Saturday, May 28, 2016

भोपाल राष्ट्रीय परिषद् में पारित प्रस्ताव

Resolution 1 ई-कामॅर्स और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों एवं खाद्य मार्केटिंग में विदेशी निवेश वापिस हो!  स्वदेशी जागरण मंच की राष्ट्रीय परिषद सरकार द्वारा ई-कॉमर्स और खाद्य प्रसंस्करण एवं खाद्य वस्तुओं के विपणन में विदेशी निवेश को अनुमति के लिए क्षोभ एवं विरोध प्रकट करती है। ज्ञात हो कि ई-कॉमर्स में कई विदेशी कंपनियां लंबे समय से गैर कानूनी रूप से कार्यरत है।  स्वदेशी जागरण मंच सरकार को निरंतर चेतावनी देता रहा है कि विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां और विदेशी पूंजी प्राप्त पूर्व में भारत में निर्मित कंपनियां अपनी आर्थिक शक्ति का दुरूपयोग करते हुए, हिंसक कीमत नीति के माध्यम से (देश से थोक और खुदरा दोनों प्रकार के) छोटे-बडे व्यापारियों, पुस्तक विक्रेंताओं, दवा विक्रेताओं और ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों को प्रतिस्पर्धा से बाहर करने का काम कर रही हैं। ई-कॉमर्स में विदेशी निवेश कानूनी रूप से प्रतिबंधित रहा है, लेकिन नियमों को ताक पर रखकर ई-कॉमर्स कंपनियों को कार्य करने दिया जा रहा है। यह कहा गया है कि विदेशी कंपनियां वास्तव में ई-कॉमर्स कर ही नहीं रही हैं, वे तो केवल ‘मार्केट प्लेटफार्म’ उपलब्ध करा रही हैं और विक्रेताओं को अपनी वेबसाइटों के माध्यम से सामान बेचने का अवसर दे रही हैं।  स्वदेशी जागरण मंच ने हमेशा से ही कहा है कि चूंकि यह कंपनियां अपनी आर्थिक शक्ति के बलबूते, भारी छूट (डिस्काउंट) देती हैं और कई मामलों में स्टॉक भी करती हैं, इसलिए यह कहना कि ये कंपनियों ई-कॉर्मस नहीं करती हैं, वास्तव में सही नहीं हैं। गैर कानूनी रूप से काम करने वाली ई-कॉमर्स कंपनियां टैक्स चोरी भी करती रही हैं, जिसके संबंध में कई मामलों में जांच भी चल रही हैं। इस बारे में सरकार से अपेक्षा थी कि वह इनको प्रतिबंधित करेगी। लेकिन दुर्भाग्य है कि सरकार ने अब इन विदेशी कंपनियों को मान्यता देते हुए ई-कॉमर्स में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमति प्रदान कर दी है। यानि कानून तोडने वालों को पुरस्कृत किया गया है, यह उचित नहीं है।  हालांकि सरकार का कहना है कि ई-कॉमर्स में विदेशी निवेश को अनुमति केवल ‘मार्क्रेट प्लेटफॉर्म’ मॉडल के लिए है और कंपनियों को छूट देकर कीमतों को प्रभावित करने के लिए रोक लगाई गई है। लेकिन स्वदेशी जागरण मंच का यह मानना है कि इस संबंध मेंं विदेशी कंपनियों के लिए ई-कॉमर्स कंपनियों को नियंत्रित करने के प्रावधान नहीं हैं।  सर्वविदित है कि स्वदेशी जागरण मंच के कार्यकर्ताओं के प्रयास से खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के विरोध में एक राष्ट्रीय आंदोलन खडा हुआ और उसके चलते धोखे से संसद में कानून पारित होने के बावजूद कोई बड़ा विदेशी निवेश खुदरा क्षेत्र में नहीं हो पाया। स्वदेशी जागरण मंच की राष्ट्रीय परिषद यह स्मरण करवाना चाहती है कि वर्तमान में केन्द्र में एन.डी.ए. सरकार नेतृत्व कर रही है,  भारतीय जनता पार्टी ने खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया था और अपने चुनाव खोषणा पत्र में भी यह वादा किया था कि सत्ता में आने के बाद विदेशी निवेश को अनुमति देने वाले कानून को बदला जायेगा। लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि कानून को तो बदला नहीं गया, लेकिन खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) में विदेशी निवेश आकृष्ट करने के नाम पर खाद्य प्रसंस्करण और देश में उत्पादित खाद्य पदार्थों के विपणन में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमति प्रदान कर दी है।  