पुरुष भी चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य कर ही रहे हैं। यदि इसको एक जन-आंदोलन बनाया जाए तो देश की चिकित्सा क्षेत्र, जो कि भारत में परंपरागत रूप से सेवा का क्षेत्र ही माना जाता था, उसमें इन धार्मिक संस्थानों के प्रवेश से व्यवसायीकरण समाप्त होगा। भारत की गरीब व सामान्य जनता को चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी राहत, इनके कारण से मिल सकेगी।  यही कुछ बात हम शिक्षा के क्षेत्र में भी कर सकते हैं। प्राथमिक चिकित्सा के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा भी। यह भारत की सामाजिक संस्थाओं अनिवासी भारतियों (NRI), औद्योगिक-सामाजिक दायित्व कोष (CSR) इत्यादि के माध्यम से हो। भारत में कभी भी शिक्षा व चिकित्सा, यह ना तो सरकार के हाथ में रहे हैं, ना ही व्यावसायिक संस्थानों या आज की भाषा में कहें मार्केट या कंपनियों के हाथों। इसलिए यदि सरकारों के करने के साथ-साथ हमारे सामाजिक संगठन भी आगे आएं तो देशभर का कम-से-कम प्राथमिक शिक्षा का क्षेत्र पूरी तरह से सब वर्गों, विशेषकर निम्न आयवर्ग के लिए सहायक हो सकेगा। आवश्यकता होने पर सरकार अथवा कमर्शियल आर्गेनाईजेशन सहयोग कर सकते हैं। ऐसा एक वातावरण हमें बनाना होगा।  पर्यावरण हितैषी रहा है भारतीय विकास माॅडल एक विषय पर्यावरण का भी है। यद्यपि दुनिया भर में जो प्रदूषण होता है, उसका सर्वाधिक चीन के द्वारा होता है 23 प्रतिशत। उसके बाद अमेरिका का नंबर है, 17 प्रतिशत। भारत तो केवल 4.5 प्रतिशत ही फैलाता है। जबकि भारत की आबादी दुनिया की आबादी का 17.6 प्रतिशत है, किंतु इस विषय में भारत की अपनी एक सोच है। हमारा विकास का मॉडल पर्यावरण हितैषी है। इसलिए हमें पर्यावरण के विषय में विशेष जिम्मेवारी भी निभानी होगी। किंतु इसे संगठित रूप से अथवा सरकारों पर ना छोड़ते हुए यदि एक अभियान लिया जाए कि भारत का हर व्यक्ति अपने जन्मदिन पर एक पेड़ लगायेगा अर्थात 132 करोड़ आबादी हर वर्ष यह कार्य करेगी, तो निश्चित रुप से बिना कोई बहुत बड़े संसाधन जुटाए, देश में करोड़ों पेड़ लगेंगे तथा उनकी सुरक्षा भी स्वभाविक रुप से वह व्यक्ति करेंगे।  बहुत से एनजीओ, स्वयंसेवी संगठन ऐसा कर भी रहे हैं। ऐसे ही नदियों को बचाने का विषय हो, अथवा स्वच्छता का या फिर भारतीय जीवन मूल्यों का प्रचार-प्रसार। प्रत्येक देश का दुनिया के लिए एक संदेश होता है। भारत की परिवार व्यवस्था अथवा अन्य नैतिक जीवन मूल्य, इनका देशभर में प्रसार-प्रचार करना यह भी रोजगारयुक्त स्वदेशी विकास मॉडल का अभिन्न हिस्सा होंगे। जब हम स्कूलों, कॉलेजों, गांवों, व बस्तियों में जाएं तो इन विषयों पर भी स्वाभाविक रूप से चर्चा करें। कुछ महापुरुषों के प्रेरणादायक वाक्य हमेशा हमारा मार्गदर्शन करते ही हैं। उदाहरण के तौर पर पंडित दीनदयाल जी का प्रमुख वाक्य ‘स्वदेशी व विकेंद्रीकरण ही भारत की आर्थिक समस्याओं के समाधान का मार्ग है’ं। इसी तरह उन्होंने कहा था ‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, यह भारत की योजनाओं का आधार बिंदु होना चाहिए’। राष्ट्ऱऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी कहा करते थे ‘सरकार नहीं, समाज रचना के केंद्र में जन संगठन होने चाहिए, तभी लोकतंत्र ठीक से कार्य करता है’। लोगों का स्तर, जन जागरूकता का स्तर, हमें खड़ा करना होगा, जिसका प्रभाव प्रदेश व केंद्र की सरकारों व उनकी नीतियों  पर पड़ेगा ही।  