Sunday, May 29, 2016

परिवार प्रबोधन

कल मुझे संघ शिक्षा वर्ग में मातृहस्ते भोजन के अवसर पर बोलने का सुअवसर प्राप्त हुआ। लगभग 175 परिवार उपस्थित थे और अच्छे भाव भावना में थे।
प्रारम्भ उस बलवंत राय गर्ग के चुटकले से किया जिसमे उनकी पत्नी उनको वर्ग के दौरान मिलने अपने भाई के साथ आती है। संघस्थान विकिर के बाद भीड़ की भीड़ एक सा गणवेश पहने उमड़ती है तो झुंझलाहट में भाई से कहती है:"राजिंदर, जरा तू ही आगे जा के पहचान वर्ना मेरे को तो सारे ही तेरे जीजाजी जैसे दिखें हैं!  वास्तव में हमारा उद्देश्य सिर्फ वेश से एक जैसे नहीं बल्कि आचार व्यवहार और विचार से ही एक जैसे घड़ने चाहते है। सभी एक दुसरे से स्नेह करें और आपस में भाईभाई सा व्यवहार करें। और संघ उसमें सफल भी हुआ है। कहीं भी विपदा आई; आसमानी या सुल्तानी, प्राकृतिक या मानव निर्मित,  सूखा या बाढ़, फरीदाबाद की रेल दुर्घटना अथवा चरखी दादरी की एयरोप्लेन दुर्घटना, स्वयंसेवक सबसे पहले आया। गुजरात का भूचाल हो या उत्तराखंड में बाढ़ से बुरा हाल हो।  1947 का देश विभाजन हो या 1975 का आपात तानाशाही शासन हो। संघ के स्वयंसेवक की तीन विशेषता रही। माँ जैसे बेटे को संकट में देख तुरंत खिची आती है वैसे आये। बिना फ़ोटो वीडियो खिंचवाने के मोह में पड़े सेवा में जुटते है। और तीसरे जैसे सबसे पहले आते है वैसे ही सबसे बाद तक जुटे रहते है। दिल से करते है दिखावे को नहीं। सहानुभूति दिखाने नहीं बल्कि समानभूति से करते है। ईधर कोई बेबस बहाता है आंसू, उधर भीग जाता है दामन हमारा।

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