सरकार का यह कदम न केवल लघु-कुटीर क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के लिए घातक सिद्ध होगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार निर्माण के महत्वपूर्ण अवसर को भी गंवा देगा। वास्तव में यदि सरकार ग्रामीण क्षेत्र में किसानों की आमदनी को दुगना करना चाहती है तो उसके लिए ग्रामीण स्तर पर विकेन्द्रित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने होंगे और गांवों में ही रोजगार का निर्माण करना होगा। यही नहीं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और खाद्य मार्केटिंग में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमति, खाद्य पदार्थों में एकाधिकार को बढ़ावा देगा। स्वदेशी जागरण मंच की यह राष्ट्रीय परिषद मांग करती है देश में छोटे व्यापारियों, लघु उद्योगों और किसानों के हितों के संरक्षण हेतु सरकार ई-कॉमर्स, खाद्य प्रसंस्करण अैर मार्केटिंग में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमति देने वाले अपने निर्णयों को वापिस ले। स्वदेशी जागरण मंच की यह राष्ट्रीय परिषद सरकार को चेतावनी देती है कि वह इस प्रकार के निर्णयों से बचे। राष्ट्रीय परिषद अपने सभी सहयोगी संगठनों सहित सभी कार्यकर्ताओं का आवाह्न करती है कि सरकार के इन निर्णयों के विरोध में व्यापक जन जागरण करें। Resolution-2 सस्ती दवाओं व चिकित्सा सेवाओं से चिकित्सा की सर्व सुलभता आवश्यक देश में जीवन शैली जन्य रोगों सहित विविध रोग अत्यन्त तीव्र गति से बढ़ रहे हैं। सभी प्रकार के रोगों के सकल वैश्विक रोग भार (World's disease burden) का 21 प्रतिशत भारत पर है। लेकिन, देश में चिकित्सा सेवाओं की अपर्याप्तता और चिकित्सा सुविधाओं के महंगा होने कारण बड़ी संख्या में लोगों को चिकित्सा सुलभ नहीं हो पा रही है। देश में रोकथाम योग्य रोगों (Preventable illness) व उनसे होने वाली असामयिक मृत्यु की बढ़ती घटनाओं के कारण ही प्रतिवर्ष 6 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की क्षति हो रही है, जिसका मूल्य 9-10 लाख करोड़ रूपये वार्षिक से भी अधिक है। वस्तुतः चिकित्सा पर सार्वजनिक व्यय आज हमारे घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत से कम है। यह विश्व के अन्य प्रमुख देशों की तुलना में सबसे 5 प्रतिशत के वैश्विक माध्य Global Median  से अत्यन्त कम है। इसलिये बड़ी संख्या में रोगियों व उनके परिजनों को ही चिकित्सा लागत का बड़ा भाग वहन करना पड़ता है। परिणामतः विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज देश में ऊँची चिकित्सा लागतों के कारण प्रतिवर्ष 2.2 प्रतिशत लोग निर्धनता रेखा से नीचे जा रहे हैं एवं बड़ी संख्या में परिवार ऋणग्रस्त होते जा रहे हैं।  देश की जन-स्वास्थ्य सांख्यिकी के अनुसार आज देश में जीवन शैली जन्य रोग यथा उच्च रक्त चाप, हृदयावरोध, श्वास रोग, मस्तिष्कगत रक्तस्राव जन्य पक्षाघात, मलाशय का कैंसर, मधुमेह, गठिया, मोटापा, निद्रानाश, स्मृतिनाश, स्वलीनता, नशावृत्ति आदि अनेक रोग व मनोविकार तेजी से बढ़े हैं। देश में प्रतिवर्ष 58 लाख लोगों की मृत्यु हृदय व फेफड़े के रोगों, टाइप 2 के मधुमेह व कैंसर जैसे असंक्रामक रोगों से हो रही हैं, जिनकी रोकथाम संभव है। देश आज विश्व की हृदय रोग, मधुमेह, गठिया आदि की राजधानी कहलाने लगा है। आज देश में 6.13 करोड़ मधुमेह के रोगी है और 11.1 प्रतिशत पुरूषों व 10.8 प्रतिशत महिलाओं में रक्त शर्करा (ब्लड शूगर) अत्यंत बढ़ी हुयी है। भारत में उच्च रक्त शर्करा वाले लोगों का यह अनुपात पड़ौसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश व नेपाल आदि से भी उच्च है। हृदय रोग तो आज देश में महामारी की सीमा तक बढ़ता जा रहा है।  