चीन का जो अभियान गत वर्ष स्वदेशी जागरण मंच ने लिया, उसमें देखा कि कैसे जन जागरूकता के कारण से केंद्र सरकार भी अपनी योजना बदलने को तैयार हो जाती है। विनोबा भावे जी कहा करते थे ‘जो अ-सरकारी है, वही असरकारी है’। इस रोजगार केंद्रित स्वदेशी विकास मॉडल के लिए विभिन्न प्रकार के जन-जागरूकता के कार्यक्रमों की रचना करनी चाहिए। समाज एकत्र होकर चिंतन करे, चर्चा करे और प्रबुद्ध वर्ग सामान्य जनता का मार्गदर्शन भी करे। इस दृष्टि से देश के अर्थशास्त्री, संपूर्ण देश के धार्मिक, सामाजिक संस्थाओं के अगुआ विचार करें, चिंतन करें और देश को पूर्णतया रोजगारयुक्त करते हुए एक विकसित भारत, एक सुरक्षित भारत, एक शक्तिशाली भारत, दुनिया को मार्ग दिखाने वाला भारत बनाने का संकल्प करें। इस चिंतन और उसके क्रियान्वन के लिए संपूर्ण देश में एक व्यापक चर्चा व कार्यक्रमों की रचना सोचनी चाहिए। हम सब लोग इस दिशा में विचार करें और एक बड़े राष्ट्रीय यज्ञ में उतरने के लिए तैयारी करें, इस समय पर इतना कहना ही पर्याप्त होगा। ु रोजगार समस्या-समाधान 10 बिंदुओं में 1. भारत के विभिन्न सर्वेक्षण, गांव के सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री तक, सबका मानना है कि भाारत की सर्वोच्च आवश्यकता ‘रोजगार’ है। क्यांेकि भारत दुनिया का 35.6 करोड़ युवा आबादी के साथ पहला देश है। हमारी आबादी दुनिया की 17.6 प्रतिशत है, दुनिया के 204 देशों में से निचले 141 देशों की आबादी के बराबर। भारत अपने आपमें एक विश्व। 2. इस समय 7.2 प्रतिशत विकास दर के साथ दुनिया में सबसे आगे। 2.6 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यस्था के साथ दुनिया में सातवें स्थान पर। 2028 तक अमरीका, चीन के बाद भारत होगा। महंगाई, बजट घाटा सब काबू में। 410 बिलियन डालर का फाॅरेन एक्सचेंज रिजर्व यानि रोजगार को छोड़कर बाकि मापदंड ठीक।  3. अभी हमारा रोजगार का 44-45 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र से आता है। लगभग 27-28 प्रतिशत विभिन्न स्तर की मैन्यूफैक्चरिंग से व 29-30 प्रतिशत सर्विस सेक्टर से आता है। भारत की कुल लेवर फोर्स इस समय 49.6 करोड़ है। 4. कुल प्रांतों व केंद्रीय सरकारों की नौकरियां, अर्द्धसरकारी व बड़ा उद्योग जगत मिलाकर 3 करोड़ 42 लाख 60 हजार है। अर्थात केवल 7 प्रतिशत ही संगठित क्षेत्र की नौकरियां हैं। बाकि 93 प्रतिशत तो कृषि, रिटेल व स्वरोजगार का असंगठित क्षेत्र ही है। 5. भारत के पास 14.8 करोड़ हैक्टेयर कृषि भूमि है, जो दुनिया में सर्वाधिक है। लगभग 21-22 करोड़ लोग कृषि व अन्य गतिविधियों जैसे पशुपालन, मछली पालन, बागवानी आदि में लगे रहते हैं। किंतु उनकी आय कम होने से वे शहरों की तरफ पलायन करते हैं। उनकी आय को 2025 तक तिगुना करने से 44-45 प्रतिशत रोजगार स्थिर हो जायेगा। 6. लघु व कुटीर उद्योग, क्योंकि दूसरा बड़ा रोजगार का क्षेत्र है, वहां 1430 वस्तुओं की आरक्षित निर्माण का विलोप होने से समस्याएं बढ़ गई है, उसे बहाल करना चाहिए। घर-परिवार में केवल स्वदेशी खरीद से भी बहुत फर्क पड़ेगा। 7. जैसा कि अमरीका में बाय ‘अमेरिकन एक्ट 1933’ बनाया गया है, जिसके अंतर्गत अमरीका सरकार की खरीदी व प्रोजेक्टों में अमरीकन कंपनियों को प्राथमिकता देना अनिवार्य है, उसी तरह भारत में भी जीएफआर (General Financial Rules) है। किंतु अभी यह बहुत कमजोर है। इसके अंतर्गत सरकार की 80 प्रतिशत खरीद भारतीय कंपनियों, विशेषकर लघु उद्योगों द्वारा अनिवार्य किया जाना चाहिए। 8. उद्यमिता व स्वरोजगार, यह भारत जैसे देश के लिए रोजगार का राजमार्ग है। हमारे युवाओं का उद्यमिता के अनुरूप DNA (स्वभाव) है, वह परिश्रमी है। अतः 'Don't be job seeker, Be job provider' सबका दिशा सूचक विचार बनना चाहिए। 9. शिक्षा व स्वास्थ्य में रोजगार व समृद्धि के आधार स्तंभ हैं। इनमें सरकारों के साथ-साथ समाजसेवी संस्थाओं, धार्मिक संस्थानों व व्यक्तियों, CSR, NRI फंड आदि को सेवाभाव से प्राथमिक शिक्षा व स्वास्थ्य में निवेश करना चाहिए। जिससे सबको अच्छी शिक्षा व चिकित्सा सेवा सस्ते में उपलब्ध हो। अभी हर 10 वर्ष में 25 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से बाहर आते हैं, किंतु केवल स्वास्थ्य कारणों से 16 प्रतिशत लोग वापिस गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। 10. भारत को पर्यटन, योग, पंचगव्य, सौर ऊर्जा व अन्य वैकल्पिक ऊर्जा, स्वच्छता व पर्यावरण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ये Sun rise areas हैं, रोजगार व समृद्धि के। मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी ! मर जाऊं तो भी मेरा - होए कफन स्वदेशी !! चट्टान टूट जाए, तूफान घुमड़ के आए ! गर मौत भी पुकारे, तो भी लक्ष्य हो स्वदेशी !! मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी... जो गाँव में बना हो, और गाँव में खपा हो ! जो गाँव को हँसाए , जो गांव को बसाए ! वह काम है स्वदेशी, वह नाम है स्वदेशी !! मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी... जो हाथ से बना हो, या गरीब से लिया हो ! जिसमें स्नेह भरा हो, वह चीज है स्वदेशी !! मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी... मानव का धर्म क्या है, मानव का दर्द जाने ! जो करे मनुष्यता की, रक्षा वही स्वदेशी !! मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी... करें शक्ति का विभाजन, मिटें पूँजी का ये शासन ! बने गाँव स्वावलम्बी, वह नीति है स्वदेशी !!  मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी ... तन में बसन स्वदेशी, मन में लगन स्वदेशी ! फिर हो भवन - भवन में, विस्तार हो स्वदेशी !! मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी, मर जाऊं तो भी मेरा - होए कफन स्वदेशी... रोजगार सृजन हेतु समाज द्वारा  करणीय पांच कार्य 1. क्यूंकि सर्वाधिक रोजगार लघु, कुटीर व मध्यम उद्योगों से प्राप्त होता है, अतः हम सबको चाहिए कि घर-परिवार, दुकान, दफ्तर में प्रयोग होने वाली प्रत्येक वस्तुएं ‘केवल स्वदेशी उत्पाद’ ही खरीदें। बहुराष्ट्रीय व बाहरी कंपनियां तो केवल हमारे देश का पैसा व रोजगार ही बाहर ले जाती है। शून्य तकनीक व रोजमर्रा की जरूरत वाली सब वस्तुएं भारतीय कंपनियां पर्याप्त मात्रा व उचित मूल्य पर बनाती ही है। 2. ग्रामीण क्षेत्रों में अपने बंधु कृषि का लागत मूल्य कम करने के विविध उपाय जैसे शून्य बजट खेती, नेचुरल खेती, गौमूत्र, केंचुआ खाद आदि करने चाहिए। कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्द्धन की प्रक्रिया व किसान की आय को तिगुना करने हेतु एफपीओ (Farmer Producers Organisation) को मजबूत करना व तैयार माल की बिक्री तथा सुविधाओं हेतु मार्किट प्लेस व साधन तंत्र तेजी से विकसित करना। इस हेतु जन-जागरण भी करें। 