देश की अधिकांश चिकित्सा सुविधायें, चिकित्सकों की उपलब्धता एवं विशेषज्ञों की सुलभता आदि बड़े नगरों में ही केन्द्रित हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में उपलब्ध सुविधाओं का भी सुचारू संचालन नहीं होने से देश के अधिकांश क्षेत्रों में प्रभावी चिकित्सा की यथेष्ट सुलभता नहीं है। इसलिये नगरीय क्षेत्र में लगभग 70 प्रतिशत व ग्रामीण क्षेत्र के 63 प्रतिशत लोगों को चिकित्सा हेतु निजी क्षेत्र पर निर्भर रहना पड़ता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 53 प्रतिशत लोग सार्वजनिक क्षेत्र की चिकित्सा सेवाओं से असन्तोष के कारण निजी क्षेत्र की सेवाओं का उपयोग करने को बाध्य होते हैं। विगत दस वर्षों में औसत चिकित्सालयीन व्यय (average hospitalization costs) लगभग 3 गुनी हुयी है। यह प्रचलित मुद्रास्फीति से कहीं अधिक है। चिकित्सा लागत में वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारण, आवश्यक दवाओं में कीमत नियंत्रण का अभाव है। पिछली सरकार के शासनकाल में आवश्यक दवाओं की कीमतों में नियंत्रण को निष्प्रभावी बना दिया गया था। स्वदेशी जागरण मंच की यह राष्ट्रीय परिषद सरकार से मांग करती है कि आवश्यक दवाओं में लागत आधारित की कीमत नीति को बिना देरी लागू करे। एक ओर सरकारी खर्च में कमी से स्वास्थ्य सेवाओं में निजीकरण के कारण चिकित्सा लागत बढ़ी है, तो दूसरी ओर सरकारी नीतियों पर विदेशी कंपनियों के प्रभाव के कारण, अनावश्यक टीकाकरण को बढ़ावा मिला है, जिससे आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं में कटौती हो रही  है।  देश में प्रति हजार जनसंख्या पर सार्वजनिक क्षेत्र में 1 शैय्या की उपलब्धता भी नहीं है। श्रीलंका में प्रति हजार जनसंख्या पर सार्वजनिक क्षेत्र में 3.1 चिकित्सालय शायिकायें (hospital beds) हैं, चीन में 3, थाईलैण्ड में 2.2, ब्राजील में 2.4, अमेरिका में 3.1 इंग्लैण्ड में 3.9 है। भारत में यह मात्र 0.95 है जो विश्व के प्रमुख देशों में न्यूनतम है। इस संबंध में विश्व औसत 2.9 है। देश में प्रति दस हजार जनसंख्या पर 7 ऐलोपेथी चिकित्सक ही उपलब्ध है। कुछ राज्यों में तो प्रति चिकित्सक रोगी अनुपात 27 से 28 हजार तक आता है। यथा महाराष्ट्र में प्रति चिकित्सक रोगी अनुपात 27,790 व बिहार में 28,391 है। देश में पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों का भी व्यापक चलन है। इसलिये प्रभावी स्वास्थ्य व चिकित्सा व्यवस्था की दृष्टि से सभी चिकित्सा प्रणालियाँ का समेकित व समन्वित विकास आवश्यक है।  वर्ष 2005 में पेटेंट कानून में परिवर्तन से अब 1995 के बाद की आविष्कृत औषधियाँ उत्पाद पैटेंट प्रावधानों के कारण अत्यंत महंगी होती जा रही है। हमारे पेटेंट कानून का पुनः मानवोचित सिद्धान्तों के अनुरूप संशोधित किया जाना चाहिये। महंगी दवाओं के उत्पादन हेतु स्वतः अनिवार्य अनुज्ञापन के प्रावधान किये जाने चाहिये। साथ ही जेनेरिक औषधियों को प्रोत्साहन, उनके प्रभावी मूल्य नियंत्रण व उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने हेतु नियमित परीक्षण की आवश्यक है। वर्ष 2004 तक उत्पाद पेटेंट के स्थान पर प्रक्रिया पेटेंट के प्रावधान होने से ही देश विश्व की फार्मेसी कहलाता है।   स्वदेशी जागरण मंच का मानना है कि चिकित्सा के मद पर केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के साथ-साथ चिकित्सा सेवाओं का दूरस्थ व ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार किया जाना एवं उनका वहाँ सुचारू संचालन आवश्यक है। महिला स्वास्थ्य, शिशु व जननी स्वास्थ्य व वरिष्ठजनों सहित सभी वर्गों को सब प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएँ न्यायपूर्वक एवं सहजता से उनके निकटतम स्थान पर सुलभ होनी चाहिये। साथ ही देश में सभी प्रकार के चिकित्सा उपकरण, विविध प्रत्यारोपित की जाने वाली चिकित्सा सामग्रियों व उपभोग में आने वाली सामग्रियों के मूल्य बहुत ऊँचे हैं। चिकित्सा हेतु उनके भारी व विभेदकारी मूल्य और जाँचों की ऊँची लागतें भी नियंत्रित की जानी आवश्यक हैं। मंच सरकार से आग्रह करता है कि सभी  प्रणालियों की औषधियों के प्रमापीकरण, गुणवत्ता परीक्षण मूल्य नियंत्रण एवं सर्वसुलभता के लिये उचित वैधानिक, नीतिगत, प्रक्रियागत एवं नियामक व्यवस्थागत सुधार व