3. उद्यमिता, यह युवकों की सोच बनें। अतः 'Don't be job secker, be job provider' के उद्घोष वाक्य को हर विद्यालय/महाविद्यालय/विश्वविद्यालय में प्रचलित करने व उस अनुरूप प्रेरक सफल गाथाओं की चर्चा करने की प्रक्रिया सब तरफ खड़ी करना। 4. सामाजिक व धार्मिक संगठनों/व्यक्तियों को प्राथमिक शिक्षा एवं प्राथमिक चिकित्सा हेतु आगे आना चाहिए। मंदिरों, गुरूद्वारों, सेवा ट्रस्टों, एनआरआई, सीएसआर आदि का प्रयोग निम्न आयवर्ग की शिक्षा व चिकित्सा हेतु होना चाहिए। 5. स्किल इंडिया, स्टेंड-अप इंडिया, स्टार्ट-अप, डिजिटल इंडिया आदि योजनाएं रोजगार सृजन के लिए अच्छा प्रयास है। परंतु ऐसी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन हेतु समाज की पूर्ण सहभागिता को सुनिश्चित करने वाले कदम उठाने की पहल करना। --  Suraj Bhardwaj 9899225926 -- Suraj Bhardwaj 9899225926 Rojgarparak (Book).pdf 545K View as HTML Scan and download

Thursday, April 13, 2017

DATA TO REMEMBER 3

DATA TO REMEMBER 3
असमानता पर एक लेख
१. 2016 स्विट्जरलैंड के बर्फीले नगर दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक की पूर्व संध्या पर ब्रिटेन की संस्था ऑक्सफाम ने एक रिपोर्ट जारी की, जिससे पूरी दुनिया में हंगामा मच गया. पहली बात कि 'iएन इकोनॉमी फॉर दी 1%’ नामक इस रिपोर्ट में बताया गया है कि आज महज बासठ खरबपतियों की संपत्ति 17.6 खरब डॉलर (1187.64 खरब रुपए) है, जो विश्व की आधी आबादी की दौलत के बराबर है। दूसरी कि, एक प्रतिशत अमीरों के पास शेष निन्यानबे फीसद जनसंख्या के बराबर दौलत है। तीसरी बात और भी अजीब कि पिछले पांच साल में जहां ‘सुपर रिच’ तबके की संपत्ति में चौवालीस फीसद इजाफा हुआ है, वहीं दुनिया के 3.6 अरब लोगों की संपत्ति इकतालीस प्रतिशत घट गई। चौथी जो सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन धन्नासेठों के पास जो धन-दौलत है, वह दुनिया के 118 देशो के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बराबर है। मतलब की मंदी अगर पड़ी है तो ग़रीबों की लिए क्योंकि अमीर और ज़्यादा अमीर हुए और ग़रीब लगातार ग़रीब। इसके लिए पाँचवा आँकड़े को देखना चाहिए। वर्ष 2010 में 388 अमीरों की संपत्ति दुनिया की आधी आबादी की कुल दौलत के बराबर थी, जबकि 2011 में उनकी संख्या घट कर 177, 2012 में 159, 2013 में 92, 2014 में 80 और 2015 में 62 रह गई। विकास का ये मॉडल है ज़िम्मेवार : इस सच से अब कोई इनकार नहीं कर सकता कि विकास की मौजूदा डगर पर चलने से ही गरीब-अमीर के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। किताबों se जब जी भर जाए तो, Sadak ko भेजे पढ़ लेना चाहिए, Kitabon se jab pet bhar jaye to Sadak ko bhee jarआ pad Lena chahiye, Kyonki kuchh Jinda chapters aise bhee hote haen. Jinke liye majhab, philosophy ka matlab, Sirf do vakt Ki Roti hota Hae, Sapno se jab jee bhar jaye yo, Saamne bhee dekh Lena chahiye kyonki, Kuchh aisle bhee khyalaat hae jinke liye, Gaane bajane, taraane ka matlab, Sirf Do vakt ki Roti hota hae.
2015,oxfam report, an economy for 1%, 62 kharabpati = 50 % of world GDP = 118 Desh GDP 2010, 388, 11,177, in 12, 159, 13- 92, 14 - 80

2. . भारत में आम धारणा यही है कि देश के बाहर जाने वाले काले धन का मुख्य स्रोत नेताओं या बड़े सरकारी अफसरों को मिलने वाली रिश्वत, घरेलू व्यापारियों द्वारा इनवाइस में हेरा-फेरी से होने वाली दो नंबर की कमाई या हवाला कारोबार से उपजा पैसा है, लेकिन काले धन पर ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी (जीएफइ) की ताजा रिपोर्ट पढ़ने के बाद यह भ्रम टूट जाता है। जीएफइ की गत दिसंबर में जारी रिपोर्ट- ‘इलिसिट फाइनेंशियल फ्लो फ्रॉम डेवलपिंग कन्ट्रीज: 2004-2013’ के अनुसार उक्त अवधि में भारत से करीब 400 खरब रुपए की काली कमाई बाहर गई और यह सारा धन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का है। इसमें एक इकन्नी भी नेताओं, सरकारी अफसरों, घरेलू व्यापारियों या हवाला कारोबारियों की नहीं है। हां, अगर जीएफइ के घोषित काले धन में उनका नंबर दो का पैसा जोड़ दिया जाए, तो आंकड़ा और ऊंचा हो जाएगा। हर साल खातों में हेरा-फेरी कर भीमकाय एमएनसी भारी कर चोरी करती हैं और फिर यह पैसा बाहर भेज देती हैं। विदेशी बैंकों में जमा कुल काले धन में एमएनसी की हिस्सेदारी 83.4 फीसद है। भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अनुसार सन 2000 से 2015 के बीच देश को कुल 399.2 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) मिला, जबकि 2004-13 में काले धन के रूप में 510 अरब डॉलर बाहर चले गए। इस प्रकार महज दस बरस के भीतर भारत को 112.8 अरब डॉलर का घाटा हुआ। यह एक आंकड़ा ही एफडीआइ की चमक की पोल खोलने को काफी है। ३. काला धन देशों के क़र्ज़ से भी ज़्यादा: टैक्स जस्टिस नेटवर्क (टीजेएस) ने निम्न और मध्य आयवर्ग के 139 देशों का अध्ययन किया, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। वर्ष 1970 और 2010 की बीच की अवधि में विदेशी निवेश करने वाली बड़ी कंपनियों ने जिस देश में जितना धन लगाया, उससे कहीं अधिक कमा कर बाहर भेजा। सन 2010 में इन राष्ट्रों के मुट््ठी भर आभिजात्य वर्ग के पास 70.3 से लेकर 90.3 खरब डॉलर (4682-6014 खरब रुपए) की अघोषित दौलत थी, जबकि कर्ज की रकम 40.8 खरब डॉलर (2717 खरब रुपए) थी। मतलब यह कि अंगुलियों पर गिने जाने वाले धन्ना सेठों के पास पूरे देश पर चढ़े कर्जे से अधिक काला धन था

3. Corporatocracy and Perkins:  Mallaby, who spent 13 years writing for the London Economist and wrote a critically well-received biography of World Bank chief James Wolfensohn,[4] holds that Perkins' conception of international finance is "largely a dream.He also disputes Perkins' claim that 51 of the top 100 world economies belong to companies. A value-added comparison done by the UN, he says, shows the number to be 29. (The 51 of 100 data comes from an Institute for Policy Studies Dec 2000 Report on the Top 200 corporations; using 2010 data from the CIA's World Factbook and Fortune Global 500 the current ratio is 114 corporations in the top 200 global economies.).