उनमें पारदर्शिता लानी आवश्यक है। समर्थ, सक्षम व समृद्ध भारत के निर्माण हेतु सभी नागरिकों का निरामय होना आवश्यक है। इस हेतु जहाँ एक ओर प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्यप्रद आहार-विहार व जीवन शैली अपनाने पर ध्यान देना चाहिये वहीं आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक नागरिक को समुचित उपचार सहजता से निःशुल्क व न्यायपूर्वक या उसके द्वारा वहन करने योग्य शुल्क पर सुलभ होना चाहिये। Resolution-3 Development for Survival   Global warming is no longer a purely academic issue to be discussed at only national and global scientific communities.  The wolf is at our door steps. India is witnessing historically high temperature not witnessed in the last 100 years. The temperature at different parts of the country varies from a minimum of 400C and a maximum of 500C during April-May 2016. This scorching heat is associated with severe to very severe drinking water problem resulting in the spread of water related Diseases. The scorching heat has also resulted in withering away of standing crops, putting the farming community to further misery and hopelessness. Another worrying aspect of the heat surge is the widespread forest fire which has destroyed nearly 6000 acres of valuable forest  in Uttrakhand and else where in the country. Global warming has attacked the country this year severely. We must remember that these, climate change events are not one off events as in the previous decades. But they are part of a long term trend called global warming. We have to be prepared for even more devastating climatic events in the years to come. In these life threatening circumstances, Swadeshi Jagran Manch urges the government, to tackle global warming and climate change with all the seriousness it deserves. 1.    Give immediate and top priority for conservation of water, such as rejuvenation of our tanks and other water bodies. 2.    Control or even close down coca-cola, pepsi-cola and such other water wasting soft drinks industries. 3.    Roof top an land based rain water harvesting systems must be enforced strictly and incentivised. 4.    Impose severe restrictions on cutting trees for so called development projects – Conservation of existing forests and creation of new forests with local species of trees should be taken up with utmost priority. 5.    Cultivation of sugarcane and such other water intensive crops should be controlled and priority should be accorded to less water using crops such as millets and pulses. Water guzzling industries must also be capped. 6.    Government should understand that survival is more important then so called development. 7.    Calamity relief agencies should be increased in number and strengthened further with modern technology so that immediate  relief is provided in the events of floods and fires.   SJM also urges and appeals the general public including its Karayakartas to cooperate fully with the public and private initiatives for water conservation rain water harvesting, prevention of water wastage and water misuse, forest conservation, tree planting and such other measures, so urgently required for our very survival. Forest conservation and water conservation should be treated by one and all as developmental activities. -- Suraj Bhardwaj 9899225926

No comments:

Post a Comment