4. Jobless corporate growth A study [July 2013] by Credit Suisse Asia Pacific India Equity Research Investment Strategy revealed that after more than two decades of economic liberalisation, the share of the formal sector, (namely the public and private corporate sectors together) in national GDP stood at just 15 per cent and that of listed corporates was just 5 per cent. Despite all the pampering by the government and economists, the formal sector's share of the nation’s GDP improved by just 3 per cent in more than two decades. In this period, the sector had received foreign investment by debt and equity of over $550 billion and also drew over Rs 18 lakh crore from banks as credit. But how many jobs did it add in this period? Believe it, just 2.8 million! Economists would never mention the huge investment into the formal sector nor the insignificant number of jobs added by it, so that they need not answer either why it produced such jobless growth or ask who else provided the jobs. When I brought this to his notice, a shocked N R Narayanamurthy told me that as the software sector itself had added 3.5 million jobs, it meant that the rest of the corporate sector had actually cut jobs by over 700,000, rather than adding any. Did any economist or prime minister ever speak this hard truth that the big corporates do not provide jobs to the people? Prime Minister Narendra Modi spoke this truth when he unveiled the Mudra finance scheme to the non-corporate sector on April 9, 2015. He said: “People think it’s big industries and corporate houses that provide higher employment. The truth is, only 12.5 million people are employed by big corporates, against 120 million by MSME sector.” He reiterated it when he wrote to small businessmen on April 15, 2015. Unfunded job rich sector And where from then did the jobs and people’s livelihood come? The Credit Suisse study says that 90 per cent of the total of 474 million jobs in India is generated by the non-corporate sector which contributes half the national GDP. The study labels this sector in the global language as the informal sector. But it adds that unlike in the West, where the informal sector is largely an illegal sector, in India it is legal business which remains informal only because the government has been unable to reach out to it. The Economic Census (2013-14) says that some 57.7 million non-farming and non-construction businesses yield 128 million jobs. The census classifies them as Own Account Enterprises (OAEs), implying it is self-employment. The census finds that over 60 per cent of OAEs are run by entrepreneurs belonging to Other Backward Castes, Scheduled Castes and Scheduled Tribes; more than half the OAEs and as many jobs provided by them are in rural areas; and nine out of 10 OAEs are unregistered. But this sector, which ensures both social justice and is rich in generating jobs, gets just 4 per cent of its credit needs from the formal banking system and the rest at usurious rates of interest. Here is a paradox. The banks fund corporates which add very little jobs. They are unable to fund the OAEs which generate ten times the jobs the corporates provide. Citing the Credit Suisse study, The Economist magazine (August 2013) wrote that the best way the Indian informal economy may be formalised is to provide formal finance to them. The capital employed in the 57.7 million units is about Rs 11.4 lakh crore, according to the Economic Census. This informal (cash) financing takes place outside the formal monetary system supervised by the Reserve Bank. The Mudra finance scheme is based on the experience that banks cannot fund this sector. It has devised an innovative method of associating existing large Non Banking Finance Companies providing finance to this sector as National and State Level Coordinators and the small ones as Last Mile Lenders. Without co-opting the existing non-formal finance players, the OAEs cannot be funded.

5. MBA करने के बाद कितने छात्रों को मिलती है नौकरी, : अप्रैल 27, 2016  रकम लेकर एमबीए ग्रेजुएट तैयार कर रहे ज्यादातर बिजनेस स्कूलों से बेरोजगारों और अर्धबेरोजगार 'पेशेवरों' की खेप दर खेप निकल रही हैं। उद्योग मंडल 'एसोचैम' के एक ताजा अध्ययन में किए गए महत्वपूर्ण सर्वेक्षण में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। १. पहली बात कि एसोचैम की एजुकेशन कमेटी द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश में चल रहे 5500 बिजनेस स्कूलों में से सरकार द्वारा संचालित भारतीय प्रबंध संस्थानों तथा कुछ मुट्ठी भर संस्थाओं को छोड़कर बाकी सभी इदारों से डिग्री लेकर निकलने वाले ज्यादातर छात्र-छात्राएं कहीं भी रोजगार पाने के लायक नहीं हैं। आलम यह है कि एमबीए की डिग्री रखने वाले बड़ी संख्या में लोग 10 हजार रुपये से कम की पगार पर नौकरी कर रहे हैं, जो अर्धबेरोजगारी की निशानी है। २. महज 7% छात्र-छात्राएं ही रोजगार : , सर्वे में इन बिजनेस स्कूलों के स्तर में गिरावट पर चिंता जाहिर करते हुए बताया गया है कि उनमें से अनेक संस्थानों का समुचित नियमन भी नहीं हो रहा है और आईआईएम संस्थानों से निकलने वाले छात्र-छात्राओं को छोड़ दें तो बाकी स्कूलों और संस्थानों से पढ़कर निकलने वाले पेशेवरों में से केवल सात प्रतिशत छात्र-छात्राएं ही रोजगार देने योग्य बन पाते हैं। ३. कैंपस रिक्रूटमेंट में भी 45% तक की भारी गिरावट सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले दो वर्षों के दौरान दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, मुंबई, कोलकाता, बेंगलूर, अहमदाबाद, लखनऊ, हैदराबाद, देहरादून इत्यादि शहरों में करीब 220 बिजनेस स्कूल बंद हो चुके हैं। इसके अलावा कम से कम 120 ऐसे संस्थान इस साल बंद होने की कगार पर हैं। शिक्षा की निम्न गुणवत्ता और आर्थिक मंदी की वजह से वर्ष 2014 से 2016 के बीच कैम्पस रिक्रूटमेंट में भी 45 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई है। ४. बिजनेस स्कूलों की संख्या तीन गुना बढ़ी रावत ने कहा कि पिछले पांच साल के दौरान देश में बिजनेस स्कूलों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है। वर्ष 2015-16 में इन स्कूलों में एमबीए पाठ्यक्रम के लिए कुल पांच लाख 20 हजार सीटें उपलब्ध थीं। वर्ष 2011-12 में यह संख्या तीन लाख 60 हजार थी। उन्होंने कहा कि गुणवत्ता नियंत्रण तथा मूलभूत ढांचे की कमी, कैम्पस प्लेसमेंट के जरिये कम वेतन वाली नौकरियां मिलना और योग्य शिक्षकों की कमी की वजह से भारत में बिजनेस स्कूलों की दुर्दशा है। ज्यादातर बिजनेस स्कूलों में शिक्षा के स्तर को उन्नत करने तथा मौजूदा वैश्विक परिदृश्य के अनुसार शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की जरूरत नहीं महसूस की जाती है। इसकी वजह से उनमें पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम व्यर्थ साबित होते हैं। ५. 20 से 30% इंजीनियरिंग ग्रेजुएट को रोजगार नहीं मिलता सर्वेक्षण के मुताबिक, एमबीए के दो साल के पाठ्यक्रम के लिए हर छात्र आमतौर पर तीन से पांच लाख रुपये खर्च करता है, लेकिन शीर्ष 20 बिजनेस स्कूलों और संस्थानों को छोड़कर बाकी इदारों से पढ़कर निकलने वाले ज्यादातर पेशेवरों को मात्र आठ से 10 हजार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर काम करना पड़ रहा है। रावत ने कहा कि भारत में बिजनेस क्षेत्र की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बेहद खराब है और वह कॉरपोरेट जगत की जरूरतों को सामान्यत: पूरा नहीं कर पाती है। उन्होंने कहा कि देश में हर साल 15 लाख इंजीनियरिंग ग्रेजुएट पढ़कर निकलते हैं और उनमें से 20 से 30 प्रतिशत को रोजगार नहीं मिलता। इसके अलावा बड़ी संख्या में इंजीनियर्स को उनकी अर्जित योग्यता के अनुरूप नौकरी नहीं मिल पाती

6. KOFI ANNAN'S Astonishing Facts! THE HAVES -- The richest fifth of the world's people consumes 86 percent of all goods and services while the poorest fifth consumes just 1.3 percent. Indeed, the richest fifth consumes 45 percent of all meat and fish, 58 percent of all energy used and 84 percent of all paper, has 74 percent of all telephone lines and owns 87 percent of all vehicles. . COSMETICS AND EDUCATION -- Americans spend $8 billion a year on cosmetics -- $2 billion more than the estimated annual total needed to provide basic education for everyone in the world. THE HAVE NOTS -- Of the 4.4 billion people in developing countries, nearly three-fifths lack access to safe sewers, a third have no access to clean water, a quarter do not have adequate housing and a fifth have no access to modern health services of any kind. ICE CREAM AND WATER -- Europeans spend $11 billion a year on ice cream -- $2 billion more than the estimated annual total needed to provide clean water and safe sewers for the world's population. PET FOOD AND HEALTH -- Americans and Europeans spend $17 billion a year on pet food -- $4 billion more than the estimated annual additional total needed to provide basic health and nutrition for everyone in the world. $40 BILLION A YEAR -- It is estimated that the additional cost of achieving and maintaining universal access to basic education for all, basic health care for all, reproductive health care for all women, adequate food for all and clean water and safe sewers for all is roughly $40 billion a year -- or less than 4 percent of the combined wealth of the 225 richest people in the world.

7.